राजस्थान के 5 जिलों में मौत की सौदेबाजी:घंटों पड़ी रहती है लाश, परिजन मौताणा मांगते हैं; न दो तो घर जला देते हैं

डूंगरपुरएक महीने पहलेलेखक: चिंतन जोशी

राजस्थान के 5 जिलों में 2 दशक से मौताणा नाम की कुप्रथा चली आ रही है। डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर, प्रतापगढ़ और पाली जिलों के आदिवासी बहुल इलाकों में इस प्रथा का बोलबाला है। प्रथा का हवाला देकर लोगों को डराया धमकाया जाता है और लाखों रुपए ऐंठ लिए जाते हैं।

सैकड़ों लोग इसका शिकार बन चुके हैं, लेकिन कोई इसके खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। पिछले डेढ़ महीने में मौताणा के 10 से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं। इसलिए दैनिक भास्कर की टीम इस कुप्रथा की सच्चाई सामने लाने के लिए जमीनी स्तर पर पहुंची।

ये मौताणा क्या है?
मौताणा का मतलब है मौत पर 'आणा' यानी पैसा। इसमें किसी व्यक्ति के मरने पर उसका परिवार मौत के दोषी व्यक्ति से पैसे की मांग करता है। जब तक पैसे नहीं मिलते तब तक शव का अंतिम संस्कार नहीं किया जाता। कई बार मौताणा तय होने की प्रक्रिया कई दिनों लंबी खिंच जाती है। ऐसे में शव की बेकद्री होती रहती है और परिजन शोक मनाने की जगह मोल-भाव करते रहते हैं।

6 मामलों से समझिए मौताणा की हकीकत

1. 38 घंटे मॉर्चुरी में पड़ा रहा शव
डूंगरपुर जिले के बिछीवाड़ा थाना क्षेत्र में 18 सितंबर की रात कनबा गांव के पास 2 बाइक भिड़ गईं। हादसे में 24 साल के प्रकाश कोटेड़ की मौत हो गई। दूसरी बाइक पर सवार राकेश पटेल घायल हो गए। प्रकाश के परिजनों ने राकेश से मौताणा मांगा। 80 हजार रुपए मिलने के बाद ही प्रकाश का अंतिम संस्कार किया गया। इसबीच प्रकाश का शव 38 घंटे मॉर्चुरी में पड़ा रहा।

2. अस्पताल से शव लेकर सड़क पर बैठे
दूसरी घटना भी डूंगरपुर जिले के बिछीवाड़ा थाना क्षेत्र की है। चुंडावाड़ा गांव में 3 अगस्त की शाम 5 लोगों ने मुकेश मीणा की धारदार हथियार से हत्या कर दी। परिजनों ने मौताणा की मांग करते हुए शव लेने से मना कर दिया। 20 घंटे समझाइश के बाद पोस्टमार्टम करवाकर शव परिजनों को दिया गया, लेकिन गांव जाकर उन्होंने शव सड़क पर रखा और धरने पर बैठ गए। फिर शुरू हुआ सौदेबाजी का खेल। 4 लाख रु. मौताणा मिलने के बाद ही अंतिम संस्कार किया गया।

3. महिला के ससुराल पक्ष से लिया मौताणा
तीसरा केस डूंगरपुर जिले के सदर थाना क्षेत्र के देवल कोलरा फला का है। यहां 16 अगस्त को नर्मदा मीणा की कुएं में डूबने से मौत हो गई। शव को अस्पताल के मॉर्चुरी में रखा था और परिजन मौताणा मांगने में लगे। 24 घंटे बाद महिला के ससुराल पक्ष ने मायके वालों को डेढ़ लाख रु. मौताणा दिया, तब जाकर कहीं पोस्टमार्टम हो सका।

4. 57 घंटे तक पड़ा रहा जवान का शव
डूंगरपुर के बिछीवाड़ा थाना क्षेत्र के शिशोद गांव में 18 सितंबर को राजस्थान सशस्त्र कांस्टेबुलरी (RAC) जवान रमेश लिम्बात की गाड़ियों में सवार होकर आए हमलावरों ने हत्या कर दी। हमलावरों से 5 लाख रु. का मौताणा मांगा गया। पुलिस की समझाइश का भी असर नहीं हुआ और किसी तरह 57 घंटे बाद जवान के शव का अंतिम संस्कार किया गया।

5. पति के मरने पर लिया 75 हजार रु. मौताणा
19 दिसंबर, 2020 को बिछीवाड़ा थाना क्षेत्र के कवालियादरा गांव में चंद्रिका गमेती (28) ने घर में फांसी लगा ली। लड़की के मायके पक्ष ने ससुराल पक्ष पर आरोप लगाते हुए मौताणा मांगा। 48 घंटे बाद 75 हजार रु. मौताणा मिलने के बाद अंतिम संस्कार हुआ।

6. महिला मजदूर की मौत, 5 लाख मौताणा लिया
डूंगरपुर के ही धंबोला थाना क्षेत्र के पीठ कस्बे में 18 अक्टूबर 2020 को दुकान पर सफाई करते समय सीढ़ी से पैर फिसलने से महिला मजदूर की मौत हो गई। परिजन शव को अस्पताल में रखकर दुकानदार के घर के सामने धरने पर बैठ गए। सौदेबाजी 10 लाख रु. से शुरू हुई। 5 लाख रुपए में दोनों पक्षों में समझौता होने पर शव उठाया गया।

कब मांगा जाता है मौताणा?
जब किसी व्यक्ति की मौत सड़क हादसे, कुएं में गिरने,आत्महत्या, मारपीट, मर्डर, हमला या ऐसे ही किसी कारण से हुई हो, जिसमें किसी को भी उसका दोषी ठहराया जा सके।

मौताणा नहीं देने पर क्या होता है?
मौताणा नहीं मिलने पर बदला लेने की प्रथा है। इसे चढ़ोतरा कहा जाता है। इसमें मौताणा नहीं देने वाले परिवार के घर आग लगा दी जाती है। मारपीट और पथराव भी किया जाता है। कुछ मामलों में पीड़ित सामने भी आए, लेकिन पुलिस भी केवल समझौता करवाने में रुचि दिखाती है।

जान बचाने के लिए मौताणा देना मजबूरी
मौताणा की कुप्रथा के नाम पर आदिवासी क्षेत्रों के लोगों में डर बैठा हुआ है। नाम नहीं छापने की शर्त पर पीड़ितों ने बताया कि वे इस प्रथा के खिलाफ हैं। इसके बाद भी इसका हिस्सा बनना मजबूरी है। आर्थिक रूप से कमजोर होने पर भी लाखों रुपए देने पड़ते हैं। पीड़ितों का कहना है कि परिवार के बाकी सदस्यों की जान बचाने के लिए मौताणा देना ही पड़ता है।

सजा का प्रावधान जरूरी
एक्स लेबर कमिश्नर और आदिवासी विकास परिषद के अध्यक्ष रूपलाल डामोर के मुताबिक मौताणा के मामले रोकने के लिए सजा का प्रावधान होना जरूरी है। वर्तमान में सरकार भी हादसों के पीड़ितों और उनके परिवारों को मुआवजा देती है। सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को जागरूक करने का काम किया जा रहा है। जनप्रतिनिधियों को भी ऐसे मामलों में दखलअंदाजी कर प्रथा को रोकने की कोशिश करनी चाहिए।

कैसे रुक सकता है मौताणा?

  • कानून बने। जिसमें सख्त सजा का प्रावधान हो।
  • मौताणा मांगने वालों में पुलिस का डर हो।
  • आदिवासी इलाकों में शिक्षा का ज्यादा प्रसार हो।
  • सामाजिक कार्यक्रमों से जागरूक करें।
  • पीड़ितों को दिए जाने वाले सरकारी लाभ की जानकारी दें।