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धार्मिक मान्यता:संतान की सलामती के लिए रखा जाता है निर्जला व्रत

रोपड़3 महीने पहले
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  • चतुर्थी रात 8:24 मिनट से शुरू होकर 1 फरवरी को शाम 6 बजे तक रहेगी

माघ माह की संकट चतुर्थी का पर्व 31 जनवरी को मनाया जाएगा। यह चतुर्थी तिथि रात 8:24 मिनट से शुरू होकर 1 फरवरी को शाम 6 बजे तक रहेगी। आचार्य इंद्र दास ने बताया कि चंद्रमा रात 8 बजे के करीब निकलेगा, इसलिए संकट चतुर्थी का व्रत 31 जनवरी को ही रखा जाएगा।

इस दिन खासतौर पर गणेश जी की पूजा की जाती है। गणेश जी को लड्‌डू का प्रसाद चढ़ाया जाता है। यह व्रत संतान की सलामती के लिए इस दिन माताएं निर्जला व्रत रखती हैं। शाम को गणेश जी की कहानी सुनकर चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत को खोलती हैं।

धार्मिक दृष्टि से यह दिन बहुत ही शुभ माना गया है, इस दिन गणेश जी की पूजा करने से जीवन में आने वाले संकट दूर होते हैं। आचार्य ने बताया कि संकष्टी चतुर्थी या संकट चौथ का व्रत संतान की लंबी उम्र व खुशहाल जीवन के लिए रखा जाता है। इस दिन विघ्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा से सारे संकट दूर हो जाते हैं और संतान की दीर्घायु और सुखद जीवन का वरदान प्राप्त होता है। संकट चौथ को संकष्टी चतुर्थी, वक्रतुंडी चतुर्थी, तिलकुटा चौथ के नाम से भी जाना जाता है।

भगवान गणेश जी को ऐसे करें प्रसन्न
आचार्य ने बताया कि इस दिन व्रत रखकर भगवान गणेश जी की विधिपूर्वक आराधना की जाती है। उन्हें तिल के लड्डुओं या गुड़-तिल से बना तिलकुटा का भोग लगाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन गणेश जी की पूजा भालचंद्र नाम से भी की जाती है।

चतुर्थी को व्रत का संकल्प लेकर व्रती महिलाएं प्रातः से चंद्रोदय काल तक नियमपूर्वक रहे, सांयकाल लकड़ी की चौकी पर लाल कपडा बिछाकर मिट्टी के गणेश एवं चौथ माता की तस्वीर स्थापित करें।फिर रोली, मोली, अक्षत, फल, फूल आदि श्रद्धा पूर्वक अर्पित करें।

गणेश जी एवं चौथ माता को प्रसन्न करने के लिए तिल और गुड़ से बने हुए लड्‌डू को अर्पण करें। आचार्य ने बताया कि संकष्टी चतुर्थी का अर्थ संकट को दूर करने वाली चतुर्थी। ऐसी मान्यता है कि इस दिन पूजा करने से संकट से मुक्ति मिलती है। संकष्टी चतुर्थी की पूजा सुबह और शाम दोनों समय में की जाती है।सबसे पहले सुबह व्रत का संकल्प लिया जाता है, वहीं शाम को आरती की जाती है।

चंद्रदेव को अर्घ्य देकर व्रत खोल प्रशाद बांटें
अचार्य ने बताया कि इस दिन गणेश जी और चौथ माता की पूजा के उपरांत रात में चंद्र दर्शन के बाद इस व्रत को खोला जाता है। रात्रि में चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है। तांबे के लोटे में शुद्ध जल भरकर उसमें लाल चन्दन, कुश, पुष्प, अक्षत आदि डालकर चन्द्रमा को अर्घ्य दिजिए। फिर संतान की दीर्घायु और उनके सुखद भविष्य की कामना के लिए कामना करे।

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