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पेट्स के प्रती प्यार:बच्चों की तरह पेट्स काे पाल रहे लाेग, बर्थडे सेलिब्रेट कर मनाते हैं खुशियां

भिवाड़ी2 महीने पहले
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(धर्मेंद्र दीक्षित). घर की सुरक्षा के लिए गेट पर बांधे जाने वाले पेट्स अब बेडरुम तक पहुंच चुके हैं। छाेटे परिवाराें के बीच पेट्स की अहमियत बढ़ती जा रही है। अब ये सुरक्षा करने वाले प्रहरी से बढ़कर परिवार का अभिन्न अंग बन चुके हैं। इसलिए लाेग महंगे पेट्स रखने के साथ ही इनके खाने-पीने, कपड़े और हाईजीन पर काफी पैसा खर्च करते हैं। इनकाे साथ रखने से काेई दिक्कत न हाे इसलिए समय पर वैक्सीन कराने और चिकित्सकाें से सलाह लेने में भी देर नहीं करते।

बचपन से घर में पेट्स इसलिए मुझे भी लगाव

भिवाड़ी गांव निवासी एडवाेकेट केतन तंवर अभी जर्मन शेफर्ड और पिट बुल काे पाल रहे हैं। वे बताते हैं कि जब मैं पैदा हुआ तभी से घर में पेट्स रखते हैं। शेफर्ड काे शेरू और पिट बुल काे जाेजाे के नाम से बुलाते हैं। शेरू छह साल का हाे गया। जाेजाे 45 दिन की है।

इससे पहले लैबराडाेर था जाे कि 13 साल तक रहा। बाजार से फूड मंगाते हैं और घर का दूध पिलाते हैं। दिन में तीन बार आधा-आधा लीटर दूध पीते हैं। साथ में डाॅग फूड और राेटी खिलाते हैं। पेटस का शाॅप और शैंपू आता है उससे नहाते हैं। पेट्स की सेवा का सभी घर वाले ध्यान रखते हैं।

पेट्स काे बुरा न लगे इसलिए नाम नहीं बदला

एमवीएल निवासी भावना बेदी बताती हैं कि पेट्स पालना डेढ़ साल से शुरू किया है। मायके में बचपन से ही पेट्स थे। अभी मेेरे पास लैबराडाेर है। इसकाे ब्रूनाे के नाम से बुलाते हैं। इस पेट्स काे हमने दूसरे लाेगाें से एडाॅप्ट किया था। वे लाेग भी इसे ब्रूनाे के नाम से बुलाते थे। पेट्स काे हर्ट न हाे इसलिए हमने इसका नाम नहीं बदला।

अभी हमारे पास बच्चा नहीं है, हमारा पेट्स ही हमारा बच्चा है। जाे हम खाना खाते हैं वही पेट्स खाता है। हमारे साथ ही पिज्जा बर्गर खाता है। हम जाे खाते हैं अगर न खिलाओ ताे नाराज भी हाे जाता है। एक दम छाेटे बच्चाें की तरह व्यवहार करता है।

मुझे नींद से जगाती है मैगी

यूआईटी सेक्टर एक निवासी याेगेश राजपूत बताते हैं कि जब में चार साल का था तब पापा जर्मन शेफर्ड लेकर आए थे। वह मेरे पास 15 साल तक रहा। उसके बाद में दाेबारा जर्मन शेफर्ड फीमेल लेकर अाया। वह मेरे पास छह साल रही। अब उसका एक बच्चा मेरे पास है, उसका नाम मैगी है। मेरे भांजे ने इसका नाम प्यार से मैगी रखा।

उसका व्यवहार भी मैगी की तरह ही चटपटा है। पहले पेट का रैंबाे था और दूसरे का टिटसी था। मैं सरकारी नाैकरी की तैयारी कर रहा हूं और मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक कर रखी है, समय का अभाव रहता है। सुबह मैगी ही मुझे नींद से जगाती है।

डाेडाे काे छाेड़कर कभी घूमने भी नहीं गए

निमई ग्रीन निवासी मनाेज चावला बताते हैं कि 2010 से उनके पास लैब्राडाेर है। उसके साथ 10 साल का सफर तय हाे चुका है। उसे हम डाेडाे के नाम से बुलाते हैं। मेरे दाेस्त के घर पप्पी हुए थे उसने हमें गिफ्ट दिया था। परिवार में माताजी, पत्नी के साथ एक बेटा-बेटी है। डाेडाे भी बच्चे की तरह है। हमें 10 साल हाे गए, हम उसे घर पर अकेला छाेड़कर कभी नहीं गए। जहां भी घूमने गए उसे साथ लेकर गए। नहीं ताे उसकी देखभाल के लिए घर पर एक सदस्य जरूर रहता है। हमें लगता है कि डाेडाे की वजह से हमारे घर में खुशियाें का माहाैल रहता है।

बदल रहा है पेट्स काे पालने का तरीका

पेट्स डाॅक्टर कुमार विकास बताते हैं कि अब पेट्स काे लेकर लाेगाें की धारणा बदल गई है। पहले पेट्स काे लाेग सिर्फ सुरक्षा की दृष्टि से घर के आंगन में या गेट पर रखते थे, लेकिन अब उसकी जगह बेडरूम तक पहुंच गई है। छाेटे परिवार हाेने की वजह से घर में लाेगाें काे कंपनी के लिए पेट्स की जरूरत पड़ रही है।

वह फैमिली मेंबर की तरह हाे गया है। उसी तरह पेट्स के फूड, कपड़े, हाइजीन और वैक्सीन पर भी लाेगाें का पूरा ध्यान रहता है। अब लाेग घर से बाहर जाते हैं ताे या ताे साथ ले जाते हैं, अगर साथ ले जाना संभव नहीं है ताे पेट्स के क्रच में छाेड़कर जाते हैं।

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