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जनता का पैसा कूड़े में:गीला-सूखा कचरा अलग करिये, ये सिखाने में खर्च किए 30 लाख, लेकिन घरों से कूड़ा उठाकर एक में मिला देते हैं निगम के कर्मचारी

जालंधर8 दिन पहले
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विकासपुरी डंप को खत्म करने के लिए कूड़ा प्रोसेस करने की मशीन लगाने के लिए एक साल से शेड बना है, लेकिन गीला और सूखा कूड़ा एक ही रेहड़े में आज भी डंप पर फेंका जा रहा है।
  • 94 हजार घरों को जागरूक कर रहे हैं मोटिवेटर, निगम के खुद के सेग्रिगेशन के इंतजाम नहीं
  • जुलाई 2019 में निगम ने शुरू किया कैंपेन, लोग ने घरों में 2 डस्टबिन रखे
  • रेहड़ा और डंप पर एक ही साथ फेंका जा रहा सिटी का 95% कूड़ा

सिटी के 80 वार्ड से रोजाना निकलने वाले 500 टन कूड़े के डंप को खत्म करने के लिए निगम ने बिना योजना और प्लानिंग के ही शुरू कर दिया अवेयरनेस कैंपेन। आंकड़ों के मुताबिक बीते एक साल में 30 लाख रुपए सिर्फ 94 हजार घरों को अवेयर करने के लिए डंप कर दिए गए। ये रकम स्वच्छ भारत अभियान के फंड से खर्च की गई, लेकिन शहर के हालात में जरा भी बदलाव नहीं हुआ है।

कारण निगम प्रशासन ने सेग्रीगेट कूड़ा उठाने वाले डस्टबिन, रेहड़ा और पिट का इंतजाम करने से पहले ही घर-घर जाकर लोगों को जागरूक करने लगा। लोग तो दो डस्टबिन में गीला और सूखा कूड़ा रखने लगे, लेकिन रैग पिकर्स से लेकर सिटी के सेकेंडरी डंप और वरियाणा डंप तक एक ही गाड़ी में दोनों तरह के कूड़े को एक साथ ही फेंक कर पहाड़ बनाने का काम जारी है।

गीले कूड़े से पिट में खाद बनाने और सूखे कूड़े को अलग कर रीसाइकिल प्रोडक्ट की बिक्री के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किए बिना ही निगम ने डोर-टू-डोर जाकर कूड़ा सेग्रिगेशन के लिए अवेयर करने वाले मोटिवेटरों के ऊपर 25 लाख रुपए खर्च कर दिए। इसके अलावा रैग पिकर्स की ट्रेनिंग, बल्क वेस्ट जेनरेटरों के सेमिनार सहित तमाम जागरूकता वाली गतिविधियों और प्रचार-प्रसार में करीब 5 लाख रुपए अलग से खर्च किए गए।

एक घर में 3 बार अवेयर करने पर 35 रुपए का खर्च

पूर्व निगम कमिश्नर दीपर्व लाकड़ा ने एनजीटी की सख्ती के बाद वैल्लूर मॉडल पर गीला और सूखा कूड़ा को अलग करके प्रोसेस करने का काम शुरू कराया था। इसके लिए जुलाई, 2019 में 25 मोटिवेटरों को काम पर रखा गया, जो सिटी के प्रत्येक घरों में जाकर लोगों को इसके लिए प्रेरित कर रहे हैं। रैग पिकर्स से फीडबैक मिलने के बाद दूसरी और तीसरी बार भी लोगों को जाकर समझाया गया।

बाद में मोटिवेटरों की संख्या 100 तक गई और फिर कम करके 25 कर दी गई। इस हिसाब से बीते साल जुलाई से मार्च तक का हिसाब देखें, तो औसतन 50 मोटिवेटर को करीब 80 हजार घरों का औसतन दो बार सर्वे करने पर करीब 20 लाख रुपए की पेमेंट हुई है। मोटिवेटरों की मांग पर कोरोना काल के बाद अगस्त से फिर से अवेयरनेस कैंपेन शुरू हुआ तो मोटिवेटरों ने एकमुश्त पेमेंट की मांग की। उसके बाद से इन्हें भत्ते के रूप में 5000 रुपए महीना दिया जा रहा है।

1.77 लाख घरों में से 62 वार्ड के 94000 घरों तक पहुंचने का दावा: निगम के हेल्थ ब्रांच के आंकड़ों के अनुसार सिटी के 1.77 लाख घरों में से अब तक करीब 94,000 घरों में एक से लेकर तीन बार कूड़ा सेग्रीगेट करने को लेकर मोटिवेटर पहुंच चुके हैं। सर्वे के बाद घर पर स्टिकर लगाने के साथ प्रत्येक विजिट के बाद डेट के साथ टिक मार्क लगाते हैं, इसकी निगरानी के लिए 3 कम्युनिटी फेसीलिटेटर रखे गए हैं। बावजूद इसके सुधार न होने पर 500 रुपए से लेकर 5000 रुपए की राशि तक चालान का भी नियम है।

सेग्रीगेट कूड़ा उठाने के लिए सिर्फ 30 रेहड़े, जरूरत 100 की: निगम ने अब तक चारों विधानसभा हलका में गीला-सूखा कूड़ा उठाने के लिए सिर्फ 30 इलेक्ट्रिक रेहड़े दिए हैं, जबकि जरूरत 100 की है। इसलिए जिन घरों में सर्वे के बाद कूड़ा सेग्रीगेट किया जा रहा है, वहां भी एक ही रेहड़े से कूड़ा डंप तक पहुंचाया जा रहा है। लेकिन वार्ड 11 के बडिंग और वार्ड 12 के दकोहा में पिट बनने के बाद कैंपेन सफल रहा। दोनों वार्ड के करीब 5000 घरों से पिट तक गीला और सूखा कूड़ा अलग-अलग पहुंच रहा है और गीले कूड़े से खाद भी बन रही है।

जरा, इनकी भी सुनिए

  • गुरु अमरदास नगर में रहने वाले विकास कुमार का कहना है कि पहले तो रोजाना रैग पिकर्स आता ही नहीं है और आ भी जाए तो एक ही रेहड़े में कभी दो पार्ट करके कूड़ा ले जाता है, तो कभी एक साथ ही रखता है। उनके घर पर भी मोटिवेटर स्टिकर लगाकर गए हैं, लेकिन अभी इसका कोई फायदा दिख नहीं रहा है।
  • ओल्ड जवाहर नगर निवासी रेखा शर्मा ने बताया कि उनके पास दो बार निगम के मोटिवेटर आ चुके हैं। सिर्फ दो डस्टबिन में कूड़ा रखने की बात कही, नाम-पता नोट किया और गेट पर स्टिकर लगाकर चले गए, लेकिन रैग पिकर्स दोनों डस्टबिन का कूड़ा तो एक ही रेहड़े में पलट देता है।
  • रामामंडी नजदीकी एकता नगर निवासी रवि कुमार ने बताया कि उनकी माता ने बताया कि निगम से कोई दो डस्टबिन की बात बताने आया था। ऐसा न करने पर चालान की भी चेतावनी देकर गया। बताया कि रैग पिकर्स भी अलग-अलग कूड़ा उठाएंगे, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है।

चेयरमैन बोले -पहले हाईकोर्ट केस और फिर कोरोना से पिट का काम फंस गया, इसलिए कैंपेन कामयाब नहीं
निगम के हेल्थ एंड सेनिटेशन एडहॉक कमेटी के चेयरमैन पार्षद बलराज ठाकुर का कहना है कि कैंपेन को इसलिए शुरू किया था, ताकि गीले कूड़े से खाद बनाकर 80% तक सॉलिड वेस्ट कम किया जा सके, लेकिन नंगलशामा डंप शुरू होते ही आसपास के लोगों द्वारा हाईकोर्ट में केस करने से काम ठप हो गया। करीब 2 दर्जन पिट जिनके टेंडर हो रखे था, वो कोरोना काल के कारण नहीं बने। अब पिट बनाए जा रहे हैं, उसके बाद ही कैंपेन का रिजल्ट आएगा।

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