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डीएल ड्राइविंग टेस्टिंग ट्रैक पर गोलमाल:ट्रैक के थर्मल कैमरे में गाड़ी और ड्राइवर की नहीं आती तस्वीर, लोगों की जगह रात में खुद ही टेस्ट देकर पास होते रहे एजेंट

जालंधर10 महीने पहले
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  • एजेंटों का जाल: जालंधर के ड्राइविंग टेस्टिंग ट्रैक पर टेस्ट पास करने के काम में लगे हैं 10 अवैध कर्मचारी
  • सरकारी बाबुओं को इसकी जानकारी लेकिन हटाने का दमखम किसी में नहीं

ड्राइविंग टेस्टिंग ट्रैक फिल्लौर में आवेदक नहीं, एजेंट ही रात में कार चलाकर ड्राइविंग टेस्ट क्लियर करवा रहे हैं। यह खेल दो माह से पांच बजे छुट्‌टी होने के बाद चल रहा है। जालंधर सिटी से भी लोग फिल्लौर में टेस्ट देने गए ताकि बिना ड्राइविंग पास हो जाएं। जिन लोगों को कार नहीं चलानी आती या फिर टेस्ट देने का आत्मविश्वास नहीं है, उनका टेस्ट खुद देकर एजेंट उन्हें पास करवा रहे हैं।

सोमवार रात का मामला सामने आने के बाद फिल्लौर के एसडीएम विनीत कुमार ने जांच के आदेश दे दिए हैं। जांच में कहा गया है कि रात को दो लोग निजी कार के साथ ड्राइविंग टेस्ट ट्रैक पर क्या कर रहे थे, पता लगाया जाए। परिवहन विभाग को जांच दी गई है। सवाल है कि सरकारी ट्रैक का ताला खोला किसने और कंप्यूटर कैसे चलाए गए। कंप्यूटर के आईपी नंबर से पूरे खेल की जानकारी सामने आएगी। दैनिक भास्कर के सवाल पर एसडीएम विनीत कुमार ने मामले की पुष्टि की है।

कैमरों की कमजोरी भांप चुके थे एजेंट

दरअसल, जालंधर में बने ट्रैक पर सिटी की तरह मोड़, पार्किंग, ट्रैफिक साइनेज, पुल और चौक बने हैं। यहां टेस्ट क्लियर करने पर अथॉरिटी आवेदक के टेस्ट की फाइल का सीरियल नंबर, टेस्ट का रिजल्ट देखकर ही लाइसेंस जारी करती है। लेकिन फिल्लौर में एक्टिव एजेंट खेल का भेद खोल रहे हैं। ट्रैक पर लगे थर्मल कैमरे वाहन की इमेज सेंसिंग करते हैं और उसका गाड़ी के ग्राफ का प्रिंट, वाहन संचालन का समय बता देते हैं। इस इमेज में साधारण वीडियो कैमरा की तरह वाहन की तस्वीर और ड्राइवर की तस्वीर नहीं आती है। इस कमजोरी का फायदा उठाकर एजेंट वाहन लेकर खुद ही ट्रैक पर दौड़ाने लगे।

जालंधर में एजेंटों का रैकेट फिल्लौर से भी मजबूत

जालंधर में परिवहन विभाग के दफ्तर में 10 एजेंट काम कर रहे हैं। इन्हें सरकारी बाबूओं ने वर्कफोर्स का हवाला देकर अपने खर्च पर रखा है। 10 लोगों की सैलरी लोगों से लिए पैसों से ही आती है। डीसी रेट पर प्रति स्टाफ 10 हजार का भी हिसाब लगाएं तो हर महीने 1 लाख का खर्च इन्हें दफ्तर बुलाने का है, लेकिन ये खर्च कैसे एकत्रित होता है, इसकी गहराई में कोई अफसर नहीं गया।

विभिन्न अफसर तबादला होने के बाद जालंधर आते हैं व अवैध स्टाफ को काम करता देखते हैं पर आंखें बंद कर ली जाती हैं। साल में इनकी सैलरी के 12 लाख मोटी रिश्वत के तौर पर एकत्रित होते हैं। यही दस लोग जालंधर सिटी के बाकी छोटे एजेंटों का रैकेट चला रहे हैं। ये लोग जालंधर में भी ‌फिल्लौर के ट्रैक जैसा ही खेल खेल रहे हैं। जब लोग लर्निंग ड्राइविंग लाइसेंस का टेस्ट देने आते हैं तो टैब टेस्ट के बटन खुद दबाकर पास करा दिया जाता है।

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