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इस बार छपार मेले पर नहीं होंगी राजनीतिक रैलियां:किसानों की चेतावनी के बाद अकाली दल और AAP ने लिया फैसला, कांग्रेस का रुख स्पष्ट नहीं; मालवा की कई सीटों पर होगा असर

लुधियाना।11 दिन पहले
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पंजाब विधानसभा चुनाव 2022 के लिए काफी अहम माने जाते छपार मेले में इस बार राजनीतिक रैलियां नहीं हो रहीं। पंजाब के किसान संगठनों की तरफ से सुनाए गए फैसले के बाद राजनीतिक पार्टियों ने मेले में रैलियां न करने का फैसला लिया गया है।

चुनाव से पहले यह फैसला काफी अहम है। शिरोमणि अकाली दल बादल की तरफ से इसका ऐलान कर दिया गया है। जबकि आम आदमी पार्टी ने भी यह रैलियां नहीं करने का फैसला लिया है, हालांकि इस आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। वहीं कांग्रेस की तरफ से भी इस पर अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। ध्यान रहे कि इस मेले में पूरे मालवा से लोग आते हैं और यहां राजनीतिक रैलियां न होने का प्रभाव भी केवल लुधियाना की 14 विधानसभा सीटों पर नहीं, बल्कि मालवा की कई सीटों पर पड़ेगा।

शिरोमणी अकाली दल के विधायक मनप्रीत सिंह अयाली।
शिरोमणी अकाली दल के विधायक मनप्रीत सिंह अयाली।

मुल्लांपुर दाखा हलके के विधायक और शिअद नेता मनप्रीत सिंह अयाली ने कहा है कि उनकी तरफ से मेले में रैलियां नहीं करने का फैसला लिया गया है। हालांकि इसके लिए उनकी तरफ से तैयारियां की जा रही थीं। कई जगहों पर मीटिंग भी चुकी थी। दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी (आप) के नेता और मुल्लांपुर दाखा सीट के प्रभारी अमन मोही का कहना है कि हमने फैसला तो ले लिया है कि मेले में सभाओं का आयोजन नहीं किया जाएगा। मगर इसकी अधिकारिक पुष्टि पार्टी की सीनियर लीडरशिप की तरफ से ही की जानी है।

आम आदमी पार्टी नेता अमनदीप मोही।
आम आदमी पार्टी नेता अमनदीप मोही।

बता दें कि हर वर्ष 20 सितंबर को लुधियाना के छपार गांव में लगने वाले मेले में सभी राजनीतिक पार्टियों की तरफ से सभाएं की जाती हैं। इस बार विधानसभा चुनाव में मात्र 6 माह का समय बचा है। ऐसे में राजनीतिक पार्टियों के लिए इस बार यह मेला काफी अहम है क्योंकि इसका प्रभाव केवल लुधियाना की 14 विधानसभा सीटों पर ही नहीं, बल्कि मालवा की कई सीटों पर पड़ेगा। पिछले साल भी छपार मेले में कोरोना वायरस की वजह से रैलियां नहीं हो पाई थीं।

किसान संगठन कर चुके रैलियां न करने की अपील
दिल्ली में चल रहे संयुक्त किसान मोर्चा के संघर्ष के बीच रविवार को 32 किसान संगठनों ने सभी राजनीतिक पार्टियों के साथ बैठक की थी। इस दौरान किसानों ने सभी दलों के नुमाइंदों को नसीहत दी थी कि वह चुनाव आचार संहिता लगने तक किसी भी तरह की राजनीतिक हलचल न करें। इससे यहां कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे संघर्ष को नुकसान होगा और ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की एकजुटता भी भंग होगी। इसके बाद लगभग सभी पार्टियों ने ही अपनी राजनीतिक सभाए बंद कर दी हैं और नेता अन्य तरीकों से लोगों के बीच जा रहे हैं।

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