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बेबसी और सहयोग की दो घटनाएं:एक परिवार को बेटी, दूसरे को पिता की बाॅडी ले जाने को कम पड़े पैसे, लोगों ने माफ कराए

जालंधर18 दिन पहले
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12 वर्षीय बेटी का शव परिजनों को सौंपते हुए अस्पताल का स्टाफ। - Dainik Bhaskar
12 वर्षीय बेटी का शव परिजनों को सौंपते हुए अस्पताल का स्टाफ।

हर राेज कड़ी मेहनत कर पेट पालने वाले जरूरतमंद लाेगाेें के लिए काेराेनाकाल में संकट बेतहाशा बढ़ गया है। घर में किसी के बीमार पड़ने पर इन परिवाराें के पास इलाज करवाने तक के पैसे नहीं। शहर के दाे चेरिटेबल अस्पतालाें में दाे परिवार अपनाें की लाश लेने के लिए भी भटकते दिखे। एक मामले में प्रवासी मजदूर के पास बेटी की लाश ले जाने के लिए 1800 रुपए का बकाया नहीं था ताे दूसरे मामले में पिता की लाश ले जाने के लिए बेटी के पास 38 हजार रुपए नहीं थे। दोनों मामलों के बारे में जब शहर की संस्थाओं को पता लगा तो उन्होंने मैनेजमेंट के साथ बातचीत की।

बाद में परिवार वालों से पैसे नहीं लिए गए। मोहल्ला करार खां के व्यक्ति ने बताया कि किसी तरह मजदूरी कर परिवार चलाते हैं। 12 साल की बेटी बीमार हुई तो चेरिटेबल अस्पताल ले आए। बेटी की मौत से कुछ देर पहले 7 हजार जमा करवाए थे। कुछ देर बाद डॉक्टरों ने कहा, आपकी बेटी नहीं रही। 1800 रुपए जमा करवाकर बाॅडी ले जाएं। यह सुन स्तब्ध रह गया।

एक का 38000 और दूसरे का 1800 रुपए का बिल माफ करवाया गया
अस्पताल में पहुंचे एक नेता ने अस्पताल मैनेजमेंट से बात कर परिवार की आर्थिक मजबूरी बताई ताे मैनेजमेंट ने पेंडिंग बिल लिए बिना बाॅडी परिवार को सौंप दी। युवती को तेज बुखार था। उसे शुक्रवार को एडमिट करवाया गया था। शनिवार देर रात उसने दम तोड़ दिया। वहीं, दूसरे मामले में गढ़ा निवासी व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव आए तो उनकी इकलौती बेटी ने उन्हें चेरिटेबल अस्पताल ले आई।

अस्पताल में 1.65 लाख रुपए का बिल बना। पिता की कोरोना रिपोर्ट निगेटिव अाने के अगले दिन उनकी मौत हो गई। मैनेजमेंट ने बकाया 38 हजार रुपए बिल जमा करवाने के लिए कहा था। मृतक की बेटी ने एक एनजीओ से संपर्क किया तो उन्होंने मौके पर पहुंचकर मैनेजमेंट काे परिवार की मजबूरी बताई। इसके बाद अस्पताल ने परिवार की मजबूरी को समझते हुए 38 हजार रुपए का बिल माफ कर दिया। एनजीओ के मेंबर्स ने कहा कि हर रोज ऐसे तीन-चार केस हो रहे हैं।

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