अहम फैसला सालों से चल रहा था विवाद:दरगाह की ऐतिहासिक देगों को ‘लूटने’ का बावर्चियों को नहीं कोई हक

अजमेरएक महीने पहले
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  • दरगाह कमेटी के खिलाफ मौरूसी बावर्चियों की अपील खारिज

अपर जिला न्यायाधीश कौशल सिंह ने ख्वाजा साहब की दरगाह में बादशाह अकबर के जमाने से बनी देगों से खाना लूटने के हक को लेकर मौरूसी बावर्चियों की दरगाह कमेटी के खिलाफ दायर अपील नामंजूर कर दी है। अदालत ने माना कि न तो इस तरह की कोई रीति रिवाज साबित हुआ है आैर ना ही मौजूदा कानून में किसी को देग लूटने का हक व अधिकार है। अपीलीय अदालत ने निचली अदालत के फैसले को सही बताया है।

हाजी सैयद अब्दुल कुदुस सहित अन्य की ओर से दरगाह कमेटी के विरूद्ध अपील दायर अपील का निपटारा करते हुए एडीजे कौशल सिंह ने पारित निर्णय में कहा कि अपीलार्थी पक्ष की ओर से जो साक्ष्य न्यायालय में पेश हुई है उसमें उनके द्वारा यह तथ्य भी कहीं सिद्ध नहीं किया गया है कि लूट हेतु कोई रीति रिवाज हो। इसके बावजूद विधायिका द्वारा जब कोई कानून बना दिया जाता है तो ऐसी स्थिति में रीति रिवाज के संदर्भ में कोई मायने नहीं रह जाते।

अदालत ने दरगाह कमेटी द्वारा इस संबंध में पेश कानूनी प्रावधानों का समर्थन करते हुए कहा कि किसी को देग लूटने का अधिकार नहीं है। कमेटी ने जो बायलॉज पेश किए उसमें स्पष्ट है कि लूट प्रतिबंधित है। देगों की देखरेख दरगाह कमेटी करती है। इसलिए बावर्चियों को देग लूट का अधिकार नहीं है।

अदालत के समक्ष यह था प्रमुख प्रश्न वादी पक्ष सदियों पुराने रीति रिवाज के मुताबिक दरगाह स्थित बडी व छोटी देग के (पत्तरदारान) (हिस्सेदारान) से वंशज हैं उक्त देगों की रीति रिवाज अनुसार पूर्वजों से अनुलाभ स्वरूप खाना निकालने अथवा लूटने के अधिकारी हैं?
यह था बावर्चियों का पक्ष

अजमेर स्थित दरगाह में दो लोहे की बडी देग है। दरगाह में खिदमत करने वाले मसालची, बावर्ची, झाडूकस, नकारसी आदि सदियों से खिदमत करते आ रहे हैं जिनकी तनख्वाह मुकर्रर है। देगों का खाना लेने का हक को पत्तर कहते हैं उनके वंशज इस खाने को देगों में से निकालते हैं जिसे रीति रिवाज अनुसार लूट कहते हैं। खिदतमगार लूट को बेचकर अपना गुजारा करते हैं।

बाद में दरगाह एक्ट प्रभाव में आ गया। पिछले कुछ वर्षों से एक भी देग में वादीगण को उनका कोई हिस्सा नहीं दिया जा रहा है। नाजिम का उक्त कृत्य नाजायज व गैरकानूनी है। मौरूसी बावर्चियों ने देगों में से खाना निकालने व लूटने के अधिकारी होने की घोषणात्मक डिक्री पारित करने की मांग की थी।

दरगाह कमेटी की यह थी दलील

दरगाह कमेटी में विभिन्न पदों पर कार्यरत कर्मचारियों को वेतन दिया जाता है। दरगाह ख्वाजा साहब एक्ट के अंतर्गत देग दरगाह एण्डाउमेंट का एक भाग है जिसकी व्यवस्था कमेटी द्वारा की जाती है। कथित रीति रिवाज गैरकानूनी व नियम विरुद्ध होने से प्रभावशाली नहीं है। दरगाह एक्ट के अनुसार देगों में पके हुए खाने को लूटना प्रतिबंधित किया गया है। वादी पक्ष को देग में पके खाने को प्राप्त करने का कोई विधिक अधिकार नहीं है। रीति रिवाज के आधार पर वादीगण कोई घोषणात्मक अनुतोष प्राप्त करने के अधिकारी नहीं है।

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