सभा-रैलियों पर रोक से आसान नहीं प्रचार की राह:कोविड के कारण सियासी दलों के लिए डिजिटल कैंपेनिंग बड़ा विकल्प, पर बिना तैयारी टेढ़ी खीर

जालंधर7 महीने पहलेलेखक: सुनील राणा
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निर्वाचन आयोग ने कोरोना के बढ़ते मामलों के कारण किसी प्रकार की रैली, जनसभा, नुक्कड़ मीटिंग के साथ-साथ डोर-टू-डोर प्रचार में 5 से ज्यादा लोगों के चलने पर पाबंदी लगा रखी है। 15 जनवरी के बाद आयोग कोरोना की स्थिति की समीक्षा करेगा। ऐसे में पंजाब के राजनीतिक दलों के प्रचार की राह आसान नहीं रह गई है। पंजाब में हर 100 में से 84.32 लोग इंटरनेट यूजर हैं और डिजिटल कैंपेनिंग एक बड़ा विकल्प है। फिलहाल तैयारियों और मनमाफिक रिस्पॉन्स की कमी के कारण दलों के लिए इस तरह की इलेक्शन कैंपेनिंग अभी टेढी खीर ही है।

कोरोना के बढ़ते ग्राफ के कारण संभावनाएं बढ़ रही हैं कि पंजाब समेत सभी चुनावी राज्यों में इन पाबंदियों का साया पूरे चुनाव के दौरान छाया रहेगा। ऐसे में डिजिटल प्रचार अपने समर्थकों तक पहुंचने के लिए राजनीतिक दलों के लिए बड़ा माध्यम रहेगा। लेकिन मौजूदा स्थिति को देखते हुए डिजिटल माध्यम खासकर सोशल मीडिया पर भी प्रचार की राह आसान नहीं दिखती।

अकाली दल जता चुका है नाराजगी

पंजाब में शिरोमणि अकाली दल पहले ही निर्वाचन आयोग के किसी भी प्रकार की रैली न करने के फैसले पर आपत्ति जाहिर कर चुका है। लेकिन आयोग के फैसले पर अमल करते हुए आम आदमी पार्टी और कांग्रेस डिजिटल चुनाव प्रचार में उतर आए हैं। आम आदमी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भगवंत मान कह चुके हैं कि उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि पहले डिजिटल माध्यमों के स्वभावी हैं।

चुनावी दंगल में रहेंगे 1000 से ज्यादा प्रत्याशी

पंजाब में 2012 में 6 राष्ट्रीय दलों सहित 25 पार्टियों ने विधानसभा चुनाव लड़ा। इनमें कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल, भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, भाकपा, सीपीएम (मार्क्सवादी), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी प्रमुख हैं। आजाद उम्मीदवारों समेत 1078 उम्मीदवार चुनावी दंगल में उतरे थे। 2017 के चुनाव में 34 राजनीतिक दल मैदान में उतरे और निर्दलीयों समेत 1145 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा। 2022 के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों की संख्या अधिक रहेगी। पंजाब में करीब आधा दर्जन नए राजनीतिक दल चुनावी दंगल में उतर रहे हैं।

पंजाब में 100 में से 84.32 लोग इंटरनेट यूजर

नीति आयोग की Sustainable Development Goals India Index 2020-2021 की रिपोर्ट के अनुसार भारत के हर 100 में मात्र 55 के पास ही इंटरनेट कनेक्शन है। वहीं हर 100 में से 84 लोगों के पास मोबाइल कनेक्शन हैं। रिपोर्ट के अनुसार पंजाब में हर 100 लोगों में 84.32 इंटरनेट सब्सक्राइबर्स हैं।

ऑफिशियल पेज पर किसके कितने फॉलोअर्स

पंजाब विधानसभा चुनाव में मुख्य रूप से सत्ताधारी दल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, शिरोमणि अकाली दल, भाजपा के साथ किसान संगठनों का संयुक्त समाज मोर्चा मैदान में हैं। कुछ दिन पहले गठित हुए किसानों के संगठन को छोड़ दें तो हर सियासी दल की अलग-अलग विंग के कई पेज सोशल मीडिया पर हैं। दो सबसे बड़े सोशल मीडिया प्लेटफार्म की बात करें तो पंजाब में आम आदमी पार्टी फेसबुक पर और सत्ताधारी कांग्रेस ट्विटर पर फॉलोवर्स के मामले में सबसे आगे हैं।

पंजाब के राजनीतिक दलों की स्थिति देखें तो आम आदमी पार्टी (AAP) के फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर राज्य ऑफिशियल पेज पर अन्य दलों के मुकाबले सबसे ज्यादा 17.2 लाख फॉलोअर्स हैं। इसके बाद कांग्रेस, अकाली दल और फिर सबसे कम BJP के फॉलोवर्स हैं। वहीं ट्विटर पर पंजाब कांग्रेस सबसे आगे है। इसके बाद AAP, अकाली दल और फिर भाजपा का नंबर है।

निर्दलीयों और नए सियासी दलों के लिए बड़ी चुनौती

प्रदेश की राजनीतिक में पहले से ही सक्रिय कांग्रेस, भाजपा, शिअद और AAP लंबे समय से डिजिटल माध्यमों का प्रयोग कर रहे हैं। भाजपा की स्थिति डिजिटल प्रचार में देश में सबसे आगे मानी जाती है। पार्टी ने जिला और ब्लॉक स्तर पर भी अपने आईटी सेल गठित कर रखे हैं। हालांकि पंजाब में डिजिटल माध्यमों पर BJP की अन्य राज्यों के मुकाबले सक्रियता कम हैं।

आम आदमी पार्टी ने भी सोशल मीडिया पर विधनासभा हलकावार अपना नेटवर्क खड़ा कर रखा है। पार्टी का हर कार्यक्रम इसके सोशल मीडिया पेजों पर लाइव होता है। वहीं कांग्रेस भी डिजिटली सक्रिय है। वहीं किसान संगठन भी आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया पर सक्रिय रहे हैं। ऐसे में उनके लिए भी इस मंच का इस्तेमाल कम मुश्किल रहेगा। सबसे ज्यादा परेशानी निर्दलीय और नए सियासी दलों के उम्मीदवारों के सामने होगी। क्योंकि कोई भी नया डिजिटल नेटवर्क 2 या 4 दिन में खड़ा नहीं किया जा सकता। इसे स्थापित करने में कई महीने लगते हैं।

आसान नहीं नेटवर्क बनाना, लगते हैं 18 महीने

चुनावों के दौरान सोशल मीडिया पर काम करने वाले एक्सपर्ट का दावा है कि डिजिटल मीडिया पर उपस्थिति दर्ज करने के लिए किसी भी नए व्यक्ति को कम से कम 4 से 6 महीने का समय चाहिए। जीरो से शुरुआत पर तो ऑर्गेनाइज्ड ऑर्गेनिक नेटवर्क बनाने के लिए 18 महीने तक का वक्त लग जाता है। एक्सपर्ट का दावा है कि इससे जो एसेट्स बनते हैं वो लंबे समय तक टिके रहते हैं। यह कह सकते हैं कि लाइफटाइम हो जाते हैं। सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर जाकर अपने विभिन्न पेज क्रिएट करना, ग्रुप्स बनाना यानी अपने बनाए पेजों पर ऑडियंस को लाना आसान काम नहीं है।

पेड प्रोमोशन आसान तरीका, असरदार नहीं

एक्सपर्ट के अनुसार, सोशल मीडिया पर दो तरीके से प्रचार होता है - एक ऑर्गेनिक और दूसरा पेड प्रोमोशन। किसी भी डिजिटल अभियान का सबसे अहम पहलू है कंटेंट क्रिएट करना और उसकी आर्गेनिक रीच यानी बिना कोई राशि खर्च किए उसे लोगों तक पहुंचाना। इसे हम आर्गैनिक तरीका कहते हैं। पेड प्रोमोशन के जरिये तय राशि खर्च कर कंटेट वोटरों या यूजर्स तक पहुंचाया जा सकता है। हालांकि अभी इसका प्रभाव उतना नहीं माना जाता, जितना लोगों तक सीधी पहुंचा का होता है।

वर्चुअल रैलियों का वोटिंग पैटर्न पर खास असर नहीं होगा

एक्सपर्ट का मानना है कि वर्चुअल रैलियों की भी वैसी ही स्थिति है जो वास्तविक रैलियों की रहती है। रैली में आने वाले सभी लोग पार्टी को वोट नहीं देते। पार्टी इन रैलियों के माध्यम से ज्यादा लोगों तक अपनी बात तो पहुंचा सकती है लेकिन जरूरी नहीं कि उसे सभी का वोट मिले। यदि प्रत्याशी एक वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित भी करता है तो इसकी कोई गारंटी नहीं कि लोग उसे देखें या सुनें। कोई सोशल मीडिया के माध्यम से अपने ऑफिशियल पेज पर लाइव हो रहा है तो गौर करने वाली बात यह रहेगी कि उन्हें उस समय कितने लोग संजीदगी से देख रहे हैं। लोग कितनी देर तक पेज पर एंगेज रहते हैं। किसी ने देखा और बंद कर दिया तो इम्पैक्ट भी वैसा ही आएगा, क्योंकि मतदाताओं का रुख वोटिंग के लिए एक सीमा तक पहले से ही तय होता है।

डिजिटल प्रचार के फायदे कम नुकसान ज्यादा

  • डिजिटल माध्यम से सभी वोटरों तक पहुंचना संभव नहीं
  • इंटरनेट की सीमित मौजूदगी और गुणवत्ता आड़े आएगी
  • दलों की पहुंच, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में आसान नहीं रहेगी
  • बुजुर्ग व महिलाएं डिजिटल मीडिया का सीमित इस्तेमाल करते हैं
  • प्रदेश में बड़ी संख्या में गरीब वोटरों के पास डिजिटल उपकरण नहीं