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भास्कर एक्सपोज:एक इंजेक्शन की कीमत ‌40 हजार रुपए, मुख्यमंत्री ने नि:शुल्क लगाने के लिए भेजे, प्रशासन ने वापस भिजवाए

अलवर3 दिन पहले
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इंजेक्शन जो वापस भिजवाए
  • क्योंकि इसके लगने से पहले होने वाली जांच का पैसा कौन दे, यह फैसला नहीं हो पाया
  • टेंडर रिन्यू नहीं किए वरना यह जांच 4 हजार में ही हो जाती.. और बच जाती मरीजों की जान

कोरोना मरीजों और उनके बेहतर स्वास्थ्य को लेकर प्रशासनिक कवायद नाकाफी साबित हो रही है। मामला एसएमएस मेडिकल कॉलेज से मिले 5 जीवनरक्षक टोसिलिजुमेब इंजेक्शन से जुड़ा हुआ है। आप भी पढ़कर हैरान होंगे कि स्वास्थ्य विभाग ने बड़ी जद्दोजहद से मिले इन 5 इंजेक्शनों को सरकार को वापस सिर्फ इसलिए भेज दिया कि 4 हजार रुपए की जांच का इंतजाम प्रशासन स्थानीय स्तर पर नहीं कर सका।

चिकित्सा विभाग के अधिकारियों ने कहा कि हमने इस संबंध में कलेक्टर को पत्र लिख दिया। कलेक्टर ने कहा है कि जांच के लिए आवश्यक मशीन उपलब्ध करवाने के लिए सरकार को लिखा गया है। आपको बता दें कि टोसिलिजुमेब वह जीवनरक्षक इंजेक्शन है जो मरीज को गंभीर परिस्थितियों में उसकी जान बचाने के लिए दिया जाता है।

अब तक इसका प्रयोग सिर्फ चीन, स्विटरजरलैंड, आस्ट्रेलिया, मुंबई, दिल्ली, जयपुर सहित बड़े शहरों में मरीजों के लिए हो रहा था, लेकिन सीएम अशोक गहलोत ने पिछले दिनों यह इंजेक्शन जिला स्तर पर भी उपलब्ध करवाए थे ताकि मरीजों को जयपुर या कहीं आगे इलाज के लिए नहीं जाना पड़े। इस इंजेक्शन को लगाने से पहले मरीज के 6 अलग-अलग तरह के टेस्ट किए जाते हैं।

अधिकारियों व प्रशासनिक लापरवाही व उदासीनता का यह परिणाम रहा कि इन 6 टेस्टों की सुविधा अलवर में होते हुए नहीं ली गई और 40 हजार का जो एक इंजेक्शन था ऐसे 5 इंजेक्शन सरकार को वापस भिजवा दिए। यह 6 तरह की जांचे यदि प्राइवेट लैब पर कराएं तो करीब 10 से 12 हजार का खर्चा आता है, लेकिन सरकारी करार होता तो यह जांचे सिर्फ 4 से 5 हजार रुपए में हो जाती।

रिन्यू नहीं किया टेंडर, वरना इंजेक्शन लगाने से पहले की सभी जरूरी जांच उपलब्ध थींभास्कर पड़ताल में यह सामने आया है कि जो जांच उन जीवन रक्षक इंजेक्शन के लिए जरूरी थी वो अलवर में उपलब्ध हैं, लेकिन सरकारी खाते में इनकी उपलब्धता नहीं है। पूर्व में सामान्य चिकित्सालय के साथ हुए करार में क्योरवैल डायग्नोस्टिक सेंटर इन 6 जांचों सहित विशिष्ट तरह की 40 जांचें कर एसएमएस की दरों व उससे भी कम दरों पर उपलब्ध करवा रहा था, लेकिन विभाग द्वारा न तो नए टेंडर किए गए और न ही टेंडर रिन्यू किए गए।

ऐसे में इन जांचों पर संकट आ गया और सभी अधिकारी अपना पल्ला झाड़ते नजर आए। नतीजा जांचे नहीं हो पाई और हमें 2 लाख रुपए के 5 इंजेक्शन वापस भिजवाने पड़े।

ये 6 जांच जिन पर फैसला नहीं कर पाए अधिकारी : हॉस्पिटल प्रबंधन व प्रशासन इंजेक्शन दिए जाने से पहले होने वाली डी डाइमर, एस फेरेटिन, आईएल-6, एचएस सीआरपी, पीसीटी प्रो कैल्सीटोनिन, आई जीजी एंटी बॉडी कोविड-2 टेस्ट पर कोई फैसला नहीं कर पाए कि ये जांचे कैसे होंगी और कौन कराएगा। अगर प्राइवेट लैब में होती हैं तो खर्चा कौन करेगा और सरकारी में होती हैं तो व्यवस्था कौन करेगा क्योंकि सरकारी क्षेत्र में ये जांच हो ही नहीं रही हैं और टेंडर रिन्यू नहीं हुआ है और न ही नया टेंडर हुआ है। नतीजा इंजेक्शन तो वापस भेजे ही साथ में मरीजों को रैफर करना पड़ रहा है।

आपबीती...जो इंजेक्शन तुमने वापस भेजे हैं, वो जयपुर में सिफारिशों से भी कोरोना मरीजों को नहीं मिल रहे
यह इंजेक्शन कितना महत्वपूर्ण है यह भास्कर को बताया कि एक मरीज के अटेंडेंट ने। मरीज के अटेंडेंट मुकेश ने बताया कि उनके पिताजी को आरयूएचएस में यह इंजेक्शन रैफर किया गया। उस समय यह सरकारी सप्लाई में था या नहीं इसका नहीं पता लेकिन हमें लिखकर दे दिया। हमने वहां के डाक्टरों, दवा कंपनियों सभी से बात की, लेकिन किसी ने भी यह इंजेक्शन उपलब्ध नहीं कराया। जैसे-तैसे पूरा दिन और रात निकल गई और चिंता हो रही थी कि इंजेक्शन कैसे मिलेगा। पूरे 24 घंटे लग गए और अस्पताल के गेट के बाहर बैठकर इंजेक्शन का इंतजाम करने में लगे रहे।

किसी तरह से जान-पहचान निकाली और तय हुआ कि इंजेक्शन अगले दिन मिलेगा। अगले दिन इंजेक्शन देने वाले ने जो समय बताया उससे डेढ घंटे पहले जाकर बैठे तब इंजेक्शन नसीब हुआ। मतलब मैं सिर्फ यह कहना चाह रहा हूं कि जो इंजेक्शन सरलता से उपलब्ध तक नहीं है उसे सिर्फ 4 हजार की जांचों के पीछे वापस मत लौटाएं। यह ठीक नहीं है।

कोरोना मरीज को इंजेक्शन लगाने से पहले अलवर में सरकारी स्तर पर जांच की सुविधा नहीं है होने के बारे में मुझे डाक्टर्स ने बताया था। मरीजों को जांच सुविधा मिल सके, इसके लिए मैने डॉक्टर्स को प्रपोजल बनाने के लिए कहा था। प्रपोजल काे मैने सरकार को भेज दिया है। सरकार की तरफ जैसे ही अनुमति और उपकरण आएंगे, जांच शुरू हाे जाएगी। मेरे मानना है कि जल्द ही सरकार की और से अनुमति मिल जाएगी। यह समस्या अलवर के अलावा और भी जिलो में आ रही है। हम किसी मरीज को प्राइवेट में जांच कराने के लिए नहीं कह सकते।
आनंदी, जिला कलेक्टर

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