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सिविल में व्यवस्था बीमार:गंदगी से भरे हैं जच्चा-बच्चा वार्ड के शौचालय सीवरेज की सफाई के लिए चल रही ई-मेल गेम, गर्भवतियों को चलने की मनाही, फिर भी अन्य वार्डों के शौचालय इस्तेमाल करने को मजबूर

जालंधरएक महीने पहले
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  • सुविधा में अंतर देखिये एक में भरपूर सफाई, दूसरे में टूटी कुर्सी का करना पड़ रहा उपयोग, सिविल में कूड़े को भी लगाई थी आग
  • परमिशन मिलने पर होगी सीवरेज की सफाई : एसएमओ डॉ. कुलविंदर कौर

कोरोनावायरस की महामारी के दौरान सिविल अस्पताल को कोविड केयर सेंटर में तबदील कर दिया गया था। 4 महीने तक सिविल अस्पताल में केवल कोरोनावायरस के मरीजों का इलाज किया गया साथ में जच्चा-बच्चा वार्ड में डिलीवरियां पहले की तरह ही हो रही थीं। 4 महीनों के दौरान सिविल अस्पताल में सेहत विभाग की तरफ से महत्वपूर्ण बदलाव किए गए और करोड़ों रुपए लगाकर इंफ्रास्ट्रक्चर भी बदला गया, लेकिन इन दिनों सिविल अस्पताल अपने पुराने हालातों की तरफ दोबारा से रुख कर रहा है।

जच्चा-बच्चा वार्ड के हालात फिर से बदतर हो चुके हैं। जच्चा-बच्चा वार्ड में दाखिल गर्भवतियां इलाज से तो संतुष्ट हैं, लेकिन शौचलयों में में फैली गंदगी से परेशान हैं। जच्चा-बच्चा वार्ड के ग्राउंड फ्लोर में दाखिल गर्भवतियों को शौचालय के लिए अन्य वार्डों में जाना पड़ा रहा है। उनका कहना है कि एक तो ज्यादा चला नहीं जाता और ऊपर शौचालय बाहर खुले में ही करना पड़ता है। दूसरी तरफ सिविल में रोज कूड़े को आग लगाकर कोरोना मरीजों के लिए खतरा पैदा किया जा रहा है। हालांकि ये पता नहीं चल पाया कि ये कौन कर रहा है।

100% इंफेक्शन का खतरा

जच्चा-बच्चा वार्ड में एडमिट गर्भवतियों को गंदगी से भरे शौचालयों के कारण 100 फीसदी बीमारी या इंफेक्शन का खतरा है। हालांकि जिन शौचालयों में गंदगी है वहां डिलीवरी से पहले यानी प्री-नेटल और ऑप्रेशन के बाद यानी पोस्ट नेटल गर्भवतियों को एडमिट किया जाता है

डॉक्टरों की माने तो दोनों हालातों में महिलाओं को ज्यादा चलना सेहत के लिए हानिकारक होता है। शौचालय में इंग्लिश सीट कई दिनों से साफ नहीं हैं, इसलिए वहां प्लास्टिक की कुर्सियों को काट कर रखा गया है। वहीं वार्ड की नर्सों के बाथरूमों को देखा जाए तो वह पूरी तरह साफ है।

परमिशन मिलने पर होगी सीवरेज की सफाई : एसएमओ डॉ. कुलविंदर कौर
जच्चा-बच्चा वार्ड में खराब सीवरेज की समस्या का मामला बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन उसे पहले अस्पताल प्रशासन की तरफ से लटकाया गया। जानकारी मुताबिक सीवरेज साफ करने के लिए इंटरलॉक टाइलें उखाड़नी पड़ेंगी, जिससे एंट्रेंस खराब हो जाएगी। इस वजह से काम लटका हुआ है।

अब जब अस्पताल प्रशासन काम करना चाहता है, तो जच्चा-बच्चा परिसर के साथ बने वन स्टॉप सेंटर के कर्मियों का कहना है कि अगर अस्पताल ने कोई रिपेयर करवानी है तो उनके अफसर से लिखित मेें परमिशन लेनी होगी। वहीं जच्चा-बच्चा वार्ड की सीनियर मेडिकल अफसर डॉ. कुलविंदर कौर का कहना है कि परमिशन के लिए एमएस ऑफिस के क्लर्क द्वारा चिट्ठी भेजी गई है। परमिशन आने के बाद ही काम शुरू किया जा सकता है।

इधर... सिविल अस्पताल में नर्सिंग स्टाफ कम, एक ही फार्मासिस्ट रोज 600 से अधिक मरीजों को दे रहा दवा

कोरोनावायरस के एक्टिव मरीजों की संख्या में कमी आने के बाद सिविल अस्पताल में अन्य बीमारियों के मरीजों को भी भर्ती किया जा रहा है। रोज बुखार और अन्य बीमारियों से जुड़े मरीज दाखिल हो रहे हैं। वर्तमान में सिविल में स्टाफ नर्सें तो हैं लेकिन नर्सिंग स्टूडेंट्स नहीं हैं, जिस कारण मरीजों की क्लीनिकल केयर करने में दिक्कत आ रही है। वीरवार को मेल मेडिकल वार्ड में 33 मरीजों पर केवल 2 स्टाफ नर्सें ही थीं। ऐसे ही हालात इमरजेंसी वार्ड के हैं, जहां केवल नर्सिंग स्टाफ ही मौजूद है।

अधिक नर्सिंग स्टाफ न होने की वजह से सिविल की फार्मेसी को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। यहां एक अकेला फार्मासिस्ट रोज 600 से अधिक मरीजों को दवा दे रहा है। अगर जल्दबाजी में किसी मरीज को गलत दवा दे दी गई तो मुसीबत खड़ी हो सकती है, क्योंकि सिविल में ज्यादातर कम पढ़े-लिखे मरीज इलाज करवाते हैं।

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