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वर्चुअल किसान मेला:कोरोनाकाल में पराली नहीं जलाने की चुनौती, कम समय में नई मशीनरी लाकर पीएयू ने संभाली फसल

जालंधरएक महीने पहले
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  • पंजाब में 72 प्रतिशत किसानों के पास पांच किल्ले से कम जमीन

(जगमोहन शर्मा) 18 सितंबर को दोपहर 12 बजे पंजाब की धरती पर ऐतिहासिक क्षण रहा। पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी से प्रसारित किसान मेले का यह दिन इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। जब भी आने वाली पीढ़ियों में खेती की बात चलेगी तो पंजाब के हवाले से इस दिन को याद किया जाएगा। वर्चुअल किसान मेला होना अपने आप में पीएयू की बड़ी उपलब्धि है।
इस मेले से कृषि में इंटरनेट तकनीक, आईटी क्रांति के बेहतर इस्तेमाल का भी उदाहरण मिला। डिजिटली प्रसारित मेले में सूबे के हजारों किसानों ने अपने-अपने मोबाइल सहित अन्य माध्यमों से इसे देखा और माहिरों को सुना। यह पहला मौका था जब किसानों ने, खासकर महिला किसानों ने इस मेले को इतमिनान से देखा। क्योंकि किसान महिलाएं मेले में बहुत कम संख्या में भाग ले पाती थीं।

दूसरी बात यह कि पहली बार किसान को धूल-मिट्‌टी, गर्मी में धक्के नहीं खाने पड़े। न ही अडि्डयां उठाकर और लंबे समय खड़े रहकर माहिरों को सुनना पड़ा। जैसा की जाहिर है हर किसान ने इस मेले को पहली बार अपने बेडरूम, घर या फिर खेत में मोटर पर बैठकर देखा होगा। हालांकि ग्राउंड में जाकर मेले देखने जितना आनंदित करने वाला मौका तो उन्होंने खोया है लेकिन कोरोना काल में यह जरूरी था।

किसान मेले में इंटरनेट के माध्यम से ही नए बीजों का आर्डर देने की भी सुविधा थी। इसके अलावा प्रगतिशील किसानों के वीडियो उपलब्ध थे। खेती से संबंधित प्रदर्शनियों का भी प्रबंध किया गया था। पंजाब में कृषि सेक्टर को स्वंय मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह देखते हैं और इस नाते वह हमेशा किसान मेले में शिरकत करते हैं। पहली बार हुए इस वर्चुअल मेले का उद्घाटन भी उन्होंने किया।

चावल पंजाबियों की पसंद नहीं था, हम तो कभी-कभार खीर बनाने थे, धान तो हमने साउथ के लिए उगाना शुरू किया और देश को संपन्न बनाया : सीएम
उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि 60 के दौर से पहले हमें धान का कहां पता था। पंजाबी लोग तो कभी-कभार खीर खाने के लिए चावल का इस्तेमाल करते थे। हमारे पूर्वज गेहूं, बाजरा और मक्की जैसा अनाज खाने के शौकीन थे। धान तो हरित क्रांति के चलते आया और इसे पंजाब के किसानों ने साउथ के लिए उगाया। धीरे-धीरे हम भी इसके आदी हो गए। मुझे याद है कि पीएल-48 फंड के अधीन हम अमेरिका से गेहूं मंगवाते थे।

ग्रीन रेवेल्यूशन के वक्त मैं भी खेती करता था और मुझे याद है कि गेहूं सिर से ऊंची होती थी। गेहूं के खेत में घुसने पर आदमी दिखता नहीं था। तब तूड़ी ज्यादा और दाने कम निकलते थे। अब यूनिवर्सिटी की मेहनत से ऐसी किस्में आ गई हैं जिसमें दाने ज्यादा तूड़ी कम निकलती है। यह सब खेती के माहिरों की मेहनत की बदौलत ही संभव हो पाया है।

मुझे याद है कि पीबी-18 नामक बैरायटी की लाल गेहूं होती थी। आईआर-8 धान की वैरायटी फिलिपींस से लाई गई। धीरे-धीरे अब हमारे वैज्ञानियों ने कई बेहतर किस्में विकसित कर ली हैं। 1966 से 2020 तक फूड सरपल्स बनाने में पीएयू का ही योगदान है। केंद्र सरकार के कृषि विधेयकों पर उन्होंने कहा कि भाजपा किसानों को गारंटी दे रही है लेकिन मैं इस गारंटी को नहीं मानता।

आज नहीं तो कल इन विधेयकों के हवाले से किसान को बर्बाद ही किया जाना है। हम तो नहीं रहेंगे लेकिन हमें अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए सोचना होगा। पंजाब में 72 प्रतिशत किसानों के पास 5 किल्ले से कम जमीन है। इसमें से भी कईयों के पास 2 किल्ले या इससे कम जमीन है। किसान की एमएसपी खत्म हो गई तो उनके बच्चे करेंगे क्या, खाएंगे क्या?
कोरोनकाल में हमने बहुत कुछ सीखा, मेला उसी का परिणाम: वीसी डॉ. ढिल्लों
मेले में पीएयू के वाइस चांसलर पद्मश्री डॉ. ढिल्लों ने मेले की थीम पराली न साड़, पंजाब नूं संभाल पर बोला। उन्होंने कहा कि हमारे सामने पराली इस कोरोना काल में और भी बड़ी चुनौती है। कोरोना के मरीजों के लिए भरपूर और साफ हवा चाहिए। अगर हमने पराली जलाई तो स्थिति गंभीर हो सकती है। उन्होंने कहा कि मैं भी मानता हूं और महसूस करता हूं कि किसानों को पराली संभालने पर पैसा मिलना चाहिए लेकिन अगर यह नहीं भी मिल रहा है तो भी हमें यह सोचकर इसे संभालना चाहिए कि कम से कम इस उपाय से खाद, पानी जैसी चीजों के कम प्रयोग से भी हम पैसा तो बचा ही रहे हैं।

उन्होंने अपनी बात कुछ यूं शुरू कि...हमने बहुत कुछ सीखा है। यह किसान मेला इसी का प्रमाण है। सबसे पहले गेहूं का बेहतर मंडीकरण करना सीखा। कोरोना महामारी की घोषणा होते ही हमारी गेहूं पक कर तैयार थी। इसके बावजूद पंजाब में बेहतर मंडीकरण किया। इतने कम समय में नई तकनीके विकसित कीं और अगली फसल धान की सीधी बुवाई के मशीनरी उपलब्ध करवाई।

हम मसूर उगाना ही भूल गए, इसकी भी नई वैरायटी विकसित की, किसान अब दलहन में हाथ आजमाएं
डॉ. ढिल्लों ने कहा कि लंबे अर्से से हमने यह महसूस किया की पंजाब दालों की खेती करना भूल रहा है। खासकर मसूर उगाना तो हम भूल ही गए जबकि किसी समय कादियां इलाके में इसकी अच्छी-खासी फसल होती थी। इसकी काश्त बढ़ाने के लिए एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी की तरफ से भी कम प्रयास हुए। इसके लिए अब नई वैरायटी विकसित की गई है। उन्होंने कहा कि कमांद यानी गन्ने के साथ भी सब्जी का उत्पादन करना चाहिए। कई किसान ऐसा कर रहे हैं। इससे किसान अतिरिक्त आमदनी ले सकते हैं। सहायक धंधों की तरफ हमें ज्यादा से ज्यादा ध्यान देना चाहिए।

अभी सूबे में 10 फीसदी तो हरियाणा में 24 प्रतिशत किसान सहायक धंधे कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी की तरफ से 18001805100 टोल फ्री नंबर जारी किया गया है। किसान इस नंबर पर मिसड कॉल देकर यूनिवर्सिटी के साथ जुड़ सकते हैं। इसके अलावा किसानों से अपील की कि बासमती में यूनिवर्सिटी की तरफ से सुझाए गए कीटनाशकों का ही उपयोग किया जाए। नहीं तो इसको विदेश में बेचने में दिक्कत आती है।

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