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लक्ष्मणगढ़:6 उपखंडों में पहुंचा टिड्डी दल, कृषि विभाग बोला-हमारे पास इन्हें खदेड़ना ही विकल्प

अलवर4 महीने पहले
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  • कृषि विभाग के इंतजाम और योजनाएं कठघरे में, 100 साल पुरानी तरकीब ही आजमाई जा रही

कोरोना के संकट के बीच जिले के 6 उपखंड क्षेत्रों में टिड्डी दल की घुसपैठ हो चुकी है। कई किलोमीटर में फैले टिड्डी दल राजगढ़, लक्ष्मणगढ़, मालाखेड़ा, रैणी, थानागाजी और बहरोड़ में देखे जा चुके हैं। मगर इन्हें खत्म कर आगे बढ़ने से रोकने का ना तो कृषि विभाग के पास कोई नुस्खा है और ना प्रशासन के पास इंतजाम है।

दशकों से चल रहे टिड्‌डी नियंत्रण कार्यक्रम में करोड़ों खपने के बाद भी किसानों को थाली-ढपली, ढोल बजा टिडि्डयों को खदेड़ने की 100 साल पुरानी तरकीब आजमाने को कहा जा रहा है। नतीजा ये कि टिड्‌डी दल यहां से वहां शिफ्ट हो रहा है। बड़ी चिंता ये है कि टिडि्डयों का जमावड़ा सरिस्का बाघ परियोजना से लगते क्षेत्रों में लगातार बना हुआ है।

ये जंगल में दाखिल होते हैं तो ईको-सिस्टम को बड़ा नुकसान पहुंचा सकती हैं। रविवार को भी टिड्‌डी दल किशोरी (थानागाजी) क्षेत्र में बना हुआ था। यहां से सरिस्का के मुख्य जंगल महज 1 किलोमीटर के फासले पर हैं। देर रात राजगढ़ व पिनान क्षेत्र और सोमवार सुबह करीब एक वर्ग किमी का टिड्‌डी दल लक्ष्मणगढ़ व मालाखेड़ा क्षेत्र के गांवों में नजर आया।

यहां से फिलहाल इनका मूवमेंट जिले की दक्षिणी-पश्चिमी दिशा में दौसा क्षेत्र के गांवों की ओर बताया गया है। कृषि अधिकारियों का कहना विभाग टिड्डी दल की लगातार ट्रेकिंग कर रहा है। रात्रि के समय टिड्डी दल जहां ठहरेगा, वहां फायर ब्रिगेड व टैंकरों से दवा छिड़काव कर खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है।

बड़ा सवाल : कृषि विभाग के पास आखिर क्यों नहीं ठोस इंतजाम

टिड्डी दल का जिले में इतना व्यापक हमला हुआ है, लेकिन कृषि विभाग और जिला प्रशासन के पास इनसे निपटने की रणनीति के नाम पर निगरानी तथा संसाधनों के नाम पर आवाज से खदेड़ने की सलाह के अलावा कुछ नहीं है। दवा छिड़काव के लिए ट्रैक्टर माउंटेड स्प्रेयर हैं, जो ऊंचाई पर बैठी टिड्डियों तक मार नहीं कर पाते। ये भी तब पहुंचते हैं जब टिड्डी दल नुकसान कर जगह बदल लेता है।

मामले में राजगढ़ के सहायक निदेशक (कृषि) गिरधर सिंह देवल ने बताया कि हमारी टीम लगातार ट्रैकिंग कर रही है। टिड्डी दल दिन में नही बैठता। रात के समय टिड्डियां जहां भी सेटल व शांत होती है वहां टीम छिड़काव करती है। समस्या ये है कि टीम प्रभावित स्थल पर पहुंचता है, तब तक ये अपना ठिकाना बदल चुका होता है। ऐसे में आवाज, धुंआ कर खदेड़ना ही विकल्प है। टिड्डियों का दल आवाज के कंपन को महसूस करता है। इसलिए डीजे भी कारगर है। यह काफी दूर तक असर करता है। खेतों में रसायन छिड़काव भी कर बचा जा सकता है।

लक्ष्मणगढ़ से दो भागों में बंट गया दल

लक्ष्मणगढ़ तहसीलदार हनीफ खान ने बताया कि टिड्डी दल टोड़ानागर की तरफ से घुसा। यहां से दो भागों में बंट कर एक मालाखेड़ा क्षेत्र की ओर तथा दूसरा टिड्डी दल खोहरा-मलावाली होते हुए रसूलपुर, गोठड़ा, सेहरा की ओर बढा। जो बाद में महुआ क्षेत्र में दाखिल हो गया। फसल को कोई नुकसान का समाचार नहीं है। बाद में मालाखेड़ा की ओर निकला दल रैणी उपखंड के पाटन, मानपुरा व राजपुर छोटा के बिणजारी गांव होते हुए लक्ष्मणगढ़ क्षेत्र कचावा, झालाटाला पहुंच गया।

पाटन की सरपंच सरोज मीना ने बताया कि किसानो ने थाली, घंटी, पीपे, ताली, झालर आदि बजाकर टिड्डियों को भगाने का प्रयास किया। टिड्डी दल हाल ही बोई गई फसलों के पत्तों व पेड़ों की टहनियों पर आकर बैठने लगा। इससे किसानों में घबराहट फैली हुई है। खरीफ की बुवाई कई इलाकों में हो चुकी है। टिड्डी दल बना रहा तो नई फसल की छोटी पौध को नष्ट कर बड़ा नुकसान कर सकता है।

टिड्डी को खदेड़ा

रविवार शाम राजगढ़ के नयागांव बोलका व काली पहाड़ी क्षेत्र में टिड्डी दल दिखा था। इसे दो फायर ब्रिगेड की गाड़ी, पानी के टैंकर व चार ट्रैक्टर माउंटेड स्प्रेयर से दवा का छिड़काव कर खदेड़ा गया। 

गिरधर सिंह देवल, सहायक निदेशक कृषि, राजगढ़

जानिए, कौनसा टिड्डी दल घातक, कैसे पहचान करें, रिस्क व दवा क्या है

  • टिड्डियों की कई प्रजातियों में रेगिस्तानी टिड्डी सबसे ज्यादा खतरनाक मानी जाती है। इन टिड्डियों को उनके चमकीले पीले रंग और पिछले लंबे पैरों से पहचाना जा सकता है।
  • टिड्डी जब अकेली होती है तो उतनी खतरनाक नहीं होती है, लेकिन झुंड में रहने पर इनका रवैया बेहद आक्रामक होता है। फसलों व पौधों को 1 बार में ही चट कर जाती हैं।
  • क्लोरपाइरीफोस व लैम्ब्डा साइहालोथ्रिन रसायनों का छिड़काव करें। इससे प्रथम स्टेज वाला टिड्डी दल नष्ट हो जाता है। ये 25 से 50% होते हैं।
  • कृषि विभाग फायर बिग्रेड, ट्रेक्टर माउंटेंड स्प्रेयर, पानी के टैंकर के जरिये यह छिड़काव करता है। कुछ किसानों ने भी अपने ट्रैक्टरों पर इस तरह की मशीन लगवाई है।
  • अलवर जिले में पथरीली व भारी मिट्टी होने की वजह से टिड्डी दल के अंडे देने की संभावना कम है।

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