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दूषित पर्यावरण:किसान कुलदीप 6 वर्षों से पराली की गांठें बना वातावरण को दूषित होने से बचा रहा, पराली की गांठें बनाने को बनाया स्वरोजगार का साधन

फाजिल्का3 दिन पहले
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किसान कुलदीप
  • हर वर्ष 2500 एकड़ पराली की गांठें बना पर्यावरण को दूषित होने से बचा रहा, झाड़ भी अधिक प्राप्त कर रहा
  • धान के सीजन में 80 से 100 युवाओं को प्रदान करते हैं रोजगार

(संजीव झांब) फाजिल्का के गांव बेंगावाली का किसान कुलदीप कुमार पिछले 6 सालों से धान की पराली की गांठें बना कर वातावरण को दूषित होने से बचा रहा है और समाज के लिए अपना फर्ज निभा रहा है। इस किसान के पास 2 रैक बैलर हैं। कुलदीप कुमार ने 2014 से पराली की गांठें बनाने का काम शुरू किया हुआ है। इसी प्रकार फाजिल्का के गांव न्योला के किसान अशोक आहूजा भी इस क्षेत्र में अपने आप में मिसाल बन रहे हैं। किसान अशोक आहूजा जिसने पंजाब कृषि यूनिवर्सिटी लुधियाना से एग्री मशीनरी में एम.टैक की हुई है और अपनी शैक्षणिक योग्यता को बड़े ही सुचारू ढंग के साथ इस्तेमाल करते अपनी खेती को अच्छे स्थान और पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। फसली विभिन्नता को अपनाने हुए अपनी खेती योग्य जमीन और गन्ना, मटर, आलू आदि फसलों भी बुआई करते हैं और कुदरती स्रोतों का सुचारू इस्तेमाल करते हैं। यह किसान पिछले तीन सालों से धान की पराली को अलग अलग तरीकों से जमीन में जोत कर वातावरण को दूषित होने से बचा रहे हैं।

पराली की गांठें बनाने को बनाया स्वरोजगार का साधन
यह किसान अपने गांव के अलावा आसपास के गांवों हीरांवाली, बोदी वाला, सजराना, किक्कर वाला रूपा, चुवाडियांवाली, कौडिय़ां वाली आदि गांवों में गांठें बनाने का काम करते हैं। यह धान की पराली और अवशेष की गांठें बना खेत में से बाहर निकाल लेते हैं जिससे खेत को आगे वाली फसल के लिए तैयार किया जा सके। कुलदीप कुमार का कहना है कि वह तकरीबन 2500 एकड़ में धान की पराली की गांठें बना कर वातावरण को दूषित होने से बचाने के लिए अपना योगदान डालते हैं। रैक बेलर उनके लिए स्वरोजगार का साधन भी है।

धान के सीजन में 80 से 100 युवाओं को प्रदान करते हैं रोजगार
कृष्ण कुमार ने बताया कि वह अपने रोजगार के साथ गांव व आसपास के युवकों को प्रतिवर्ष धान के सीजन के दौरान 80 से 100 व्यक्तियों को रोजगार प्रदान करते हैं। इस किसान का कहना है कि सरकार उन कैंपों में हरेक किसान को भाग लेना चाहिए क्योंकि कैंपों दौरान किसानों को बहुत अनमोल जानकारी दी जाती है। वह आप जी कैंपों में भाग लेते हैं और कृषि करने के अलावा खेती के आधुनिक यंत्रों बारे भी जानकारी प्राप्त करते हैं। उनका कहना है कि कोई भी किसान भाई अपने धान की अवशेष को आग न लगाए बल्कि पराली की सुचारू प्रयोग करे।

यूनिवर्सिटी की सिफारिशों के अनुसार करते हैं खेती
अशोक आहूजा का कहना है कि वह 60 से 65 एकड़ में खेती करता है जिसमें धान और बासमती की काश्त भी की जाती है। यह अपनी फसल में यूनिवर्सिटी द्वारा सिफारिश की खादें, बीज, नदीन नाशक और कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं। जिस कारण इन ो फसल का अच्छा झाड़ प्राप्त होता है और पराली प्रबंधन में इस्तेमाल किए जाने वाले यंत्रों की तकनीकी जानकारी रखते हैं। इन्होंने कृषि विभाग से मिले अनुदान पर भी पराली प्रबंधन के लिए मशीनों की खरीद की हुई है।

दूसरे किसानों की उपेक्षा प्राप्त कर रहे हैं अधिक झाड़

किसान ने कहा कि पहले साल जब पराली प्रबंधन किया जिस में केवल रोटरी स्लेसर और रोटावेटर का इस्तेमाल करते गेहूं की बिजाई की और अच्छा झाड़ प्राप्त किया, परन्तु पहले साल कम तजुर्बे कारण पराली प्रबंधन में कुछ मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा, परंतु हार न मानते दूसरे साल चोपर और रोटावेटर का इस्तेमाल करते गेहूं की बिजाई की। जिसमें दूसरे किसानों से अधिक झाड़ प्राप्त हुआ। पिछले साल उपरोक्त मशीनों से गेहूं की बिजाई से पराली जमीन में जोती थी। उस कारण इस बार खादों की कम जरूरत पड़ी और अधिक झाड़ प्राप्त हुआ। जो भी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है उसमें संशोधन करते हर साल अच्छी फसल की काश्त करते हैं।

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