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आज हिंदी दिवस पर विशेष:गर्व की बात, विश्व के 253 देशों की यूनिवर्सिटी में पढ़ाई जाती है हिंदी

लुधियाना16 दिन पहले
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  • माहिरों का मानना सरकारी प्रयासों से ज्यादा समाज की सोच से आगे बढ़ेगी हिंदी, युवाओं से उम्मीद, जिनमें भाषाई सीमा तोड़ सीखने की ललक

(नदीम अंसारी) हिंदी दिवस के मौके पर एक बार फिर यह चर्चा अहम हो जाती है कि क्या भाषा किसी क्षेत्र-धर्म की सीमाओं में बांधी जा सकती है। अगर इस शहर में हिंदी के प्रति समर्पित और इसके प्रचार प्रसार में लगे माहिरों के कामकाज पर नजर डालें तो बिल्कुल सही लगता है कि भाषा सबकी सांझी होती है, चाहे वो हिंदी, पंजाबी या हो ऊर्दू। भाषाएं सिर्फ समाज को जोड़ने का काम करती हैं। इसी शहर से ताल्लुक रखने वाले कई माहिरों ने तो हिंदी की सेवा की ही और हिंदी प्रेम के चलते इस शहर में आने वाले और कई विद्वानों ने भी इस भाषा के प्रचार प्रसार में अहम भूमिका निभाई।

प्रिंसिपल पद से रिटायर होने के बाद भी हिंदी की सेवा के अभियान से जुड़ी हैं डाॅ. नरिंदर कौर संधू
लगभग 25 साल पहले हिंदी में पीएचडी करने वाली शहर के रामगढ़िया गर्ल्स कॉलेज की पूर्व प्रिंसिपल डॉ.नरिंदर कौर संधू भी इस भाषा की सेवा में प्रमुख भूमिका निभा रही हैं। वह बेबाकी से मानती हैं कि ट्रेडिशनल सोसाइटी में भाषाई बंधनों के बीच हिंदी में डॉक्ट्रेट करना एक सामाजिक चुनौती रही। हालांकि इस सबसे बेपरवाह रहते उन्होंने यही सोच बनाई कि भाषाएं एक गुलदस्ते की तरह हैं, जिसमें सबका अपना अलग महत्व है।

रिटायरमेंट के बाद भी डॉ.संधू पंजाब यूनिवर्सिटी और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी के जोनल मुकाबलों में जज की भूमिका निभाती हैं। जहां स्टूडेंट्स मौके पर ही राइटिंग कंप्टीशन में हिस्सा लेते हैं। उनको युवा वर्ग से काफी उम्मीदें हैं, जो नई सोच के साथ भाषाई बंधनों को तोड़कर नया सीखने की ललक रखता है। उनके मुताबिक अहम जिम्मेदारी परिवारों की है कि वे भाषाओं की तुलना करने की बजाए उनके महत्व को समझें और बच्चों को भी समझाएं।
आयोजनों में हिंदी का प्रचार करते रहे डाॅ. बेदी
फिलहाल हिमाचल प्रदेश में सेंट्रल युनिवर्सिटी के चांसलर व जीएनडीयू अमृतसर में हिंदी विभाग के प्रमुख रहे डॉ.एचएस बेदी का भी हिंदी को लेकर इस शहर से खासा जुड़ाव रहा है। कई मौकों पर यहां आए डॉ.बेदी के मुताबिक पंजाब की भूमि हिंदी भाषा व हिंदी साहित्य की जननी है। उनके मुताबिक हिंदी भाषा व साहित्य का सृजन 10वीं सदी में अविभाजित पंजाब के माझा क्षेत्र लाहौर के कवि चंद बरदाई के महाकाव्य के साथ पृथ्वीराज रासो की रचना से हुआ था।

विश्व के 253 देशों की यूनिवर्सिटी में हिंदी विषय की पढ़ाई होने के कारण हर तीसरा व्यक्ति हिंदी-भाषी है। डॉ.बेदी ने लुधियाना और जालंधर के बीच फिल्लौर के रहने वाले पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी पर भी गहन शोध किया। उनके मुताबिक प्रकांड विद्वान श्रद्धाराम फिल्लौरी ने 1870 के आसपास करीब 140 वर्ष पहले एक भजन ‘ओम जय जगदीश हरे’ की रचना की।

हिंदी से कौमी भाईचारे की मिसाल कायम की: करीब दस साल पहले आकाशवाणी जालंधर में प्रोग्राम एक्जिक्युटिव रहे तपन बनर्जी भी हिंदी के प्रति लगाव के चलते इस शहर से भी जुड़े रहे। इंडस्ट्रियलिस्ट व राष्ट्रीय सिख संगत के प्रदेश प्रधान हरमिंदर सिंह मलिक से दोस्ताना रिश्तों के चलते दोनों ने इसी शहर में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए योजना बनाई।

रिटायरमेंट के बाद से छत्तीसगढ़ जा बसे बनर्जी ने दोस्त मलिक के आग्रह पर साल 2004 में “सृष्टि की चादर, गुरु तेग बहादुर’ पुस्तक लिखी थी। शायद हिंदी में गुरु साहिबान पर यह हिंदी की पहली पुस्तक किसी बंगाली लेखक द्वारा लिखा जाना हिंदी प्रेमियों के लिए गौरव का विषय है।

उम्मीदें और पृष्ठभूमि : इन माहिरों की मानें तो पंजाब को केवल पंजाबी भाषाई राज्य मान लेना गलत है। इसी सूबे में नामवर साहित्यकार एस.तरसेम एक अच्छे आलोचक भी रहे। कृष्णा सोबती भी किसी नाम की मोहताज नहीं और हिंदी भाषा में उनकी अच्छी दखल रही है। नामवर शायर साहिर लुधियानवी के फिल्मी गीतों में हिंदी का खूबसूरती से इस्तेमाल रहा और खूब चर्चित रहे।

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