प्रवचन:जो असफल होने के डर से प्रयास नहीं करते वे ही नाकामयाब होते हैं : स्वामी सच्चिदानंद

मुक्तसर2 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
प्रवचन कार्यक्रम में सद्गुरु स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज से आशीर्वाद प्राप्त करते हुए श्रद्धालु। - Dainik Bhaskar
प्रवचन कार्यक्रम में सद्गुरु स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज से आशीर्वाद प्राप्त करते हुए श्रद्धालु।

श्री कल्याण सच्चिदानंद आश्रम वृंदावन के सद्गुरु स्वामी श्री सच्चिदानंद जी महाराज ने कबीर वाणी के दोहे जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठा। मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठा...। का अर्थ समझाते हुए कहा कि जो मनुष्य कोशिश करता है वो कुछ न कुछ तो जरुर हासिल कर लेता है। मगर कुछ लोग बेचारे ऐसे होते हैं जो डूबने या असफल होने के भय से जिंदगी भर नाकामयाब हो जाते हैं। जैसे सागर में डूबने का भय रखने वाला उसमें उतरने की सोचता ही नहीं है और किनारे ही बैठे रह जाता हैं वैसे ही जीवन में मुश्किलों से डरने व घबरा जाने वाला व्यक्ति कभी कामयाब नहीं हो पाता।

स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज ने ये विचार खेताराम स्ट्रीट स्थित दोदा वालों की कुटिया में आयोजित प्रवचन कार्यक्रम के नौवें दिन प्रवचनों की अमृतवर्षा करते हुए व्यक्त किए। स्वामी जी महाराज ने दोहा संत न छाड़े संतई, जो कोटिक मिले असंत। चंदन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत...। का अर्थ समझाते हुए कहा कि जिन लोगों के संस्कार अच्छे होते हैं वो चाहे कितनी भी बुरी जगह क्यों न चले जाएं, बुरे से बुरे लोगों की संगत में क्यों न हो जाएं, मगर वो लोग कभी अपनी अच्छाई का दामन नहीं छोड़ते।

जिस प्रकार चंदन के पेड़ पर सांप लिपटे रहते हैं परंतु चंदन उनका विष धारण न करते हुए अपनी महक के गुण को नहीं छोड़ता। उसी प्रकार संत व सज्जन लोग चाहे किसी भी व्यक्ति के संग में क्यों न चले जाएं वो अपने सद्गुण नहीं त्यागते। स्वामी जी महाराज ने संत कबीर के एक अन्य दोहे... ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोये, औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होये...यानि की मनुष्य को सदैव ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जो सुनने वाले के मन को भा जाए और उसे आनंदित करे। ऐसी वाणी बोलें जो दूसरों को तो सुख पहुंचाए ही, इसके साथ ही खुद को भी बड़े आनंद की अनुभूति हो। ऐसी वाणी बोलिए जिसके बोलने से बाद में कोई आत्म ग्लानि न हो। कोई पछतावा न हो। इस मौके बड़ी गिनती में श्रद्धालु उपस्थित थे।

खबरें और भी हैं...