कप्तानी के लिए कैप्टन का दूसरा फ्रेंडली मैच:1992 में अकाली दल से अलग होकर लड़े और हारे, अब कांग्रेस से अलग होकर हॉकी से करेंगे गोल

लुधियाना10 दिन पहलेलेखक: दिलबाग दानिश
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पंजाब का 'कप्तान' बनने के लिए कैप्टन अमरिंदर सिंह एक बार फिर बड़ी राजनीतिक पार्टी से अलग होकर चुनाव मैदान में हैं। सरदारी के लिए फ्रेंडली मैच खेलने के कारण वह खुद निशाने पर भी हैं। पिछली बार शिरोमणि अकाली दल ने उन पर कांग्रेस के साथ मिले होने का आरोप लगाया था और इस बार भाजपा से मिलने के कारण कांग्रेस के ही निशाने पर हैं।

कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सेना से आने के बाद कांग्रेस से राजनीतिक पारी की शुरुआत की थी। 1984 में स्वर्ण मंदिर पर हमले के विरोध में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस छोड़कर शिरोमणि अकाली दल का दामन थाम लिया था। 1992 में कैप्टन ने शिरोमणि अकाली दल से डकाला विधानसभा सीट मांगी, मगर पार्टी ने वहां से गुरचरण सिंह टोहड़ा के दामाद हरमेल सिंह टोहड़ा को टिकट दे दिया। इसके बाद कैप्टन ने तलवंडी साबो सीट मांगी, जहां से वह 2 बार विधायक बन चुके थे, मगर पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के दबाव में उन्हें वह सीट भी नहीं दी गई।

पार्टी फ्लॉप, खरड़ से 856 वोट लेकर तीसरे नंबर पर रहे

अकाली दल से टिकट नहीं मिलने से नाराज कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 1992 में शिरोमणि अकाली दल छोड़कर अकाली दल पंथक नाम से नई पार्टी बना ली। उन्होंने खरड़ और समाना विधानसभा क्षेत्र से नामांकन दाखिल किया। खरड़ में उन्हें 1 लाख 38 हजार 642 में से मात्र 856 वोट ही मिले थे। कांग्रेस के हरनेक सिंह को 4551, बहुजन समाज पार्टी के मान सिंह को 3043, कैप्टन अमरिंदर सिंह को महज 856 और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के जसवीर सिंह को 733 वोट मिले थे। कैप्टन इस सीट से यहां से तीसरे नंबर पर रहे थे।

समाना हलके से कैप्टन जीते थे निर्विरोध

समाना सीट पर उनके बेहद नजदीकी उम्मीदवार ने नामांकन वापस ले लिया और यहां से वह बिना मतदान चुनाव जीत गए थे। उस समय राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा थी कि कांग्रेस का कैप्टन से समझौता था कि उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाएगा, लेकिन बाद में कांग्रेस ने बेअंत सिंह को मुख्यमंत्री बना दिया था।

सोनिया के कहने पर कांग्रेस में गए

1998 में सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली। उनसे कैप्टन परिवार के संबंध थे। सोनिया के आग्रह पर कैप्टन ने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया और 1999 में कांग्रेस हाईकमान ने कैप्टन अमरिंदर सिंह को पंजाब में कांग्रेस का प्रधान बना दिया।

तब अकाली दल के और अब कांग्रेस के निशाने पर

कैप्टन अमरिंदर 1992 में पार्टी से अलग होने के बाद अकाली दल के निशाने पर आ गए थे। अकाली दल के बहिष्कार के कारण कैप्टन ने तराजू चिह्न पर ही चुनाव लड़ा था। अकाली दल ने अमरिंदर सिंह पर कांग्रेस के साथ मिलकर फ्रेंडली मैच खेलने का आरोप लगाया था। अब 2022 का चुनाव कैप्टन कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाकर लड़ रहे हैं। इस बार कांग्रेस उन पर दूसरा फ्रेंडली मैच भाजपा के साथ मिलकर खेलने का आरोप लगा रही है।

सेना से सियासत तक का सफर

मार्च 1942 में पटियाला रियासत में जन्मे कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 1963 में सेना जॉइन की और पाकिस्तान से युद्ध के बाद 1965 सेना छोड़ दी थी। 1977 में कांग्रेस जॉइन की और 1980 में लोकसभा चुनाव लड़ा। 1984 में गोल्डन टेंपल पर हमले के विरोध में कांग्रेस छोड़ी और शिरोमणि अकाली दल का दामन थाम लिया। तलवंडी साबो से विधायक बनने के बाद कैबिनेट मंत्री बने। 1992 में अकाली दल से अलग होकर अपनी पार्टी शिरोमणि अकाली दल (पंथक) बनाई।

1998 में इस पार्टी का विलय कांग्रेस में कर दिया और विधानसभा चुनाव लड़ा। पटियाला से 1998 में विधायक बने और तीन बार कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष रहे। वह 2002 और 2017 में कांग्रेस की ओर से पंजाब के मुख्यमंत्री रहे है। दूसरी बार का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उन्हें कांग्रेस ने मुख्यमंत्री पद से हटा दिया। इसके बाद उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। अब लोक कांग्रेस पार्टी बनाकर चुनाव दंगल में उतर रहे हैं।