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प्रतिभाशाली युवाओं का चयन:आंखें छिनी पर नहीं चूके चौहान, निरक्षर मां की बेटी भी आरएएस; आरएएस के साथ जिंदगी ने भी उन्हें परखा

अलवर17 दिन पहले
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फाइल फोटो - Dainik Bhaskar
फाइल फोटो
  • राजस्थान प्रशासनिक सेवा परीक्षा के नतीजों में युवाओं के लिए प्रेरणा बने जिले के ये प्रतिभाशाली

राजस्थान प्रशासनिक सेवा में जिले के अनेक प्रतिभाशाली युवाओं का चयन हुआ है। इनमें अलवर के रवि गोयल ने जहां पूरे प्रदेश में टॉप-10 में जगह बनाई। वहीं अनेक चयनित ऐसे हैं, आरएएस के साथ जिंदगी की परीक्षा में अव्वल रहे। ये जीत टॉपर से कम नहीं।

राजस्थान प्रशासनिक सेवा परीक्षा-2018 में चयनित इन युवाओं का संघर्ष सभी के लिए मिसाल बन गया है। बानसूर के देवेंद्र ने अंधता के बावजूद सफलता हासिल की। कोटकासिम में पंचर लगाने वाले के बेटे घनश्याम और खेड़ली की अंजू पिता की मौत के बाद आरएएस बने है। मिलिए इन प्रतिभाओं से, जानिए संघर्ष की कहानी।

आंखें गई तो लोग बोले-गोवर्धन में छोड़ दो भीख मांग लेगा, देवेंद्र ने आरएएस बनकर जवाब दिया

सबलपुरा में माला की ढाणी निवासी देवेन्द्र चौहान ने 2010 में अपनी दोनों आंखें एक हादसे में खो दी। देवेंद्र ने बताया- आंखों की रोशनी छिनी तो जिंदगी ही खत्म सी लगी। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। झोपड़ीं में रहते थे। बेबसी देख ढाणी के लोग परिजनों से कहने लगे- इसे गोवर्धन में छोड़ दो, वहां भीख मांग गुजारा कर लेगा। तब ठाना कि कुछ कर दिखाएंगे। पढ़ने के लिए ट्रैक्टरों में बजरी की ट्रोलिया भर पैसे जुटाए। एक दिन रेडियो सुनते वक्त नेत्रहीनों की संस्था का नंबर मिला। संस्था का जयपुर में दिव्यांग स्कूल था। वहां कंप्यूटर व ब्रेल लिपि सीखी। तब लगा कुछ कर पाएंगे। अंकिता चौहान व भाई नरेंद्र सिंह चौहान से किताबों की रिकॉर्डिंग करवाई। उन्हें सुन-सुनकर पढ़ाई की। इस बीच समाज में उपहास, ताने सुन कई बार हिम्मत टूटी, लेकिन निश्चय अटल था। चुपचाप जुटे रहे और आखिर आरएएस-2018 में दिव्यांग श्रेणी में चयन होकर दिखाया। देवेंद्र का कहना है कि उनका अंतिम लक्ष्य आईएएस बन कर सेवा करना है।

सिलेंडर के विस्फोट में पिता की मौत के बाद निरक्षर मां ने परिवार को संभाला, अब बेटी आरएएस बनी

आरएएस परीक्षा में 168वीं रैंक पर चयनित अंजू अग्रवाल की मां मीना बहुत खुश, गौरवान्वित हैं। अंजू ने बताया कि उनके पिता लच्छाराम अग्रवाल टेंट हाउस का काम करते थे। वर्ष 1998 में एलपीजी सिलेंडर विस्फोट में उनकी मौत हो गई। घर की जिम्मेदारी निरक्षर माँ मीना देवी पर आ पड़ी। तब हम 3 भाई-बहन 4 से 8 वर्ष के थे। मां ने बहुत मेहनत की। तीनों को पढ़ाया। हम कामयाब हो सकें, इसमें कोई कसर नहीं छोड़ी। मां-पिता दोनों की जिम्मेदारी निभाई। ईश्वर ने भी उनका मान रखा। बड़ा भाई लवकुश पटवारी बना। वर्ष 2012 में अंजू भी पटवारी पद पर 9वीं रैंक में चयनित हुई। इसके बाद तृतीय श्रेणी शिक्षिका पद पर चयन हो गया। अंजू ने लक्ष्य आरएएस का रखा। इस दौरान छोटा भाई योगेश भी आगरा में जेएए के पद पर चयनित हुआ। इधर, अंजू ने लगातार प्रयास जारी रखे। वर्ष 2016 में 572 वीं रैंक मिली। अब 196वीं रैंक से आरएएस में चयनित हुई हैं।

चंदन व पीयूष ने कोचिंग की मदद नहीं ली, नौकरी के साथ घर पर ही रहकर पढ़ाई की, अच्छी रैंक पाई

युवा ये मानने लगे हैं कि चयन के लिए कोचिंग जरूरी है, लेकिन गोविंदगढ़ के पीयूष जैन और किशनगढ़बास के चंदन गुप्ता ने घर पर ही पढ़ाई कर आरएएस परीक्षा सफलता के साथ अच्छी रैंक हासिल की है। आरएएस-218 में 138 वी रैंक पर चयनित पीयूष का कहना है कि बिना कोचिंग के घर पर मेहनत करके सफलता पाई है। पीयूष 2016 में परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। तब मां का भी निधन हो गया था। पीयूष के पिता सरकारी अध्यापक हैं एवं दो बहने हैं। सफलता का श्रेय परिजनों एवं मित्र गौरव, सृष्टि जैन, तुषार को दिया है। किशनगढ़बास निवासी चंदन गुप्ता ने आरएएस 2018 में 49रैंक हासिल की है। इससे पहले 3 बार सरकारी नौकरी में चयनित हो चुके हैं। पिता राजेंद्र गुप्ता हार्डवेयर मर्चेंट हैं। चंदन का 2007 में पशु चिकित्सा अधिकारी और 2009 में मथुरा वेटरनरी कॉलेज में लेक्चरर और बरेली के इंडियन वेटरनरी रिसर्च इंस्टिट्यूट में वैज्ञानिक पद पर चयन हुआ।

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