पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

व्याख्या:वेबिनार से धर्माचार्य ने की द्रव्य की संरचना और गुणधर्म की विस्तृत दार्शनिक व्याख्या

सागवाड़ा8 महीने पहले
  • कॉपी लिंक
  • वेबिनार से धर्माचार्य ने की द्रव्य की संरचना और गुणधर्म की विस्तृत दार्शनिक व्याख्या

पुनर्वास कॉलोनी के विमलनाथ दिगंबर जैन मसन्दिर में ससंघ चातुर्मासरत वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनंदी महाराज ने देश-विदेश के वैज्ञानिकों और शिष्यों को वेबिनार में अध्ययन कराते हुए द्रव्य की संरचना और गुणधर्म की दार्शनिक व्याख्या बताई। आचार्य ने कहा कि द्रव्य में समस्त 6 द्रव्य आते हैं। जो स्व अनंत गुण व स्व अनंत पर्यायों को प्राप्त करता है, वह द्रव्य हैं। द्रव्य से समस्त सृष्टि की रचना है। द्रव्य शाश्वत, अनादि, स्वयंभू, सनातन हैं। शुद्ध अशुद्ध सभी द्रव्य प्रति समय परीणमन करते हैं। जीव के असंख्यात प्रदेश जलाने पर भी नष्ट नहीं होते, वह अवस्थित रहते हैं। द्रव्य व सत्य दो महान शब्द है इसमें संपूर्ण विश्व गर्भीत हैं। जीव दो प्रकार के होते हैं पहला जीव, दूसरा अजीव।

जो चार प्राण से जीता है, जी रहा है जिएगा वह जीव है। संसारी जीव पौदगलिक है, चेतना से युक्त पुदगल है। समस्त द्रव्य प्राण भाव भी पुदगल है। आचार्य ने कहा कि परम ब्रह्म को बताने के लिए शब्द ब्रह्म चाहिए। भाव का अर्थ वास्तविकता, सत्य व अवस्थिति आदि है। धर्माचार्य ने कहा कि तुम ब्रह्मांड की मूल इकाई हो। तुम हो इसीलिए ब्रह्मांड है , तुम्हारे अस्तित्व के बिना ब्रह्मांड का कुछ भी महत्व नहीं। बिना ज्ञान ज्ञेय नहीं, सब कुछ स्व में है। शरीर सप्त धातु से बना है। शरीर की शक्ति से अनंत गुना शक्ति हमारी आत्मा में है। स्व तत्व अमृत तत्व है। स्व स्वरूप समझने से पर स्वरूप अपने आप समझ सकते हैं। रिद्धि संपन्न मुनिराज के अपने

प्रश्नों के समाधान के लिये उनके शरीर से एक सूक्ष्म शरीर निकलकर केवली भगवान, श्रुत केवली या तीर्थंकर भगवान के पाद मूल में जाकर अपने प्रश्नों का समाधान करके वापस मूल शरीर में स्थापित हो जाता है। इसे आहरक शरीर कहते हैं। यह शरीर एक हाथ का होता है परंतु वह किसी को बाधा नहीं पहुंचाता, वह किसी से बाधित भी नहीं होता। आहारक रिद्धि धारी मुनि ज्ञान का आहार करते हैं। अतः आहारक शरीर कहते हैं। गति सिद्धांत के अनुसार राकेट सैटेलाइट से अनंत गुना तीव्र गति तेजस कार्माण व आहारक शरीर में होती है। विद्या से विनम्रता व जिज्ञासा बढ़ती है। इलेक्ट्रॉनिक तरंगें घातक हैं जीव को कर्म परमाणु के अनुसार गुलाम

- दास होकर काम करना पड़ता है। यह कर्म व जीव का महासंग्राम अनादि काल से चल रहा है। राग - द्वेष, तेरा- मेरा, क्रोध, मान, माया, लोभ आदि महासंग्राम के संचालक कर्म है। हमें नेगेटिव थिंकिंग नहीं रखनी चाहिए, हमें उदार सहिष्णु व्यापक परोपकारी सत्य ग्राही आदि पॉजिटिव थिंकिंग रखनी चाहिए।आत्मलीनता में ही संपूर्ण धर्म है। तीर्थंकर व रिद्धिधारी मुनियों को अनेक रिद्धियां होने पर भी उसका प्रयोग नहीं करते क्योंकि प्रयोग करने से शक्ति कम हो जाती है। विजयलक्ष्मी गोदावत ने बताया कि वेबिनार से आचार्य के देश - विदेश के कई वैज्ञानिक शिष्य और दर्शन शास्त्र के विद्यार्थी जुड़े।

खबरें और भी हैं...