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बढ़ई का अनोखा आविष्कार:लॉकडाउन में जिया बेटे का सपना; स्कूटी का इंजन, कार का स्टेयरिंग और बाइक के पहिए लगाकर बनाई वुडन एंटीक गाड़ी

मोगा2 महीने पहले
मोगा में लकड़ी की बॉडी में कबाड़ से जुटाई चीजों को मिलाकर बनाई गई अनोखी कार को देखने आए लोग।

(नवदीप सिंगला). सालभर पहले जब लोग कोरोना महामारी के चलते घरों में कैद हो मायूस नजर आ रहे थे तो मोगा के एक एक शख्स ने बेटे के सपने को पूरी शिद्दत के साथ जिया। पेशे से बढ़ई इस शख्स ने एक अनोखी कार बना डाली। इस वुडन एंटीक कार को न सिर्फ देखने, बल्कि खरीदने के लिए लोगों के आने का सिलसिला शुरू हो गया है। हालांकि वह इसे बेचने को तैयार नहीं है, क्योंकि यह बेटे का गिफ्ट जो ठहरी। ऐसा क्या खास है इस कार में, आइए थोड़ा विस्तार से समझते हैं...

मोगा जिले के कस्बा बाघापुराना के मोगा रोड पर स्थित नई डेवलप हुई कॉलोनी में रह रहा रूपिंदर सिंह लकड़ी का मिस्त्री है। उसके दो बेटे हैं और इनमें से बड़ा बेटा गुरविंदर सिंह पिछले चार-पांच साल से लकड़ी की कार बनाकर देने के लिए जिद कर रहा था।

रूपिंदर ने बताया कि 10 साल पहले वह परिवार के साथ शिमला घूमने गया तो वहां से बेटों के लिए लकड़ी से बनी छोटी खिलौना कार खरीदी थी। बेटा बड़ा होने पर शिमला में खरीदी कार को बडी बनाने के लिए कहने लग गया, लेकिन काम के कारण उसे इस इच्छा की पूर्ति के लिए समय नहीं मिलता था। अचानक मार्च 2020 में कोरोना संक्रमण के चलते लॉकडाउन लग गया और लोग घरों में कैद होकर रह गए। इसी दौरान उसने सोचा कि इससे ज्यादा बेहतर वक्त और हो ही नहीं सकता।

उसने कबाड़ी की दुकान से साढ़े आठ हजार रुपए में पुरानी स्कूटी खरीदी और उसके इंजन को निकालकर ठीक करवाया। फिर मोटरसाइकल के चार पहिये खरीदे और कबाड़ में खड़ी मारुति कार का स्टेयरिंग लिया। अंदर का सारा जुगाड़ हो गया तो फिर उसे जोड़कर दौड़ाने लायक बनाने का क्रम भी शुरू हो गया। लकड़ी का मिस्त्री होने के चलते रूपिंदर के पास जहां लकड़ी की कमी नहीं थी, वहीं लकड़ी के चयन का यह हुनर भी था कि कार ज्यादा भारी भी न बने। उसने कैल की कच्ची लकड़ी खरीदी। 40 फीट लकड़ी से पूरी बॉडी बनाई, लाइट वगैरह लगाई और एक साल की मेहनत से सिर्फ 1 लाख रुपए में अनोखी कार तैयार हो गई।

सपनों की कार को सड़क पर दौड़ाने के लिए तैयार करते रूपिंदर और उसका बेटा।
सपनों की कार को सड़क पर दौड़ाने के लिए तैयार करते रूपिंदर और उसका बेटा।

अब उसके दोनों लाडले कॉलोनी की सड़कों पर अपनी यह खास लेकर घूमते हैं तो रूपिंदर का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है कि उसने वक्त का कितना अच्छा फायदा उठाया है। कई लोग इस कार को खरीदने के लिए आ चुके हैं, लेकिन रूपिंदर का कहना है कि उसने यह कार बच्चों की खुशी के लिए बनाई है, न कि बेचने के लिए। रूपिंदर के 15 साल के बेटे गुरविंदर सिंह का कहना है कि काम बंद होने से उसके पिता थोड़े मायूस भले ही थे, लेकिन इस खास वक्त में उन्होंने उसकी तमन्ना पूरी करके उसे और उसके भाई को अभी तक की सबसे बड़ी खुशी दी है।