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बायो माइनिंग प्रोजेक्ट 3 साल से फाइलों से ही नहीं:सफाई योजनाओं का कचरा, 8 साल में 5 प्रयोग, 15 करोड़ खर्च पर सब फेल

जालंधर11 दिन पहले
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60 करोड़ की लागत से यहां तैयार होना है बायो माइनिंग प्रोजेक्ट... वरियाणा डंप पर 60 करोड़ रुपए की लागत से बायो मानिंग प्रोजेक्ट तैयार किया जाना है। इस प्रोजेक्ट के टेंडर लग चुके हैं, लेकिन अभी तक काम शुरू नहीं हो पाया है। प्रोजेक्ट अभी तक फाइलों में ही सीमित है। ये पहाड़ खत्म हो तो आगे और प्रोजेक्ट लाए जा सकते हैं।
  • स्वच्छता सर्वेक्षण से पहले निगम चलाता है जागृति अभियान, सर्वे टीम के जाते ही सब पुराने ढर्रे पर
  • समस्या का सबसे बड़ा पहाड़,14 एकड़ जमीन पर 4 मंजिला इमारत जितना कूड़ा, निस्तारण नहीं

(प्रवीण पर्व) नई स्वच्छता रैंकिंग का सर्वे शुरू होते ही नगर निगम ने ‘मेरा कूड़ा मेरी जिम्मेदारी’ नामक जागृति अभियान शुरू किया। यह अभियान अक्टूबर तक चलेगा क्योंकि नए स्वच्छता सर्वे में यह देखा जाना है कि किसी शहर में सफाई को लेकर इलाके के लोग कितने जिम्मेदार हैं। इससे पहले सुखा कूड़ा और गीला कूड़ा अलग-अलग करने का जागृति अभियान और कूड़ा देखने पर शिकायत करने के प्रति संवेदनशील होने का जागृति अभियान भी चलाए गए।

लोगों को कूड़े की शिकायत करने के लिए स्वच्छता मोबाइल एप्लीकेशन डाउनलोड करवाने के लिए अभियान चला और जैसे ही रैंकिंग का सर्वे खत्म हुआ अभियान भी खत्म। वर्ष 2015 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेश पर जालंधर में मॉडल वेस्ट मैनेजमेंट प्रोजेक्ट लागू करने की कवायद शुरू हुई और आज 5 सा‌ल बाद नतीजा शून्य है। अभी तक विभिन्न योजनाओं और रेगुलर सफाई पर 15 करोड़ रुपए से अधिक खर्च हो चुके हैं।

बावजूद इसके जालंधर शहर की सड़कों पर कूड़े के ढेर बरकरार हैं। कपूरथला रोड पर पुराने कूड़े के डंप को खत्म करने के लिए 60 करोड़ रुपए की लागत वाला बायो माइनिंग प्रोजेक्ट 3 साल से फाइलों से ही बाहर नहीं आ पाया। वर्षों बाद भी जालंधर निगम वहीं खड़ा है, जहां उसने शहर को साफ करने के बारे में सोचा था। सिटी में रहने वाले 3 लाख परिवार सालाना 25 करोड रुपए प्रॉपर्टी टैक्स देकर भी कूड़ा झेलने के लिए मजबूर हैं। नगर निगम ने जो नया जागृति अभियान चलाया उसमें उन लोगों को सम्मानित किया जाएगा जो सफाई के प्रति सजग हैं। सबसे पहले खाद बनाने लायक कूड़े को खुद इस्तेमाल करने और फिर बचे हुए सॉलिड वेस्ट को सही हाथों तक पहुंचाने की प्रक्रिया को शहर की सफाई का फार्मूला बताया जा रहा है। पर हालात ये हैं कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल तक में जवाबदेही दे रहे नगर निगम ने आज तक केवल प्रयोग ही किए मगर रिजल्ट शून्य ही हैं। अब 8 वर्षों में 5 प्रयोग हुए जो नाकाफी साबित हुए।

कूड़ा अंडरग्राउंड करने की योजना खुद अंडरग्राउंड

सड़क किनारे कूड़ा न दिखाई दे, इसलिए पूर्व मेयर सुनील ज्योति ने 2017 में यो योजना बनाई थी। इसके तहत अंडग्राउंड डंप में कूड़ा फेंका जाना था। 20 लाख रुपए खर्च करके केएमवी कॉलेज और टीवी सेंटर के पास दो डंप बनाए भी गए, लेकिन इन अंडग्राउंड डंप से कूड़ा निकालने के लिए स्पेशल क्रेनें अब तक नहीं खरीदी जा सकीं। मेयर राजा ने कहा कि अंडरग्राउंड डंप से कूड़ा निकालने ज्यादा महंगा पड़ता है। इसलिए बंद करवा दिया।

400 मीट्रिक टन कचरा रोज निकलता है

1. नगर निगम के कूड़ा उठाने वाले ट्रक कंडम हो चुके हैं। रोजाना 400 मीट्रिक टन कूड़ा उठाने के लिए मशीनरी कम है, जिस कारण दोपहर का 1 बजे जाता है सफाई करते करते।
2. नई कालोनियों में कूड़ा उठाने के इंतजाम बहुत कम है। नगर निगम बढ़ी जरूरत के अनुसार संसाधन को विस्तार नहीं दे पाया। पुराने मोहल्लों में नया सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम लागू करना मुश्किल था।

योजनाएं न लागू होने के 2 कारण

1. राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी। जनप्रतिनिधि अपने अपने इलाके में कूड़े का प्लांट नहीं लगने देना चाहते। वह लोगों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहते। लेकिन समस्या का विकल्प भी नहीं दे पाए।
2. नगर निगम की सोच केवल सफाई की राष्ट्रीय रैंकिंग में सुधार के लिए जागृति अभियान चलाने तक सीमित रह गई और यह अभियान तब चलते हैं जब सर्वे शुरू होता है।

और अब...‘मेरा कूड़ा मेरी जिम्मेदारी’

नई स्वच्छता रैंकिंग का सर्वे शुरू होते ही मंगलवार को नगर निगम ने ‘मेरा कूड़ा मेरी जिम्मेदारी’ जागृति अभियान शुरू कर दिया। यह अभियान अक्टूबर तक चलेगा क्योंकि नए स्वच्छता सर्वे में यह देखा जाना है कि किसी शहर में सफाई को लेकर वहां के बाशिंदे कितने जिम्मेदार हैं। अभियान में निगम उन लोगों को सम्मानित करेगा, जो कूड़े का इस्तेमाल और इसे खत्म करने के लिए काम कर रहे हैं। सबसे पहले खाद बनाने लायक कूड़े को खुद इस्तेमाल करने और फिर बचे हुए सॉलिड वेस्ट को सही हाथों तक पहुंचाने की प्रक्रिया को शहर की सफाई का फार्मूला बताया जा रहा है।

‌‌‌‌‌एक्सपर्ट व्यू : घर-घर से कूड़ा कलेक्शन और प्रोसेसिंग ही समस्या का हल

वेस्ट मैनेजमेंट न होने का पंजाब का पहला केस एनजीटी में लेकर जाने वाले गौरव जैन कहते हैं- जालंधर में सफाई न होने की बेसिक समस्या को समझिए। सबसे बड़ी समस्या यह है कि कूड़े की प्रोसेसिंग ही नहीं हो रही है। मिसाल के तौर पर जालंधर में कपूरथला रोड पर 15 साल प्लास्टिक तथा दूसरा सॉलिड कूड़ा इकट्ठा होता रहा। अब इस कूड़े को 60 करोड़ रुपए की लागत से बायो माइनिंग करके खत्म करने की योजना बनाई जा रही है। सवाल है कि रोजाना एकत्रित होने वाले सॉलिड कूड़े को इंडस्ट्रियल ईंधन बनाने, जलाकर बिजली बनाने के काम में क्यों नहीं लाया जाता? दूसरी समस्या यह है कि सबसे पहले घरों से कूड़ा लाकर सड़कों के किनारे जमा किया जाता है और फिर धीमी गति से उठाया जाता है। नगर निगम और नगर कौंसिल के पास मशीनरी की कमी है। इंदौर और पुणे जैसे शहरों में कूड़ा सीधे घरों से लाकर ट्रकों में लादकर डंप पर लेकर जाते हैं। इन शहरों ने कूड़े को प्रेस करने वाली मशीन खरीदी और इतने संसाधन जुटाने की सुबह होने से पहले शहर साफ कर दिया जाता है। एक बार नगर निगम के कर्मचारी कूड़ा उठने के बाद लोग दोबारा सड़कों पर नहीं गिराते। हमने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में मामला रखा। इसके बाद जालंधर नगर निगम और आसपास की नगर कौंसिल ऊपर आधारित मॉडल सॉलि़ड वेस्ट मैनेजमेंट प्रोजेक्ट तैयार किया गया मगर उसको लागू करवाने के लिए लोगों व कर्मचारी संगठनों को सरकार संतुष्ट नहीं कर पाए।

मेयर ने कहा- सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट पर व्यापक काम हो रहा, अच्छे नतीजे आएंगे
मेयर राजा ने कहा- प्राइवेट कांट्रेक्टर से गाड़ियां लेने के लिए टेंडरिंग कर दी गई है। कपूरथला रोड पर शहर के डंप में कूड़ा खत्म करने के लिए बायो माइनिंग प्रोजेक्ट लाया जा रहा है। इस ‌‌‌‌‌‌‌डंप का कूड़ा खत्म करने के बाद यहां पर कूड़े की प्रोसेसिंग के लिए प्रोजेक्ट लगाएंगे। दूसरी बात यह है कि शहर के लोगों का सफाई के प्रति सेंसिटिव होना बहुत जरूरी है। मेयर जगदीश राज राजा ने कहा कि केंद्र सरकार की अमृत योजना के तहत हम सफाई सिस्टम के लिए नए वाहन खरीदेंगे। वर्मी कंपोस्ट तैयार करके किचन वेस्ट को खत्म करने के प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है।

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