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ऑफलाइन क्लासें बंद:फिर से ऑनलाइन क्लासें लगने, घर में ही रहने से स्टूडेंट्स में बढ़ रहा डिप्रेशन-चिंता, रोज आ रहे हैं पांच से सात मामले

लुधियाना3 महीने पहले
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  • ऑनलाइन कक्षाओं में दिलचस्पी न लेने के कारण गिरने लगा पढ़ाई का स्तर, पेरेंट्स भी समस्या से जूझ रहे

कोरोना के केस बढ़ने के कारण एहतियात के तौर पर स्कूलों में ऑफलाइन क्लासें बंद होने से स्टूडेंट्स को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। एक और तो घर में रह-रहकर किशोर परेशान हो चुके हैं। वहीं, उनके व्यवहार में भी बदलाव आने से वो गुस्सैल होते जा रहे हैं। वहीं, कुछ स्टूडेंट्स डिप्रेशन और एंग्जाइटी का शिकार होते जा रहे हैं। साइकोलॉजिस्ट के पास रोज ओपीडी में 5 से 7 नए केस आ रहे हैं, जो सिर्फ एक ही अस्पताल की स्थिति है। इनमें बच्चों के व्यवहार में बदलाव होने के साथ ही अपने दोस्तों से न मिल पाना और पेरेंट्स के साथ बात साझा न कर पाना एक समस्या बनता जा रहा है।

पहले जहां एक साल तक बच्चे कोविड-19 के कारण घरों में ही रहे। वहीं, अब फिर से उसी तरह की स्थिति बनने से उनके मानसिक स्वास्थ्य पर तेजी से असर पड़ रहा है। ऐसे में माहिरों की ओर से इसे गंभीर स्थिति माना जा रहा है। यही नहीं कुछ पेरेंट्स इस समस्या से भी जूझ रहे हैं कि उनके बच्चे ऑनलाइन कक्षाओं में दिलचस्पी नहीं ले रहे और इस कारण उनकी पढ़ाई का स्तर भी लगातार गिर रहा है।

बच्चों को करें प्रोत्साहित

पढ़ाई ऑनलाइन होने से बच्चों ने मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल शुरू कर दिया है। बच्चे क्लासें अॉन कर अपनी क्लास पर ज्यादा ध्यान देने के बजाय मोबाइल पर गेम्स खेलने में समय बीता रहे हैं। इसके कारण उनकी पढ़ाई पर असर आ रहा है, नंबर कम आने से पेरेंट्स और बच्चे दोनों में एंग्जाइटी के केसों बढ़ रहे हैं। ऐसे में पेरेंट्स को भी कुछ सख्त कदम उठाने पड़ेंगे। बच्चों का स्क्रीन टाइम करने के साथ ही उन्हें विभिन्न गतिविधियों में शामिल करना होगा। फोन टाइमर का भी पेरेंट्स इस्तेमाल कर सकते हैं। बच्चों के साथ बातचीत कर उनकी दिलचस्पियों के बारे में जानें, ताकि बच्चों के साथ भी ज्यादा समय बिताया जा सकें। -डॉ. तरलोचन सिंह, साइकोलॉजिस्ट, हुंजन अस्पताल

दोबारा से बढ़ रहे कोरोना केसों ने स्टूडेंट्स और किशोरों पर फिर से असर दिख रहा है। उनके व्यवहार में बदलाव आ रहा है। स्ट्रेस और डिप्रेशन बढ़ रहा है, जो स्टूडेंट्स कंपीटिटिव एग्जाम में बैठने वाले थे, उन्हें ये डर है कि अब प्रतियोगिता और भी ज्यादा बढ़ जाएगी। पहले टीचर्स और दोस्तों से मिलना होता था, अब वो फिर से बंद हो गया। वहीं, पेरेंट्स के साथ बात साझी करने के डर से स्टूडेंट्स अपना पक्ष नहीं रख पाते, ऐसे में व्यवहार बदल रहा है। अपने बच्चों को मानसिक स्वास्थ्य को देखते हुए पेरेंट्स को चाहिए को वो अपने बच्चों की हर बात पर राय बनाना बंद करें और दूसरे बच्चों के साथ तुलना करना बंद करें।

यही बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की नींव है। ये आज खराब हो गई तो आने वाले समय में ऐसी किसी भी तरह की स्थिति आने पर वो खुद को संभाल नहीं पाएंगे। इसलिए पेरेंट्स को भी समझना होगा और बच्चों के साथ बातचीत कर उन्हें समझने का प्रयास करना होगा।
-डॉ. निधि, साइकोलॉजिस्ट, सीएमसी

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