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छोटी सी दुकान से 10 करोड़ का कारोबार बना मालपुआ:फिरोजाबाद की मलाई पुड़ी पुष्कर आकर बनी रबड़ी मालपुआ,80 साल पहले हुई थी शुरुआत

अजमेर6 महीने पहलेलेखक: सुनिल कुमार जैन

केसर से बनी चाशनी में लबालब, तीर्थ राज पुष्कर का एक जायका ऐसा है जिसकी मिठास दुनिया तक पहुंच चुकी है। भले ही देश के कई शहरों में मालपुआ बनाया और खाया जाता है, लेकिन जब सबसे बेहतरीन स्वाद की बात होती है तो जुबां पर पुष्कर के रबड़ी से बने मालपुआ का नाम सबसे पहले आता है। एक छोटी सी दुकान से शुरू हुआ मालपुआ बनने का सफर आज करोड़ों के कारोबार तक पहुंच चुका है। राजस्थानी जायका की इस कड़ी में आपको ले चलते हैं पुष्कर की उन गलियों में जहां तैयार होता है यह खास जायका...

1935 में शुरू हुई पहली दुकान
आजादी से भी करीब 12 साल पहले सन 1935 में एक छोटी सी दुकान से मालपुआ का सफर शुरू हुआ था। आज पुष्कर में इसकी 50 बड़ी दुकानें हैं। इस कारोबार से पुष्कर में 200 से ज्यादा लोग जुड़े हैं। सामान्य दिनों में यहां करीब दो लाख रुपए के मालपुआ रोजाना बिकते हैं। त्योहारी सीजन में इसकी बिक्री 5 गुना तक बढ़ जाती है। सालभर में इसका कारोबार 10 करोड़ रुपए से भी ज्यादा का हो जाता है।

फिरोजाबाद से पुष्कर पहुंचा जायका
फिरोजाबाद की मलाई पुड़ी को देखकर यहां के एक हलवाई ने इनकाे बनाना शुरू किया। हलवाई गिरिराज वैष्णव ने बताया कि करीब 80 साल पहले उनके दादा शिवप्रसाद वैष्णव फिरोजाबाद घूमने गए थे। वहां उन्होंने मलाई पुड़ी का स्वाद चखा था। इसका स्वाद उन्हें बहुत पसंद आया। कारीगर से बात की और उन्हें पुष्कर चलने के लिए मनाया। वहां के कारीगर ने पुष्कर में आकर इस रेसिपी में प्रयोग किए। रबड़ी से बनने वाले इस जायके को रबड़ी मालपुआ नाम दिया। तीर्थराज होने के कारण यहां आने वाले लोगों की जुबां पर भी मालपुआ का स्वाद चढ़ने लगा। इसके बाद इसकी डिमांड बढ़ने लगी। आज इसका निर्माण बडे़ स्तर पर होता है।

पुष्कर में मालपुआ शुरू करने का श्रेय शिवप्रसाद वैष्णव को जाता है।
पुष्कर में मालपुआ शुरू करने का श्रेय शिवप्रसाद वैष्णव को जाता है।

रबड़ी मालपुआ बनाने की रेसिपी
कारीगर घेवरचंद ने बताया कि करीब ढाई किलो दूध को भट्टी पर उबाल कर रबड़ी बनाते है। इससे यह करीब एक चौथाई रह जाएगा। इसमें करीब 200 ग्राम मैदा को मिक्स कर देंगे। बाद में तैयार इस घोल को देशी गर्म घी में डालकर जालीदार मालपुआ बनाएंगे। कड़क सिकाई के बाद मालपुआ को एक तार की चाशनी में डुबो दिया जाता है। चाशनी में केसर व इलायची भी मिलाई जाती है। इसके बाद इसे निकाल कर सर्व कर दिया जाता है। सुन्दरता व स्वाद के लिए रबड़ी और ड्राई फ्रूट्स भी डाले जा सकते हैं। इस एक किलो मालपुआ को तैयार करने में करीब 200 ग्राम शक्कर व 200 ग्राम घी लगता है।

180 रुपए किलो से लेकर 400 रुपए किलो भाव
देशी घी से बने मालपुआ का भाव चार सौ रुपए किलो तक है। केसर और पिस्ता से गार्निश मालपुआ 460 रुपए प्रति किलो में बिकता है। एक किलो में बीस से पच्चीस मालपुआ आ जाते है। तेल व अन्य वनस्पति घी से बने मालपुआ की रेट 180 रुपए प्रति किलो से शुरू होती है। यहां रोजाना सामान्य दिनों में करीब 500 से 700 किलो मालपुआ की बिक्री होती है। त्योहारी सीजन, बरसात , कार्तिक मास, धार्मिक उत्सवों व पुष्कर मेला के दौरान यह बिक्री 3000 किलो प्रतिदिन भी हो जाती है। यहां आने वाले पर्यटक भी इसका स्वाद चखते है।

सबसे पुराने वेद में भी इसका जिक्र
चारों वेद में सबसे पुराने ऋग्वेद में भी इंडियन डिश मालपुआ का जिक्र मिलता है। ऋग्वेद में इसका उल्लेख ‘अपुपा’ के रूप में किया गया है। कहा जाता है कि वैदिक काल में इसको जौ से बनाया जाता था। फिर इसमें घी में तला जाता था और शहद में डुबोया जाता था। चार धामों में से एक भगवान जगन्नाथ पुरी मंदिर में मालपुआ हर दिन सुबह सबसे पहले प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है। वहां मालपुआ को अमालू के नाम से जाना जाता है। भगवान जगन्नाथ को जो छप्पन भोग का प्रसाद चढ़ाया जाता है उसमें से एक अमालू भी शामिल हैं।

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