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  • More Than 45 Young Children In 15 Laborers Living In A Roadside Tent, The Threat Of The Third Wave, Not Yet Complete Morsel

कोरोना संक्रमण से नहीं, भूख से उदास मासूम:रोड किनारे तम्बू लगाकर रह रहे मजदूरी करने वाले 15 परिवारों में 45 से अधिक छोटे बच्चे, बोले मां को दूध नहीं मिल रहा तो बच्चों को कहां से मिलेगा

अलवर4 महीने पहले
ये झुग्गीयों में रह रहे बच्चे।

कोरोना की तीसरी लहर को लेकर चौतरफा चिंता है। इससे पार पाने के लिए इंतजाम भी होने लगे हैं। लेकिन, अलवर शहर में शालीमार आवासीय योजना में रोड किनारे झुग्गी झौपड़ी में रह रहे करीब 15 परिवारों में ही 45 बच्चे हैं। ये अभी तक कोरोना संक्रमण से तो बचे हुए हैं लेकिन, पेट की भूख पूरी तरह शांत नहीं होने से झौपड़ियों में रह रहे मासूमों के चेहरे पहले से उदास हो गए हैं। यह बात उनके माता-पिता भी कहते संकोच कर रहे हैं कि बच्चों को पूरा निवाला नहीं मिल पा रहा है। जो जमा पैसा था वह भी खर्च होने को आया। अब जैसे-तैसे करके काम चलाने में लगे हैं।

सब्जी बनना बंद, दूध भी नहीं खरीद पा रहे

यहां रह रहे लोगों ने बताया कि बच्चे अधिक संख्या में हैं। पैसा नहीं होने के कारण अब उनको दूध नहीं पिला पा रहे। केवल रोटी ही देते हैं। सब्जी बनना बंद हो गई है। बिना पैसे न सब्जी खरीद पा रहे न दूध। बच्चे भी मायूस है। छोटे बच्चे सिर्फ मां का दूध पीते हैं। लेकिन, मां को ही दूध नहीं मिल रहा तो बच्चे को कहां से मिलेगा। रोटी का इंतजाम भी उधार में करना पड़ रहा है। असल में लगातार मजदूरी नहीं मिल पा रही है। अब लॉकडाउन में तो मजदूरी बिलकुल बंद हो गई है।

नट जाति के लोग
नट परिवारों के मुकेश, पप्पू, रंगीला व कैलाश ने बताया कि वे मजदूरी करने के लिए 18 किलोमीटर दूर पीलवा गांव से अलवर शहर आए हुए हैं। करीब तीन साल से यहां रह रहे हैं। सभी परिवार बीपीएल कार्डधारक हैं। गांव जा नहीं पा रहे। कुछ लोगों के श्रमिक कार्ड बने हुए हैं।

आयुक्त ने कहा तुंरत पहुंचेगा खाना
नगर परिषद आयुक्त सोहन सिंह नरूका ने खुद फोन करके पूछा है कि ये परिवार कहां रहते हैं। वैसे आसपास तो खाना जाता है। मैं खुद वहां पहुंचकर पता करता हूं।

ये मजदूरी करने वाले परिवार
ये मेहनत-मजदूरी करने वाले परिवार हैं। जो निर्माण से जुड़े कार्यों पर मजदूरी करते हैं। कोरोना में काम बिल्कुल बंद हो गया। करीब 15 परिवार एक ही जगह सड़क किनारे तम्बू लगा कर रहते हैं। इन सब तम्बूओं में करीब 45 से अधिक छोटे बच्चे हैं। यहां दो महीने से लेकर 100 साल तक के बुजुर्ग हैं। अब मजदूरी नहीं मिलने से जमा पूंजी भी बीतने लगी है। इस कारण इनकी चिंता बढ़ी है।

बोले हमारे- पास कोई नहीं आया
यहां रह रहे जगदीश ने कहा कि उनके पास कोई नहीं आया। हमारे बच्चों के खाने का इंतजाम नहीं हो पा रहा है। प्रशासन व सरकार के नुमाइंदें यहां नहीं आए हैं। सबको पता है कि हम मजदूरी करते हैं। भीख नहीं मांगते हैं। अब मजदूरी का संकट हो गया तो मुश्किलें सामने खड़ी है।

गाड़िया लुहार भी रोड पर
जिस तरह गाड़िया लुहार रोड किनारे रहकर अपनी आजीविका कमाते हैं। ठीक उसी तरह ये लोग दूरदराज गांवों से शहर आते हैं। यहीं पर मजदूरी करते हैं। शालीमार में रह रहे ये परिवार करीब तीन साल से यहां बसे हुए हैं। उनके सिर पर केवल एक तम्बू है। जिसमें ही गर्मी-सर्दी व बारिश से मुकाबला करते हैं। अब कोरोना ने उनको कमजोर कर दया।

कोरोना का केस नहीं

अभी ये लोग कोरोना संक्रमण से बचे हुए हैं। एक तो शहर से अलग हैं। दूसरा मेहनत मजदूरी करने वाले हैं। इस कारण भी संक्रमण कम मान रहे हैं। सब बच्चे एक साथ खेलते हैं। बाहर से आने वालों से दूरी बनाकर रखते हैं।

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