कृषि कानून SAD के लिए घाटे का सौदा:पंजाब की 100 साल पुरानी पार्टी को सबसे ज्यादा नुकसान, गांवों में खो रही अपनी पकड़

लुधियाना5 महीने पहलेलेखक: दिलबाग दानिश
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किसान आंदोलन का सबसे बड़ा असर पंजाब में यदि किसी दल पर है तो वह शिरोमणि अकाली दल है। शिरोमणि अकाली दल (SAD) बादल ने 14 दिसंबर को अपना शताब्दी समारोह मनाया है। आजादी के बाद लंबे समय तक पंजाब पर राज करने वाली SAD के सामने किसान आंदोलन ने गंभीर संकट पैदा कर दिया है। पार्टी को गांवों में अपने वजूद की लड़ाई लड़नी पड़ रही है। दरअसल भाजपा से गठबंधन टूटने से पहले अकाली दल का गांव और शहर में बैलेंस बना हुआ था। क्योंकि पार्टी की अपनी छवि गांवों में मजबूत थी और शहरी इलाकों में भाजपा का वोट बैंक मजबूत था।

हरसिमरत का पद छोड़ने का ट्वीट।
हरसिमरत का पद छोड़ने का ट्वीट।

आंदोलन के बीच ही पार्टी के हाथ से केंद्र में मंत्री पद गया। 25 साल पुराना गठजोड़ टूटा और अब ग्रामीण क्षेत्र का किसान वोट बैंक भी हाथ से खिसकता दिख रहा है। विधानसभा चुनाव 2022 सिर पर हैं और अकाली दल के लिए बड़ी चुनौती अपना ग्रामीण वोट बैंक संभालने की है। कृषि कानूनों के कारण बैकफुट पर गए शिअद ने कई बार चुनावी रणनीति बदली, लेकिन अभी तक कुछ हाथ लगता नजर नहीं आ रहा है। शिरोमणि अकाली दल बादल के सरपरस्त प्रकाश सिंह बादल कहते हैं कि अब उनका मुकाबला तीन सरकारों केंद्र में भारतीय जनता पार्टी, दिल्ली में आम आदमी पार्टी और पंजाब में कांग्रेस की सरकार के सामने वह चुनाव लड़ रहे हैं।

गठजोड़ में रहते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस तरह प्रकाश सिंह बादल को सम्मान देते थे।
गठजोड़ में रहते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस तरह प्रकाश सिंह बादल को सम्मान देते थे।

सबसे बड़ा ड्रॉबैक : गठजोड़ में रहते बने कृषि कानून

केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार 5 जून 2020 को कृषि कानूनों के लिए अध्यादेश लेकर आई और बाद में यह कानून बने। इस दौरान शिरोमणि अकाली दल बादल इनका समर्थन कर रही थी और कहा था कि जब कानून बनेंगे तो किसानों को बहुत फायदा होगा। लेकिन किसानों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया। हालांकि अकाली नेता बाद में सरकार से कहते नजर आए कि इन कानूनों के लिए किसान संगठनों से सहमती ली जाए।

14 सितंबर 2020 को केंद्र सरकार ने अध्यादेश संसद में पेश किया और कृषि कानून बने। तब तक किसान इसके खिलाफ प्रदर्शन तेज कर चुके थे। किसानों का समर्थन करते हुए 17 सितंबर 2020 को पार्टी की सीनियर नेता और प्रकाश सिंह बादल की बहू हरसिमरत कौर बादल ने केंद्रीय कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया। हालांकि तब तक बहुत देर हो चुकी थी। किसान पार्टी के खिलाफ मुखर हो चुके थे। इसके 10 दिन बाद ही 27 सितंबर 2020 को पार्टी अध्यक्ष सुखबीर बादल ने भारतीय जनता पार्टी से 25 साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया।

BSP से गठबंधन होने के पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव का मुंह मीठा करवाते हुए शिअद अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल।
BSP से गठबंधन होने के पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव का मुंह मीठा करवाते हुए शिअद अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल।

चुनाव प्रचार शुरू कर BSP से कर लिया गठजोड़

1996 में शिरोमणि अकाली दल (बादल) और बहुजन समाज पार्टी (BSP) के बीच गठबंधन टूट गया था। अकाली दल इसके बाद NDA में शामिल हो गया। नए कृषि कानून बनने के बाद अकाली दल ने NDA से अपना 25 साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर किसान वोट बैंक को साधने के लिए अकाली दल ने प्रचार किया। इसके साथ ही 22 जून 2021 को दोबारा BSP से गठजोड़ कर लिया। दोनों दलों ने तय किया कि अकाली दल पंजाब में 97 और BSP 20 सीटों पर चुनाव लड़ेगा।

अब तक पार्टी अपने 89 उम्मीदवार चुनाव मैदान में भी उतार चुकी है। भाजपा के तीन सीनियर नेता भी अकाली दल जॉइन कर चुके हैं। शिअद तेजी से प्रचार में आगे बढ़ रहा है और जमीन बचाने के लिए भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ प्रचार कर रहा है। ऐसे में दोबारा से भाजपा के साथ गठजोड़ की संभावनाएं नजर नहीं आ रहीं। हालांकि दावा किया जा रहा है कि अकाली दल चुनाव के बाद पाला बदल सकता है।

फिरोजपुर में शिअद विधायक की गाड़ी पर लाठियां भांजते हुए किसान।
फिरोजपुर में शिअद विधायक की गाड़ी पर लाठियां भांजते हुए किसान।

साहनेवाल, मोगा, फिरोजपुर की घटनाओं से बढ़ी परेशानी

कृषि कानूनों के पक्ष में बयान देने और केंद्र सरकार को इन्हें कानून बनाने से न रोक पाने के कारण किसान पहले ही अकाली दल से दूर हैं। संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) के आह्वान पर जब राजनीतिक पार्टियों के विरोध का ऐलान हुआ तो सबसे ज्यादा विरोध अकाली दल को झेलना पड़ा। किसान नेताओं का कहना था कि शिअद गावों में भाईचारे को खत्म कर रही है। 4 सितंबर 2021 को अकालियों ने साहनेवाल में चुनावी सभा की।

इस दौरान किसानों के सख्त विरोध के कारण सुखबीर बादल को स्टेज तक पैदल जाना पड़ा। शिअद ने फोटो जारी करके किसानों को कांग्रेसी करार दिया। वहीं मोगा रैली में किसानों पर पुलिस के लाठीचार्ज और फिरोजपुर में अकाली विधायक ने किसानों को गाड़ी के बोनट पर टांगने व फायरिंग करने के मामलों ने आग में घी डालने का काम किया। इस कारण अकाली दल से पहले ही नाराज चल रहे किसान और दूर हो गए।

मां चिंतपूर्णी के दरबार में पहुंचे सुखबीर बादल व अन्य अकाली नेता।
मां चिंतपूर्णी के दरबार में पहुंचे सुखबीर बादल व अन्य अकाली नेता।

कई बार रणनीति बदल चुका अकाली दल

किसानों के तेज होते विरोध के बीच सुखबीर बादल को अपना चुनाव प्रचार अभियान रोकना पड़ा। बाद में अकाली दल ने शहरी वोट बैंक की ओर रुख किया। सुखबीर मां चिंतापूर्णी मंदिर में नतमस्तक होने के साथ-साथ कई हिंदू धार्मिक स्थलों पर गए। उन्होंने अपना प्रचार पूरी तरह से शहरी वोट बैंक पर केंद्रित कर दिया। अब केंद्र ने कृषि कानून वापस ले लिए तो किसानों का राजनीतिक दलों का विरोध करना बंद हुआ। अब अकाली दल ग्रामीण खेल कबड्डी के जरिए पंजाब के गांवों में घुसने की फिराक में है। हालंकि देखने वाली बात यह रहेगी कि शिअद खोई हुई जमीन बचाने में कहां तक कामयाब हो पाता है।

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