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मकर संक्रांति विशेष:तिल-गुड़ के उत्पादन में डूंगरपुर आजादी से पहले रहा है आत्मनिर्भर, संक्रांति पर खास व्यंजन का लुत्फ

डूंगरपुर4 दिन पहले
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  • राजपरिवार ने किसानों को गन्ने से गुड़ बनाने की तकनीक सिखाई थी, साथ ही तिल की फसल बोने के लिए करते थे किसानों की मदद

मकर संक्रांति का पर्व दान के साथ तिल और गुड का विशेष महत्व हैं। इस पर्व की महत्ता काे देखते हुए यहां के किसान आजादी से पहले तिल की पैदावर करते हैं। यहीं नहीं गन्ना भी यहां पर बड़ी मात्रा में उगाया जाता हैं। जिससे गुड बनाने की तकनीक भी किसानाें काे सिखाई गई। जिसके बाद जिले में गुड और तिल का अच्छा उत्पादन हाेने लगा। आजादी के बाद गुड और तिल के प्रति रुझान कम हाे गया। हालांकि अभी भी सीमलवाड़ा, झाैथरी और सागवाड़ा पंचायत समिति के कुछ गांवाें में तिल की खेती की जाती है। जिसका रिकाॅर्ड कृषि विभाग के साथ ही गिरादवरी रिपाेर्ट में तिलहन के रुप में मिलता है।

वहीं गन्ने काे अत्याधिक पानी की आवश्यकता रहती हैं। जिसके कारण गन्ने की फसल की बुवाई लगातार कम हाेने के कारण गुड का निर्माण कम हाे गया। फिर भी आज भी सर्दी के माैसम में पाटीदार समाज की ओर से गुड का निर्माण कर बाजार में बेचा जाता है। वहीं तिल काे भी स्थानीय किसान अपने परिवार और बाजार में खुले ताैर पर बेचते हैं। कुछ किसान अभी भी इसे गुजरात की मंडियाें में बेचते हैं।

तिल की पैदावर काे बांसवाड़ा व गुजरात में भी बेचा जाता था
सीमलवाड़ा और सागवाड़ा में 1960 के दशक में बड़ी मात्रा में उगाया जाता था। उस समय किसान इन तिलाें काे स्थानीय बाजार में बेचने के साथ ही गुजरात के बाजार में भी बेचते थे। सीमलवाड़ा के वयाेवृद्ध मधुसूदन पंडया ने बताया की स्थानीय किसान की ओर से तिल की जबरदस्त पैदावर हाेती थी। जिसके कारण कई किसान ताे तिल का तेल भी निकालते थे।

इसी के कारण पीठ में कई मुस्लिम परिवार इसी व्यवसाय से जुडे हुए थे। जाे तिल के तेल निकालने के लिए मशीनाें काे सबसे पहले लेकर आए थे। ये मशीन बैल और केराेसिन पंप से चलाते थे। कई किसान तिल काे डूंगरपुर जिले के अलावा बांसवाड़ा, केसरीयाजी और गुजरात के बाजार में बेचने जाते थे। जिसके कारण इन बाजार में जबरदस्त डिमांड रहती थी।

गुड़ बनाने में आज भी परम्परागत तरीके

बिछीवाड़ा, सागवाड़ा, डूंगरपुर, झाैथरी और सीमलवाड़ा पंचायत समिति के गांवाें में किसानाें की ओर से गन्ना उगाया जाता है। विशेषकर पाटीदार समाज की ओर से गन्ने की बुवाई के साथ ही गुड काे बनाने के लिए परम्परागत तरीकाें का उपयाेग किया जाता है। जिसमें गन्ने का रस निकालने के लिए बैल के साथ बंधी लकड़ी की चकरी हाेती है। जिसमें गन्ने का रस निकालकर एकत्रित किया जाता है। इसके बाद बडी कड़ाई में सारे रस काे मिलाकर उबाला जाता है। जिसके बाद ठंडा हाेने पर रस गुड में तब्दील हाेता है। अभी भी कई गांवाें में इसी परम्परागत तरीकाें का उपयाेग किया जाता हैं।

हर घर में बनाते है तिल और गुड केे व्यंजन
वागड़ में गुड और तिल से बने कई उत्पाद प्रचलित है। जिसमें गुड औश्र तिल के साथ मिलाकर तिल पट्टी, लड्डू, पैसे डालकर लड्डू, तिलपट्टी की मिठाई सहित कई उत्पाद प्रचलित है। इसके अलावा इन तिल के लड्डू और मिठाई के बांटने का भी रिवाज है। जिससे हर घर में तिल से बनी मीठे व्यजंन की भरमार रहती है। इन व्यंजन काे आज भी घराें में ही तैयार किया जाता है। इसके अलावा काेई बाजार में उपलब्धता नहीं हाेती हैं।

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