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सिद्धू कैम्प ने ताकत दिखाई या कैप्टन पर दबाव बढ़ाया:62 विधायकों के समर्थन का दावा, मगर अमृतसर में जो नेता साथ दिखे उनमें से कई नहीं हैं विधायक, अब नजरें कैप्टन पर

जालंधर10 दिन पहलेलेखक: मनीष शर्मा
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अमृतसर में बुधवार को कांग्रेस के नए प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू के घर पर जमा पार्टी के नेता। - Dainik Bhaskar
अमृतसर में बुधवार को कांग्रेस के नए प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू के घर पर जमा पार्टी के नेता।

पंजाब में प्रदेश कांग्रेस के नए प्रधान नवजोत सिंह सिद्धू ने बुधवार को अमृतसर में दरबार साहिब में माथा टेका। दरबार साहिब में माथा टेकने से पहले सिद्धू कैम्प ने अपनी ताकत दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ा और दावा किया कि पंजाब में कांग्रेस के 77 विधायकों में से 62 एमएलए उनके साथ हैं जिनमें 4 मंत्री भी है। अगर इस दावे पर यकीन करें तो औपचारिक रूप से कुर्सी संभाले बगैर ही नवजोत सिद्धू बड़ी संख्या में विधायकों को अपने खेमे में लाकर विरोधियों को यह संदेश देने में कामयाब रहे हैं कि उन्हें हल्के में लेने की चूक भारी पड़ सकती है।

दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी में ही इस बात को लेकर चर्चा हो रही है कि सिद्धू कैम्प का दावा कितना खरा है क्योंकि उनके साथ जो नेता दरबार साहिब पहुंचे, उनमें कई विधायक नहीं थे जैसे कि सुनील जाखड़, शेर सिंह घुबाया, हरमिंदर जस्सी, पंजाब यूथ कांग्रेस प्रधान बरिंदर ढिल्लों और नए कार्यकारी प्रधान बने पवन गोयल। हां, ये बात काफी हद तक सही है कि विधायकों के साथ-साथ कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने भी प्रधान बने सिद्धू के स्वागत में जो गर्मजोशी दिखाई, उससे कैप्टन खेमे में हलचल जरूर है।

117 सदस्यों वाली पंजाब विधानसभा में कांग्रेस के 77 विधायक हैं। आम आदमी पार्टी के 3 विधायक भी कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। बड़ी संख्या में विधायकों के अलावा कैप्टन सरकार में ‘माझा ब्रिगेड’ कहलाने वाले पंचायतीराज मंत्री तृप्त राजिंदर बाजवा, सहकारिता मंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा और राजस्व मंत्री सुख सरकारिया के अलावा तकनीकी शिक्षा मंत्री चरणजीत चन्नी भी सिद्धू कैंप में पहुंच गए हैं। ऐसे में पंजाब की सियासी फिजा में सबसे बड़ा सवाल यही है कि विधायकों-मंत्रियों के इतनी जल्दी और इतनी बड़ी संख्या में पाला बदलने के मायने क्या हैं? वह भी तब जब कैप्टन अमरिंदर सिंह के पास कैबिनेट विस्तार का ‘ट्रंप कार्ड’ मौजूद है।

ये मंत्री-विधायक दिखे सिद्धू के साथ
कार्यकारी प्रधान संगत सिंह गिलजियां, सुखविंदर सिंह डैनी और कुलजीत सिंह नागरा के अलावा तृप्त राजिंदर बाजवा, सुखबिंदर सिंह सरकारिया, चरणजीत सिंह चन्नी, परगट सिंह, तरसेम सिंह डीसी, अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, डॉ. राजकुमार वेरका, सुनील दत्ती, बावा हैनरी, मदनलाल जलालपुर, अंगद सैनी, इंद्रबीर सिंह बुलारिया, हरमिंदर सिंह गिल, दविंदर सिंह घुबाया, सुरजीत सिंह धीमान, दीपंदर सिंह ढिल्लों, जोगिंदर पाल, हरजोत कमल, निर्मल सिंह मानशाहिया, सुरिंदर डाबर, प्रीतम कोटभाई, मदन लाल बग्गा, दर्शन सिंह बराड़, कुलबीर जीरा, परमिंदर पिंकी, गुरकीरत सिंह कोटली, वरिंदरजीत पाहड़ा, कुशलदीप किक्की ढिल्लों, सुरजीत सिंह काका लोहगढ़ और आम आदमी पार्टी से आए जगदेव सिंह कमालू और पीरमल सिंह खालसा।

अमृतसर में दरबार साहिब जाते समय बस में सिद्धू के साथ कांग्रेस के विधायक।
अमृतसर में दरबार साहिब जाते समय बस में सिद्धू के साथ कांग्रेस के विधायक।

पढ़िए 5 बड़े कारण... जिनकी वजह से सिद्धू संग जुट रहे मंत्री-विधायक

  • टिकट की चिंता: पंजाब में 7 महीने बाद विधानसभा चुनाव हैं। कांग्रेस हाईकमान ने कैप्टन अमरिंदर सिंह के पुरजोर विरोध के बावजूद जिस तरह सिद्धू को प्रधान बनाया है, उसे देखते हुए विधायकों को लग रहा है कि विधानसभा चुनाव के लिए टिकट बंटवारे में भी कैप्टन से ज्यादा सिद्धू की चलेगी।
  • हाईकमान की नाराजगी का डर: सिद्धू को पंजाब कांग्रेस की कमान सौंपने का फैसला पार्टी हाईकमान यानी सोनिया गांधी, राहुल गांधी व प्रियंका गांधी का है। सिद्धू की ताजपोशी न कैप्टन रोक सके और न ही पंजाब के सांसद। ऐसे में सिद्धू से दूरी हाईकमान को नाराज कर सकती है और कोई भी विधायक यह रिस्क लेने के मूड में नहीं है।
  • जीत की उम्मीद : पंजाब में कैप्टन सरकार की साढ़े 4 साल की कारगुजारी से उनके ही विधायक खुश नहीं हैं। बेअदबी, ड्रग्स, खनन माफिया-ट्रांसपोर्ट माफिया पर कार्रवाई जैसे जिन बड़े मुद्दों को लेकर कैप्टन सत्ता में आए थे, वह हल नहीं हुए। ऐसे में दो महीने पहले तक कांग्रेसी विधायकों को लग रहा था कि कैप्टन के सहारे अगला चुनाव जीतना आसान नहीं होगा। अब उन्हें सिद्धू के रूप में उम्मीद की किरण नजर आ रही है। सरकार की नाकामी का ठीकरा कैप्टन पर फूटेगा।
  • कैप्टन से नाराजगी : कांग्रेस के ज्यादातर विधायक कैप्टन अमरिंदर सिंह से इसलिए भी नाराज हैं क्योंकि वह उनकी पहुंच से हमेशा दूर रहे। सूबे में अपने और समर्थकों के काम नहीं होने की शिकायत भी एमएलए कैप्टन तक नहीं पहुंचा सके। हाईकमान तक सीधी पहुंच और पंजाब में संगठन के भीतर कैप्टन के दबदबे की वजह से अब तक किसी ने मुंह नहीं खोला लेकिन हाईकमान ने जैसे ही सिद्धू पर दांव खेला, सब उनके साथ आ गए।
  • अफसरशाही से परेशानी : कैप्टन सरकार में कांग्रेस विधायकों को सबसे बड़ी दिक्कत अफसरों से रही। एमएलए सरेआम कहते रहे हैं कि सरकार बेशक कांग्रेस की है मगर आज भी कांग्रेस नेताओं से ज्यादा अकालियों की चलती है। कैप्टन के कई मंत्री भी सरेआम कैप्टन के चीफ प्रिंसिपल सेक्रेटरी सुरेश कुमार को ज्यादा तरजीह मिलने का दुखड़ा रो चुके हैं।
दरबार साहिब परिसर में सिद्धू के साथ जुटे विधायक व मंत्री।
दरबार साहिब परिसर में सिद्धू के साथ जुटे विधायक व मंत्री।

जानिए... क्यों बेअसर होता नजर आ रहा कैप्टन का ‘ट्रंप कार्ड

CM कैप्टन अमरिंदर सिंह को कैबिनेट में फेरबदल करना है और इसके लिए उन्हें कांग्रेस हाईकमान से फ्री हैंड मिला है। इसके बावजूद कांग्रेस के ज्यादातर एमएलए मंत्री बनने के इच्छुक नहीं हैं। उनका मानना है कि महज 6 महीने के लिए मंत्री बनकर कोई फायदा नहीं होने वाला। उल्टा लोगों की नाराजगी और बढ़ेगी। कैप्टन के मंत्री बनने की जगह वह सिद्धू के साथ चलकर कह सकते हैं कि कैप्टन ने उनकी सुनवाई नहीं की। वैसे भी, पंजाब में अगले साल जनवरी-फरवरी में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं।

नवजोत सिद्धू के शक्ति प्रदर्शन में बड़ी संख्या में विधायकों के जुटने से कैप्टन की चिंता बढ़ेगी।
नवजोत सिद्धू के शक्ति प्रदर्शन में बड़ी संख्या में विधायकों के जुटने से कैप्टन की चिंता बढ़ेगी।

संगठन और सरकार में टकराव के बहाने हाईकमान अब कैप्टन पर बढ़ाएगा सुलह का दबाव नवजोत सिंह सिद्धू के दावे के मुताबिक अगर 62 विधायक उनके साथ हैं तो फिर सबसे बड़ा सवाल यही है कि अब कैप्टन क्या करेंगे? कैप्टन अमरिंदर सिंह कह चुके हैं कि जब तक सिद्धू उन पर लगाए गए आरोपों के लिए सार्वजनिक माफी नहीं मांगते, वह उनसे नहीं मिलेंगे। मौजूदा माहौल और सिद्धू के कैरेक्टर को देखा जाए तो वह इन आरोपों के लिए माफी मागेंगे, इसकी संभावना बहुत कम है। ज्यादातर कांग्रेसी भी मानते हैं कि नवजोत सिद्धू पार्टी संगठन के सूबा प्रधान हैं और उन्हें माफी मांगने की कोई जरूरत नहीं। मंत्री सुखजिंदर रंधावा और तृप्त राजिंदर बाजवा के अलावा विधायक मदन जलालपुर व परगट सिंह भी सिद्धू के माफी मांगने के पक्ष में नहीं हैं। दूसरी तरफ कैप्टन की झुकने की उम्मीद भी नहीं है। ऐसे हालात में सरकार और संगठन में टकराव बढ़ा तो हाईकमान दखल देते हुए कैप्टन पर सुलह के लिए दबाव बढ़ा सकता है।

क्या ताजपोशी मिटाएगी दिलों की दूरियां?
23 जुलाई यानी शुक्रवार को चंडीगढ़ स्थित पंजाब कांग्रेस भवन में नवजोत सिद्धू की औपचारिक ताजपोशी है। वहां पंजाब कांग्रेस के प्रभारी हरीश रावत भी आएंगे। देखना दिलचस्प रहेगा कि क्या उस समय रावत सिद्धू और कैप्टन की दिलों की दूरियां मिटा पाते हैं या नहीं? नवजोत सिंह सिद्धू के साथ ही बनाए गए 4 कार्यकारी प्रधानों में से एक- कुलजीत नागरा ने कैप्टन से 23 जुलाई को पंजाब कांग्रेस भवन आने की अपील पहले ही कर दी है। सिद्धू कैम्प का कहना है कि इस ताजपोशी के लिए कैप्टन अमरिंदर सिंह को बाकायदा औपचारिक निमंत्रण भी भेज जाएगा।

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