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कोरोना के चलते इस बार भी नहीं भरा मेला:रौनक नजर आई और न भीड़ भाड़, सूना-सूना रहा परिसर; कल्पवृक्ष जोडे़ के पूजन के लिए श्रद्धालु तो आए, लेकिन संख्या नाम मात्र की

अजमेर2 महीने पहले
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दो साल पहले की रौनक-फाइल फोटो - Dainik Bhaskar
दो साल पहले की रौनक-फाइल फोटो

कोरोना गाइड लाइन की बंदिशों के चलते हरियाली अमावस्या पर मांगलियावास में हर साल भरे जाने वाला प्रसिद्ध मेला इस बार भी नहीं भरा। हर साल इस दिन दिखाई देने वाली रौनक व भीड़ भाड़ भी नजर नहीं आई। पिछले साल कोरोना के चलते यहां पूरी तरह सख्ती रही और भक्तों की आवाजाही बंद रही, लेकिन इस बार मेला नहीं भरा और पूजा-दर्शन के लिए गिने चुने लोग आते नजर आए, लेकिन यह संख्या नाम मात्र की थी। मान्यता है कि इस दिन इन पवित्र वृक्षों के नीचे सच्चे मन से की गई कामना अवश्य पूर्ण होती है।

मेला भरने पर कल्पवृक्ष जोडे़ पर सुबह से ही यहां श्रद्धालुओं का तांता लगता था लेकिन आज मेला नहीं भरने के कारण सुबह ऐसे रहा सूना-सूना
मेला भरने पर कल्पवृक्ष जोडे़ पर सुबह से ही यहां श्रद्धालुओं का तांता लगता था लेकिन आज मेला नहीं भरने के कारण सुबह ऐसे रहा सूना-सूना

हर साल ग्राम पंचायत की ओर से यहां पर कल्पवृक्ष का मेला भरा जाता था। जिसमें करीब दो लाख के करीब श्रद्धालुओं आते थे। यहां मेले में दुकानें व झूलों की भरमार रहती थी, जहां पर दूर दराज से लोगों की बड़ी संख्या में आवाजाही होती थी। गत वर्ष कोरोना के पीक पर होने के कारण मेले व दर्शन की पूर्ण पाबंदी थी। लेकिन इस बार कोरोना संक्रमण में आई कमी के कारण मेला भरने की उम्मीद थी लेकिन ग्राम पंचायत ने कोरोना की तीसरी लहर को देखते हुए हरियाली अमावस्या पर कल्पवृक्ष का धार्मिक मेला लगातार दूसरे साल स्थगित करने का निर्णय किया।

वर्ष 2019 में भरे मेले से ऐसे उमडे़ थे श्रद्धालु-फाइल फोटो
वर्ष 2019 में भरे मेले से ऐसे उमडे़ थे श्रद्धालु-फाइल फोटो

हालांकि, इस बार हरियाली अमावस्या के महत्व को देखते हुए धर्म प्रेमी श्रद्धालुओं की थोड़ी चहल पहल जरूर है। ग्राम पंचायत ने इस बार भी किसी भी झूला मालिक तथा दुकानदार को दुकान लगाने की परमिशन जारी नहीं की। झूले लगाने के लिए कुछ दिन पूर्व टांटौती के झूला व्यवसायी भी ग्राम पंचायत आए लेकिन परमिशन नहीं दी गई। मेले के लिए अजमेर व ब्यावर आगार से रोडवेज बसों की विशेष व्यवस्था की जाती थी। पुलिस व प्रशासन की ओर से भी सुरक्षा व अन्य इंतजाम किए जाते थे। लेकिन मेला नहीं भरने के कारण ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गई।

(फोटो सहयोग-कृष्ण गोपाल आचार्य)

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