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जालसाजी:एक क्लिक पर एडीए की जमीनों से जुड़ी जानकारी मिलने की झूठी वाह-वाही लूट गए पूर्व आयुक्त !

अजमेर5 दिन पहले
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  • आरआईएसएल से कर लिया एमओयू लेकिन पैसा नहीं दिया, अब तक काम शुरू ही नहीं हुआ, मार्च के बाद से फाइल पड़ी है डंप

एडीए की कितनी जमीन कहां और किसके नाम पट्‌टे हैं, कहां अतिक्रमण हुआ है और किस जमीन को लेकर कानूनी कार्रवाई चल रही है, यह सब जानकारी एक क्लिक पर उपलब्ध होगी। ऐसा कुछ दावा एडीए के पूर्व आयुक्त गौरव अग्रवाल ने पिछले साल दिसंबर में किया था।

करीब एक साल पूरा होने के बाद भी जब इस मामले में कुछ नहीं हुआ तो एक जागरूक शहरी ने आरटीआई के तहत अर्जी लगाकर जानकारी ली तब खुलासा हुआ कि ऑनलाइन का काम करने वाले राजकॉम्प इंफो सर्विसेस लिमिटेड से एमओयू तो कर लिया लेकिन उन्हें रकम का भुगतान ही नहीं किया इसलिए काम शुरू ही नहीं हो पाया। एडीए की आमजन से जुड़ी इस महत्वपूर्ण घोषणा काे किस तरह प्रचारित किया और फाइलों मेें असलियत क्या रही इसका खुलासा आरटीआई में हुआ है।

तत्कालीन आयुक्त ने यह किया था एलान
एडीए के तत्कालीन आयुक्त गाैरव अग्रवाल ने दिसंबर 2019 में जानकारी दी थी कि प्राधिकरण की जमीनों का सभी डाटा ऑनलाइन किया जा रहा है और इसके लिए आरआईएसएल से एमओयू किया है। अब सभी जमीनों का रिकाॅर्ड ऑनलाइन होने के बाद जहां फर्जीवाड़े पर अंकुश लगेगा वहीं एडीए की जमीनें कहां और कितनी पर अतिक्रमण है या लीगल कार्रवाई चल रही है, इसकी भी जानकारी रहेगी। जाहिर है कि आमजन के लिए यह व्यवस्था बेहद लाभकारी होने वाली थी इसलिए सभी को इसके लागू होने का इंतजार था।

बिना तारीख का एमओयू
जिस तरह ऑनलाइन का दावा है उसी तरह का एमओयू है। आरआईएसएस और एडीए के अधिकारियों के बीच एमओयू पर तारीख तक नहीं है। यह केवल कागज का टुकड़ा मात्र है। एक महत्वपूर्ण दस्तावेज को लेकर अधिकारियों का रवैया किस तरह लापरवाही भरा होता है इसका उदाहरण आरटीआई के तहत मिली एमओयू की कॉपी से होती है।

महीनों तक कार्रवाई नहीं हुई तो मांगी जानकारी
पाल बीसला निवासी रविंद्र सिंह राठौड़ ने जमीनों का रिकार्ड ऑनलाइन किए जाने बाबत जानकारी मांगी तो उन्हें लंबे समय तक कुछ नहीं बताया गया और टालमटोल जवाब दिया जाता रहा। इसी महीने 2 सितंबर को राठौड़ ने आरटीआई के तहत अर्जी पेश कर ऑनलाइन व्यवस्था से जुड़ी जानकारी मांगी तो पता चला कि आरआईएसएल और एडीए के बीच एमओयू जरूर हो गया लेकिन एडीए की ओर से इस काम के लिए आरआईएसएल को जो 1 करोड़ 31 लाख 27 हजार 844 रुपए का भुगतान किया जाना था, वह नहीं किया गया है।

जब भुगतान ही नहीं हुआ तो जाहिर है कि काम शुरू भी नही हुआ। लेकिन पूर्व आयुक्त गौरव अग्रवाल ने योजना का ऐसा बखान किया था कि आमजन को तत्काल जानकारी और राहत मिलने वाली है लेकिन पता चला कि फाइल ही मार्च से डंप पड़ी है। फाइल पर कुल जमा नोटिंग डेढ़ पेज की है।
ये गिनवाए थे फायदे
जमीनों की फाइलें ऑनलाइन होने के बाद फर्जीवाड़े पर रोक लगेगी। भू माफिया आमजन को धोखे में रखकर जाली दस्तावेज के जरिये जमीन बेच देते हैं इस पर लगाम कसेगी।
एडीए के योजना क्षेत्र में कहां कितनी जमीन आवंटित हो चुकी है और कितनी बाकी है इसकी जानकारी एक क्लिक पर मिलेगी।
लीज पर दी गई जमीनों में कितनों ने अवधि विस्तार करवाया, कितने लोगों ने मकान बना लिए हैं, कहां जमीन खाली पड़ी है, यह सब रिकार्ड ऑनलाइन मिलेगा।
एडीए की जमीन पर अतिक्रमण आसानी से चिन्हित होंगे और यह भी पता चल जाएगा कि कितने लोगों ने बिना नक्शा पास करवाए मकान बना लिए हैं।
बड़ी संख्या में विवादित नक्शों को निरस्त भी किया गया है लेकिन मौके पर पता नहीं चल पाता लेकिन ऑनलाइन रिकार्ड से आसानी से जानकारी मिल जाएगी।
एडीए विभिन्न वर्ग से जुड़े लोगोें काे रियायती जमीन उपलब्ध करवाता है वहीं कई संस्थाओं को भी जमीन दी जाती है, ऐसी जमीनोंं का क्या स्टेटस है यह ऑनलाइन ही पता पड़ जाएगा।

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