कैप्टन पर कैबिनेट मंत्री राणा का नरम रुख:बोले- वह मेरे सियासी गुरु, उनके खिलाफ मेरी जुबान नहीं खुल सकती, लेकिन मैं कांग्रेस का सिपाही

लुधियाना8 महीने पहले
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मुल्लांपुर दाखा में राणा गुरजीत सिंह व संदीप संधू। - Dainik Bhaskar
मुल्लांपुर दाखा में राणा गुरजीत सिंह व संदीप संधू।

पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह पर जहां पूरी कांग्रेस आक्रामक है। वहीं कैबिनेट मंत्री राणा गुरजीत सिंह का उनके प्रति नरम रुख नजर आया। राणा ने कैप्टन अमरिंदर सिंह पर टिप्पणी करने से मना करते हुए कहा कि वह मेरे सियासी गुरु हैं और राणा गुरजीत सिंह का मुंह कभी कैप्टन के खिलाफ नहीं खुल सकता है। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने नई पार्टी बनाई है तो कुछ सोचकर ही बनाई होगी, लेकिन वह कांग्रेस के सिपाही हैं और किसी भी हालात में डटकर मुकाबला करेंगे।

राणा मुल्लांपुर दाखा में सरकारी इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (ITI) का नींव पत्थर रखने के लिए आए थे। इस दौरान राणा गुरजीत सिंह ने कहा कि वह चाहते हैं कि ITI ज्यादा से ज्यादा इंडस्ट्री एरिया में हों, ताकि युवाओं को इसका फायदा हो सके। उन्होंने कहा कि मुल्लांपुर दाखा में सरकारी ITI की मलकीत सिंह दाखा ने 1996 में मांग उठाई थी, लेकिन यह मांग पूरी नहीं हो पाई थी। अब संदीप संधू ITI यहां लाने में कामयाब हुए हैं। जिसके लिए उन्हें मुबारकबाद देनी बनती है।

कैप्टन के मंत्री रहते छोड़ना पड़ा था मंत्री पद

2017 में पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुवाई में सरकार बनने पर राणा गुरजीत सिंह को उर्जा एवं सिंचाई विभाग का मंत्री बनाया गया था। इसी बीच 2018 में उन पर रेत खनन के मामले में गलत ढंग से नदी बांटने के आरोप लगे थे। आरोप था कि उनकी तरफ से अपनी कंपनियों का गलत इस्तेमाल कर रेत की नदी हासिल की। इसके बाद उन्होंने जनवरी 2018 में मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और शांत होकर बैठ गए थे।

चन्नी सरकार में फिर बने मंत्री

अगस्त में कैप्टन अमरिंदर सिंह के इस्तीफा देने के बाद चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब के नए मुख्यमंत्री बने। चन्नी की कैबिनेट में राणा गुरजीत सिंह को जगह मिली। उन्हें तकनीकी शिक्षा विभाग दिया गया है। हालांकि उन्हें मंत्री बनाने पर कांग्रेस में घमासान मचा, लेकिन फिर भी वह मंत्री बने हुए हैं। जब यह चर्चाएं हैं कि चुनाव आचार संहिता लगते ही कई मंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ जा सकते हैं। ऐसे में राणा गुरजीत सिंह का उन्हें सियासी गुरु कहना कई तरह के सवाल खड़े करता है।

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