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देशनोक मंदिर जहां रखे हैं सोने के किवाड़:सरिस्का के बाला किला क्षेत्र के जंगल में करणी माता मंदिर की स्थापना और बीकानेर के देशनोक मंदिर में सोने किवाड़ के भेजने के पीछे है राजा की कहानी

अलवर16 दिन पहले
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करणी माता मंदिर में मां की मूर्ति। - Dainik Bhaskar
करणी माता मंदिर में मां की मूर्ति।

विश्व प्रसिद्ध बीकानेर के देशनोक करणी माता मंदिर में सोने के किवाड़ सहित कई सामग्री अलवर के महाराजा बख्तावर सिंह ने भिजवाई थी। इसके पीछे अलवर के महाराजा के पेट दर्द से जुड़ी रोचक कहानी है। उसी समय अलवर के बाला किला क्षेत्र में करणी माता का मंदिर बनवाया गया। उसके बाद से यहां करणी माता का मेला भी लगता है और नवरात्र के समय बड़ी संख्या में भक्त माता के दर्शन व पूजन करने पहुंचते हैं।

ये है मंदिर की कहानी
साल 1865 में एक फकीर का वन्य जीवों से प्रेम और महाराज बख्तावर सिंह के पेट दर्द का किस्सा है। एक बार महाराजा बख्तावर सिंह शिकार कर रहे थे। उनके तीर से घायल जंगली शूकर शाह फकीर के स्थान (चमेली बाग के समीप) में प्रवेश कर गया। इससे फकीर शाह नाराज हुए। यह संयोग रहा कि उसी समय महाराजा के पेट में दर्द हो गया। काफी इलाज के बाद पेट दर्द नहीं थमा। पूजा-पाठ भी कराई गई। उस समय दरबार के ताजीमी ने महाराजा से करणी माता की अखंड ज्योत पर स्तुति करने की इजाजत मांगी। इस पर उम्मेदा राम पालावत जागीरदार (जिनके वंशज पद्मश्री सूर्यदेव बारेठ हैं) ने मातेश्वरी को याद किया। महाराज को बताया कि सफेद चील वेश में आकर माता करणी महल के दुर्ग पर बैठकर दर्शन देगी। ऐसा हुआ और दर्शन पाते ही महाराज के पेट दर्द दूर हो गया।

बाला किला जंगल में मंदिर जाने का रास्ता।
बाला किला जंगल में मंदिर जाने का रास्ता।

फिर देशनोक में भेजे सोने के किवाड़
इसके बाद बख्तावर सिंह ने देशनोक स्थित करणी माता के मंदिर में उम्मेदा राम के माध्यम से 25 हजार रुपए पूजन भेंट, एक जोड़ी सोने के किवाड़, एक जड़ाऊ छत्र, एक सोने की चौकी तथा एक सोने की छड़ भेंट की। यह सब वहां मंदिर में मौजूद है। इसके साथ ही बाला किले के पास जंगल में ही करणी माता मंदिर बनाने की घोषणा की। जिसे बाद में महारानी रूपकंवर ने बनवाया।

देवस्थान विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार भी यह मंदिर रानी रूपकंवर का बनवाया हुआ है। उस सयम मंदिर में सेवा पूजा के लिए 2 रुपए रोज भोग खर्च दिया जाता था। फिर संवत् 1925 (सन 1868 ई) में इसे कम कर 1 रुपए रोज किया गया।

मंदिर परिसर के बाहर का हिस्सा।
मंदिर परिसर के बाहर का हिस्सा।

अब सफारी वाले ओ रहे
कोरोना गाइडलाइन के कारण अब मंदिर में आमजन का प्रवेश नहीं हो पा रहा है। जबकि इस समय जंगल में सफारी करने वाले टूरिस्ट को टिकट लेकर घूमने की छूट है। लेकिन मंदिर में आमजन को जाने नहीं दिया जाता है। केवल मंगलवार व शनिवार को ही मंदिर में आमजन को जाने की अनुमति होती है।

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