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नानक शाह फकीर- हिंदू-सिखों के गुरु, मुस्लिमों के पीर:करतारपुर साहिब जहां हिंदू-सिख झुकाते हैं सिर, मुस्लिम करते हैं सजदा, गुरुद्वारे में ही बाबा नानक की मजार

करतारपुर साहिब (पाकिस्तान)7 महीने पहलेलेखक: अनुज शर्मा

नफरत के इस दौर में जब धर्म को लेकर खाइयां खोदी जा रही हैं, ऐसे में गुरुघर करतारपुर साहिब सर्वधर्म समभाव की जीती-जागती मिसाल है। बाबा नानक का यह स्थान सिर्फ हिंदू-सिखों की आस्था का ही केंद्र नहीं है बल्कि मुस्लिम भी यहां आकर बड़ी संजीदगी से सजदा करते हैं। बाबा नानक जहां हिंदुओं और सिखों के गुरु हैं वहीं मुस्लिम उन्हें अपना पीर पैंगबर मानते हैं।

हिंदुस्तान में डेरा बाबा नानक से 5 किलोमीटर दूर पाकिस्तान में बने करतारपुर साहिब में गुरु नानकदेव जी ने अपनी जिंदगी के आखिरी 18 साल गुजारे। यहीं पर उनकी मजार बनी है, जहां मुस्लिम चादर चढ़ाकर सिर झुकाते हैं।

लगभग 20 महीने बाद करतारपुर कॉरिडोर खुल जाने से पंजाबियों में यहां आने को लेकर खासा उत्साह है। आइए जानते हैं इस जगह की कुछ ऐसी बातें, जो शायद दोनों देशों के बीच दरार खिंच जाने के बाद पाकिस्तान में ही रह गई।

कहा जाता है कि गुरु नानकदेव ने अपने जीवन के 17-18 साल यहां गुजारे। करतारपुर साहिब को उन्होंने ही बसाया। किरत (मेहनत) कर वंड छकण (बांट कर खाने) का संदेश यानी लंगर प्रथा का संदेश उन्होंने इसी स्थान से दिया। बरसों तक उन्होंने यहां खेती की। रैहटों या टिंडो वाला खुह (कुआं) आज भी यहां है, जहां से पानी लेकर बाबा नानक खेतों में सिंचाई किया करते थे। इसी कुएं के पास गुरुघर बना है और उसके बिल्कुल बाहर मजार है।

हिंदू करना चाहते थे संस्कार, मुसलमान सुपुर्द-ए- खाक
अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार गुरु नानकदेव का देहांत 22 सितंबर 1539 को करतारपुर साहिब में हुआ। वह सिखों के पहले गुरु तो थे, लेकिन उनके चाहने वाले हिंदू भी थे और मुस्लिम भी। बाबा नानक के देहांत के बाद हिंदुओं और मुसलमानों में बातें होने लगी। हिंदुओं ने जहां उनका संस्कार करने की बात कही वहीं मुसलमानों की इच्छा उन्हें सुपुर्द-ए-खाक करने की थी। मगर जब हिंदू और मुस्लिम भाईचारे के लोग उनकी बॉडी लेने पहुंचे तो वहां सिर्फ एक चादर और उसके नीचे दाे फूल मिले। यह देखकर सब हैरान रह गए। अंत में चादर को ही दो हिस्सों में बांट लिया गया। एक फूल हिंदुओं ने और दूसरा मुसलमानों ने अपने पास रख लिया।

करतारपुर साहिब में बनाई गई मजार
मुसलमान भाईचारे ने उस आधी चादर और फूल को सुपुर्द-ए-खाक करके मजार बना दी। यह मजार आज भी करतारपुर साहिब गुरुघर के बाहर बनी है। मुसलमान आज भी यहां आते हैं और चादर चढ़ाते हैं। इस मजार को इतना सम्मान दिया जाता है कि अगर कोई उसकी तरफ पीठ भी कर ले तो सेवादार आकर तुरंत टोक देते हैं। इसके बिल्कुल पास बने गुरुघर में वह स्थान है जहां हिंदुओं ने आधी चादर का दाह संस्कार कर समाधि बनाई। इसी भवन में श्री गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश किया गया है।

कभी दूरबीन से देखते थे, अब आंखों के सामने
करतारपुर साहिब गुरुघर कभी मात्र तीन एकड़ में फैला था। किसी का ध्यान न होने के कारण यह खंडहर में तबदील होता जा रहा था। भारतीय पंजाब में सिख श्रद्धालु डेरा बाबा नानक से ही दूरबीन की मदद लेकर इसके दर्शन किया करते थे। पाकिस्तान के वर्तमान प्रधानमंत्री इमरान खान ने ही यहां 40 एकड़ जगह पर सुंदर करतारपुर साहिब गुरुघर बनाने का मन बनाया। उसके बाद ही करतारपुर कॉरिडोर बनाकर दोनों मुल्कों के बीच लांघा (रास्ता) खोला गया। इसकी वजह से अब हिंदोस्तान के सिख श्रद्धालु महज एक दिन में यहां के दर्शन कर वापस लौट आते हैं।

कुआं, जहां से गुरु नानकदेव सिंचाई के लिए लेते थे जल
करतारपुर में गुरुघर के बाद दूसरी सबसे सुंदर जगह यहां का वो कुंआ है जिससे पानी लेकर गुरु नानकदेव अपने खेतों में सिंचाई किया करते थे। आज भी उस कुंए को सहेज कर रखा गया है। खास बात है कि इस कुएं का पानी आज तक सूखा नहीं है। वैसा ही मीठा जल अब भी इस कुएं में है। इस कुएं में रैटें (टिंडे) आज भी वैसे ही लगी हैं। बैलों को जोतकर रैटों को पानी के लिए घुमाने वाली मशीन भी वैसे की वैसी यहां मौजूद है। दुनियाभर से आने वाले श्रद्धालु बोतलों में इस कुएं का जल भरकर लेकर जाते हैं। कुएं के पास विशेष तौर पर पानी के लिए नल लगाए गए हैं।

गुरुघर में औरतों और मर्दों के लिए दो बाथरूम
बाबा नानक के कुएं के जल से स्नान के लिए गरुघर में दो बड़े-बड़े तालाबनुमा स्नानागार (बाथरूम) बनाए गए हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु इन स्नानागारों में डुबकी लगाकर खुद को धन्य मानते हैं। इसके बाद वह गुरुघर में दर्शन के लिए जाते हैं। यह स्नानगार गुरुघर में प्रवेश करने के बाद जोड़ाघर के पास बने हैं। अपने जोड़े (जूते) जमा करवाने के बाद श्रद्धालु आस्था अनुसार यहां जाकर स्नान करते हैं। दूसरी ओर दीवान हाॅल है जहां दीवान सजाए जाते हैं। इस हॉल को भी नया बनाया गया है। अंदर सफेद रंग किया गया है और उसे संगमरमर से तैयार किया गया है।

फकीरखाना म्यूजियम में पुरानी तस्वीरें
करतारपुर गुरुद्वारा परिसर में ही फकीरखाना म्यूजियम बना है। इसमें करतारपुर कॉरिडोर का पूरा नक्शा और यहां की पुरानी दुर्लभ फोटोग्राफ लगाई गई हैं। म्यूजियम के पीछे बनी नई इमारत में लंगर घर है।

खरीददारी के लिए दुकानें भी
करतारपुर साहिब गुरुघर में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यहां एक मार्केट भी बनाई गई है। यहां सिर्फ भारतीय ही शॉपिंग कर सकते हैं। कॉरिडोर खुलने के बाद यह मार्केट पूरी तरह से खुल भी नहीं पाई थी कि कोरोना की वजह से कॉरिडोर बंद करना पड़ गया। अब कॉरिडोर दोबारा खुलने के बाद पिछले हफ्तेभर में यहां दोबारा रौनक लौटने लगी है।

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