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टिकटों की बंदरबांट:संगठन की पतवार के बिना एक साल से हिचकोले खा रही कांग्रेस की नैय्या, ‘खेवनहार’ का इंतजार

अजमेर12 दिन पहलेलेखक: पंकज यादव
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मुख्यमंत्री अशोक गहलोत। - Dainik Bhaskar
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत।
  • 14 जुलाई 2020 काे पायलट की जगह डोटासरा बने थे पीसीसी चीफ, इसके बाद भंग कर दी गई थी जिला स्तर की कार्यकारणी

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत एवं पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट की आपसी खींचतान के कारण एक साल पहले 14 जुलाई काे पायलट की जगह गोविंद डोटासरा काे पीसीसी चीफ का पद दिया गया था। इसके साथ ही सभी जिलाें में कांग्रेस की शहर व देहात कार्यकारिणी समेत विभागाें व प्रकाेष्ठाें की कार्यकारिणियों काे भंग कर दिया गया था इसमें अजमेर भी शामिल है।

आपसी मतभेदाें के चलते पहले से ही कमजोर हाे चुकी कांग्रेस की हालत ठीक उस नाव की तरह है जिसे उफनती नदी में बिना मल्लाह के छाेड़ दिया गया है। एक साल के भीतर निकाय व पंचायत चुनाव में कांग्रेस काे मुंह की खानी पड़ी है। अब जबकि राजनीतिक व संगठनात्मक नियुक्तियों की बात चल रही है ताे यह उम्मीद की जा रही है कि शहर व देहात कांग्रेस काे खेवनहार मिल जाएंगे जिससे स्थिति कुछ ठीक हाे सकती है। फिलहाल ताे बिना संगठन के जिस तरह कांग्रेस चल रही है और इसका खामियाजा आम कार्यकर्ताओं को भुगतना पड़ रहा है।

शहर में देखा जाए ताे भाजपा के दाेनाें विधायक हावी हैं और कांग्रेस कार्यकर्ताओं काे अफसर भाव नहीं दे रहे। अजमेर में कांग्रेस निवर्तमान जिला कांग्रेस कमेटी, विधानसभा चुनाव में हारे हुए प्रत्याशी, पूर्व में विधायक रहे नेता और अग्रिम संगठनाें व विभागाें के नेताओं के अलग-अलग गुटों में बंटी हुई है। सभी की अपनी ढपली और अपना राग है। कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद संगठन के अभाव में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के काम नहीं हो रहे हैं और गुटबाजी हावी है। हालात यह हैं कि महापुरुषों व नेताओं की पुण्यतिथि एवं जयंती भी सभी गुट अलग-अलग मनाने लगे हैं।

पंचायत चुनाव में हुई बुरी हार

पंचायत चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत बुरा रहा और अजमेर में बुरी तरह पराजित हुई। यहां तक कि चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री डॉ रघु शर्मा व मसूदा विधायक राकेश पारीक के क्षेत्र में भी कांग्रेस काे हार का सामना करना पड़ा। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद बिना संगठन के पंचायत चुनाव में टिकटों की बंदरबांट के कारण यह हालत हुई।

निकाय चुनाव में भी पिटी भद्द

अजमेर शहर में संगठन के अभाव में नगर निगम चुनाव में कांग्रेस की शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा। नगर निगम अजमेर 2015 में 60 सीटों में कांग्रेस के 22 पार्षद विजयी हुए थे लेकिन अजमेर शहर में संगठन के अभाव एवं टिकटों की बंदरबांट में 80 में से मात्र 18 पार्षद ही जीत कर आए।

कभी बजता था पायलट का डंका, अब रघु शर्मा के बिना नहीं हिलता पत्ता

अजमेर संसदीय क्षेत्र सचिन पायलट की राजनीतिक कर्म भूमि रही है। यहां से पायलट दाे बार बार चुनाव लड़ा जिसमें एक बार उन्हें जीत मिली और वे केंद्र में मंत्री भी बने। दूसरी बार वे चुनाव हार गए लेकिन यहां उनकी सक्रियता कम नहीं हुई। सांसद सांवर लाल जाट के निधन के बाद उपचुनाव हुए ताे उनके नेतृत्व में ही डाॅ रघु शर्मा काे मैदान में उतारा गया और कांग्रेस काे जीत मिली।

विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण में भी पायलट की ही चली और उनके नजदीकी हेमंत भाटी व महेंद्र सिंह रलावता काे टिकट मिला हालांकि दाेनाें ही चुनाव हार गए। संगठन में भी पायलट के नजदीकी विजय जैन व भूपेंद्र सिंह काबिज रहे।

लेकिन बीते साल हुए विवाद और पीसीसी चीफ व उप मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद पायलट की पकड़ अजमेर में भी ढीली हाे गई। राजनीतिक समझाैते में क्या हुआ, यह आने वाले दिनाें में मालूम पड़ेगा लेकिन फिलहाल अजमेर में चिकित्सा मंत्री डाॅ रघु शर्मा का डंका बज रहा है। प्रभारी मंत्री लालचंद कटारिया भी इसलिए यहां ज्यादा दखल नहीं देते हैं।

समझाैते में मिल सकता है अजमेर

ऐसी चर्चा है कि गहलाेत व पायलट के बीच विवाद के निपटारे के लिए जाे फार्मूला तय किया है उसमें अजमेर, दाैसा व टाेंक में राजनीतिक व संगठनात्मक नियुक्तियों में सचिन पायलट की चलेगी। अगर ऐसा हाेता है ताे यह पायलट गुट के लिए संजीवनी की तरह हाेगा क्याेंकि उनके गुट से जुड़े नेताओं ने या ताे उनसे किनारा कर लिया है या फिर खामाेशी ओढ़ ली है।

नया फार्मूला हारे प्रत्याशियों के लिए सदमा

कांग्रेस में राजनीतिक नियुक्ति में एक नए फार्मूले की भी चर्चा है। इसके तहत चुनाव लड़ चुके नेताओं को राजनीतिक नियुक्तियों से दूर रखने की तैयारी की जा रही है। राजनीतिक नियुक्तियों के लिए नए मापदंड भी बनाए गए हैं, जिसके मुताबिक चुनाव लड़ चुके नेताओं को राजनीतिक नियुक्तियों में समायोजित नहीं किया जाएगा।

इससे अजमेर में विधायक प्रत्याशियाें काे धक्का लग सकता है। नए मापदंड लागू करने का मकसद नियुक्तियों के लिए कार्यकर्ताओं और नेताओं की छंटनी करना है। विधानसभा, लोकसभा, नगर निकाय और पंचायत चुनाव में टिकट पा चुके नेता और कार्यकर्ताओं का रिकॉर्ड तैयार कर प्रदेश प्रभारी अजय माकन, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के मुख्यालय को भी भेजा जा चुका है।

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