VIDEO देखें, यहां बिना आवभगत कबूतर नहीं चुगते दाना:ब्यावर के दादाबाड़ी में हाथ जोड़कर करते हैं मनुहार; तब आते हैं पेड़ों पर बैठे कबूतर, यहां हर दिन डालते हैं 1800 किलो अनाज

अजमेर4 महीने पहले
दोपहर दो बजे डालते है अनाज

लो तैयार है गौतम प्रसादी, जीमो सा... जब तक हाथ जोड़कर ऐसी मनुहार नहीं की जाती, तब तक एक भी कबूतर अनाज के दानों को नहीं चुगता। जबकि यहां दाना भी रहता है और इसको चुगने वाले कबूतर भी, जो आसपास दीवारों और पेड़ों पर ही बैठे रहते हैं। मनुहार के बाद एक-एक कर आते हैं और हजारों की संख्या हो जाती है।

एक बार सुनने में भले ही यह अजीब लगे, लेकिन कुछ ऐसा ही हाल है ब्यावर के बिजयनगर रोड स्थित दादाबाड़ी में, जहां णमोकार मंत्र की धुन पर दोपहर दो बजे से लेकर छह बजे तक हजारों की संख्या में कबूतर दाना चुगते हैं। करीब पचास साल पहले 1 किलो अनाज से शुरू की गई इस व्यवस्था में आज 1800 किलो अनाज रोजाना डाला जा रहा है।

डालते हैं दाना, फिर करते हैं मनुहार

सालों से यहां सेवा कर रहे अनाज के व्यापारी सुरेश चंद छल्लाणी रोज दोपहर को यहां पहुंचकर पहले ज्वार, बाजारा, मक्का और गेहूं बिखेरते हैं और बाद में हाथ जोड़कर लो पधारो, गौतम प्रसादी तैयार हैं, जीमो सा... की आवाज लगाते हैं।

करीब पचास साल पहले 1 किलो अनाज से शुरू की गई थी व्यवस्था।
करीब पचास साल पहले 1 किलो अनाज से शुरू की गई थी व्यवस्था।

एक-एक कर हो जाते है हजारों कबूतर

इस मनुहार के बाद एक-एक कर कबूतर आने लगते हैं और धीरे-धीरे थोड़ी ही देर में हजारों की संख्या में कबूतर एकत्र हो जाते हैं। वे यहां णमोकार मंत्र की धुन पर दाना चुगते हैं। करीब दो बजे शुरू होने वाला यह सिलसिला शाम 5 बजे तक चलता है।

अनुशासन भी गजब, कबूतर के बाद तोते

शाम करीब पांच बजे जब कबूतर भोजन कर अपने आशियाने की ओर लौट जाते हैं तो उसके बाद तोतों का झुंड आ जाता है। पक्षियों का यह अनुशासन देखते ही बनता है। सालों से चल रही यह व्यवस्था आज भी कायम है।

हर साल बढ़ रही कबूतरों की संख्या

समय के साथ यहां आने वाले कबूतरों की संख्या भी बढ़ रही है। ऐसे में सेवा करने वालों का जज्बा बढ़ता ही जा रहा है। दादाबाडी में करीब पचास साल से पक्षियों को दाना डाला जा रहा है। यहां पर पक्षियों को दाना डालने के स्थान की नियमित रूप से सफाई कर दाना डाला जाता है।

समय के साथ बढ़ रही कबूतरों की संख्या।
समय के साथ बढ़ रही कबूतरों की संख्या।

लॉकडाउन में भी जारी रही व्यवस्था

लॉकडाउन के दौरान जब लोग अपने-अपने घरों में थे। उस दौरान भी पक्षियों के लिए दाने की व्यवस्था जारी रही। यहां सेवाएं देने वाले बिना किसी अवकाश के निरन्तर रूप से सेवा देने में लगे रहे। अनाज की भी कोई कमी नहीं है। भामाशाहों के सहयोग से हमेशा भंडार भरा रहता है।

'आज तक मांगा नहीं, अपने आप होती है व्यवस्था'

मेरे बुजुर्गों ने करीब पचास साल पहले एक किलो अनाज से यह व्यवस्था शुरू की। तीस साल से मैं खुद कर रहा हूं। कुछ भी हो जाए, इस व्यवस्था को बाधित नहीं होने दिया। इनकी सेवा कर मुझे खुशी मिलती है। कबूतरों के लिए अनाज कभी किसी से मांगा नहीं, अपने आप दानदाता की ओर से यह व्यवस्था हो जाती है। कोई कमी नहीं।

सुरेशचंद छल्लाणी, सेवादार, दादाबाड़ी ब्यावर

(इनपुट : शशांक त्रिपाठी/ नवीन गर्ग)

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