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  • Suddenly The Eyesight Was Lost In The Sixth Grade, Then The Villagers Had Said This, Now The Same Devendra Got The Sixth Rank In The RAS Blind Category

देवेंद्र अंधा हो गया इसे गोवर्धनजी के छोड़ आओ:छठी कक्षा में अचानक आंखों की रोशनी चली गई थी, तब गांव वालों ने यही कहा था, अब उसी देवेंद्र ने आरएएस ब्लाइंड कैटेगिरी में छठी रैंक हासिल की

अलवर19 दिन पहले
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देवेंद्र कुमार चौहान। - Dainik Bhaskar
देवेंद्र कुमार चौहान।

अब देवेंद्र कुमार चौहान आरएएस बन चुका है। लेकिन साल 2006 में जब उसकी आंखें चली गई थी। यानी अचानक वह ब्लाइंड हो गया था। तब देवेंद्र के सामने ही गांव के लोग उसके माता-पिता को कहते थे इसे गोवर्धनजी के छोड़कर आ जाओ। वहां भीख मांग कर जीवन काट लेगा। यह सुनकर मां-बाप पर क्या गुजरी होगी। यह कहानी अलवर के बानसूर के सबलपुरा ग्राम पंचायत में माला की ढाणी के रहने वाले देवेंद्र कुमार चाहौन की है। जो बेहद गरीब परिवार में पैदा हुआ। वर्ष 2006 में कक्षा 6 में बैठे-बैठे उसकी आंखों की रोशनी चली गई थी। जैसे-तैसे करके 10वीं पास की। लेकिन इससे पहले ही वह पूरी तरह ब्लाइंड हो गया। लेकिन हिम्मत नहीं हारी। अब उसी देवेंद्र कुमार ने आरएएसस की ब्लाइंड कैटेगिरी में छठी रैंक हासिल कर ली है। फिलहाल रतलाम रेलवे में सीनियर क्लर्क है। आगे का लक्ष्य आइएएस तक पहुंचने का है।

फिर कानबेलिया ले डूबा पूरी रोशनी
अचानक आंखों की रोशनी चली गई। बड़े डॉक्टरों को दिखाने में सक्षम नहीं थे। इसी बीच एक कानबेलिया घर आ गया। उसने आंखें ठीक करने का दावा किया। जिसने सूरमा डाल दिया। इसके बाद पूरी रोशनी खत्म हो गई। तभी से देवेंद्र ब्लाइंड है। उसके बाद उसने 12वीं पास की। ग्रेजुएशन की है। कॉम्पीटिशन की तैयारी कर दो नौकरी लग चुका है। अब तीसरी ज्वाइन करने की तैयारी है।

ब्लाइंड स्कूल पहुंचने के बाद दुनिया बदल गई

देवेंद्र ने बताया कि 10वीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उसने रेडियो पर जयपुर की ब्लाइंड स्कूल के बारे में सुना। रेडियो पर बताया गया कि अंधे बच्चे भी मास्टर बनते हैं। फिर वह अपने ताऊजी के लड़के के साथ जयपुर पहुंच गया। वहां कम्प्यूटर व ब्रेल लिपी सीखी। वहां कुछ ऐसे उदाहरण थे । जिसे जानने के बाद लगा ब्लाइंड की दुनिया खत्म नहीं हुई। वह दुनिया में सब कुछ कर सकता है।

पत्नी के साथ देवेंद्र।
पत्नी के साथ देवेंद्र।

आरएएस बनने की यूं सोची
अलवर के कला कॉलेज में एक बार ग्रेजुएशन का एग्जाम देने आया था। यहां कॉलेज प्रशासन ने श्रुति लेखन के एवज में अलग से फीस ले ली। जिसके बारे में नि:शक्तजन आयुक्त काे पता लगा। वहां से शिकायत होने के बाद देवेंद्र की फीस कॉलेज का बाबू घर देने आया। तब उसे लगा आरएएस की नौकरी में दम है। मुझे भी आरएएस ही बनना है। अब उसका आरएएस में नम्बर आया है। अगला कदम आएएस की ओर बढ़ना है। जिसके लिए नौकरी के साथ तैयारी में जुटा है। अब उसके माता-पिता भी रतलाम रहने लगा है। मतलब वह माता-पिता का सहारा बना हुआ है। छोटे भाई को भी खुद के पास रखता है।

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