सुखदेव के बिना भगत सिंह, राजगुरु की तिकड़ी थी अधूरी:शहीद सुखदेव की जयंती के अवसर पर चंद्रशेखर आजाद के भतीजे के पुत्र ने भास्कर से की बातचीत

लुधियाना2 दिन पहले
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अमित कुमार आजाद(शहीद चंद्रशेखर आजाद के भतीजे के बेटे) - Dainik Bhaskar
अमित कुमार आजाद(शहीद चंद्रशेखर आजाद के भतीजे के बेटे)

शहीद भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु जी की जो तिकड़ी थी, उसकी रीढ़ की हड्डी थे शहीद सुखदेव थापर। ये तिकड़ी सुखदेव थापर के बिना अधूरी थी। इन तीनों के बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। 1919 में जालियांवाला बाग में अंधाधुंध गोलियां चलाकर अंग्रेजों ने जो भीषण नरसंहार किया था, उसकी वजह से देशभर के युवाओं का खून खौल रहा था। उस वक्त सुखदेव थापर बमुश्किल 12 साल के थे। तभी से ही वे बगावत में उतर आए थे।

शहीद सुखदेव थापर का स्वाभाव इतना मिलनसार था कि कोई भी उनसे प्रभावित हुए बिना रह ही सकता था। शहीद चंद्रशेखर आज़ाद भी उनको बहुत स्नेह देते थे और मां भारती का सच्चा सपूत कहते थे। शहीद भगत सिंह भी सुखदेव थापर से अपने दिल की सारी बातें किया करते थे और राय मश्विरा करने के बाद ही क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देते थे।

शहीद सुखदेव थापर को देश प्रेम के साथ-साथ भारत के इतिहास का भी उन्हें बहुत अच्छा ज्ञान था। बहुत ही तीखी बुद्धि वाले सुखदेव थापर ने देश के बहुत से नौजवानों को स्वतंत्रता की जंग के लिए प्रेरित कर लड़ाई में अपने साथ जोड़ा था। वे जितने शरीर से मज़बूत थे उससे कई अधिक आत्मिक और मानसिक स्तर पर मजबूत थे। वे भी चंद्र शेखर आज़ाद जी को पंडित जी कह कर पुकारते थे और दोनों एक दूसरे से अगाध प्रेम करते थे।

क्रांतिकारी मास्टर रूद्र नारायण सिंह थे, जिन्होंने चंद्रशेखर आजाद जी के चित्र खींचे थे, जिनके कैमरे से लिए हुए चित्र ही आज हमारे पास हैं। झांसी में सुखदेव थापर, राजगुरु और भगत सिंह यह सारे लोग मास्टर साहब के यहां रुकते थे। एक बार शहीद भगत सिंह जी की परीक्षा शहीद चंद्रशेखर आजाद जी ने जब जलती हुई मोमबत्ती के ऊपर उनका हाथ रखने पर ली थी तो उस समय भी उस घटना के साक्षी सुखदेव थापर जी थे।

उस समय देश के ज्यादातर क्रांतिकारी एचएसआरए यानी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय कार्यकर्ता थे और आज भी वही संगठन आजाद परिवार बड़े स्वतंत्र रूप से उसी भावना से चला रहा है। अमर शहीद सुखदेव क्रांति के आकाश के वह चमकते सितारे थे, जिनकी वजह से आज देश आजादी की सांस ले रहा है। एक क्रांतिकारी की कुर्बानी से ये देश नहीं आजाद हुआ है। शहीद क्रांतिकारी 7 लाख 32 हजार थे। जिनकी कुर्बानियों के चलते ही हमें स्वतंत्रता मिली है।

अमर शहीद बलिदानी युग पुरोधा दादा चंद्रशेखर आजाद जी ने जो अपने स्मृति पटल पर इस देश के विषय में सोचा था कि उनके रहते इस देश का बाल बांका ना हो पाए उन्हीं शब्दों को सार्थक करने के लिए मैं आज भी तत्पर हूं। संपूर्ण देश में भ्रमण करके शहीदों की विरासत का बखान और वर्तमान की पीड़ा दायक परिस्थितियों के समाधान को सुलझाने का प्रयास करता हूं।

मुनि क्रांतिकारियों द्वारा बनाया गया संगठन एचएसआरए यानी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन को मैं एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करता हूं यह हथियार मुझे उन्हीं क्रांतिकारियों उन्हीं शहीद चंद्रशेखर आजाद द्वारा निर्मित है एवम उन्हीं से प्राप्त हुआ है।

उत्तर प्रदेश के लखनऊ में निवास करते हुए एक छोटे से इलेक्ट्रिकल के काम से अपनी आजीविका चलाने के पश्चात मेरे लिए जो दूसरा काम है वह है भारत मां की सेवा और वह में अंतिम सांस तक करता रहूंगा और यह गर्व मुझे सदा प्रेरणा देता है कि मेरी रगों में अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद जी का रक्त बहता है।

पूजे न गए शहीद तो फिर आजादी कौन बचाएगा, फिर कौन मौत की छाया में जीवन के रास रचाएगा। पूजे न गए शहीद तो फिर यह बीज कहां से आएगा, भारत मां की माटी को माथे से कौन लगाएगा।।

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