पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

राहत की खबर:मानसून के दौर में व्यापारी वर्ग को नई गाइडलाइन से बड़ी उम्मीदें

डूंगरपुरएक महीने पहले
  • कॉपी लिंक
  • कच्चे मकानों को ढंकने के लिए लकड़ी, केलू और तिरपाल से जुड़ा करीब एक करोड़ रुपए का व्यापार हुआ प्रभावित

काेराेनाकाल के दूसरे संक्रमण कम हाेने के साथ ही व्यापारियों के दर्द और आर्थिक संकट के जख्म उभरने लगे हैं। आमजन से जुड़े कुछ व्यापारियों के लिए मानसून सीजन का काम लगभग ठप्प हाे गया है। इसमें विशेषकर कच्चे मकान की रिपेयरिंग से जुड़े व्यापारियों काे सबसे ज्यादा नुकसान हाे रहा है। शहर सहित आसपास के गांवों में कच्चे मकानों की रिपेयरिंग से जुड़े शहर के एक दर्जन व्यापारियों काे मार्च से लेकर जुलाई तक सीजन हाेता है।

इसी सीजन में लकड़ी की बल्ली, केलू, डाडे, तिरपाल और पतरे के व्यवसाय जुड़े हुए हैं। इन्हीं व्यवसाय से उन्हें आगामी एक वर्ष तक का लाभांश हाेता है। जनजाति क्षेत्र में अधिकांश मकान केलुपोश हाेने के कारण यहां पर इन चीजों की डिमांड अच्छी खांसी हाेती है। इसके लिए शहर सहित सागवाड़ा, सीमलवाड़ा, आसपुर, बिछीवाड़ा सहित बड़े कस्बों में व्यापारियों का डेरा लगा हुआ है।

ये व्यापारी अब काेराेनाकाल के कारण बेरोजगार हाे चुके हैं। जाे सामान उनके पास उपलब्ध है वाे भी अब पुराना हाेता जा रहा है। इसके कारण उन्हें घाटे में रहना पड़ रहा हैं। बाजार में सुबह 6 से 11 बजे तक सप्ताह में चार दिन अनलॉक भले ही शुरू हाे चुका है लेकिन अभी भी काेई भी ग्रामीण सामान खरीदने नहीं आ रहा हैं।

पहले सरकारी आवास योजना से बिजनेस बर्बाद हुआ अब काेराेनाकाल में खत्म हाे गया

शहर के लकड़ी के बल्ली व्यापारी सतीश बांसड ने बताया की तीन साल पहले हर सीजन में लकड़ी, केलू और तिरपाल काे लेकर अच्छा बिजनेस चलता था। कच्चे मिट्टी के मकानों में करीबन तीन से चार बडी बल्ली, लकड़ी के पाट, केलू काे फंसाने के लिए डांडे की जरूरत पड़ती थी। इसके साथ ही मिट्टी के केलू भी बड़ी संख्या में जरूरत पड़ती थी। जिसकाे देखते हुए मार्च से लेकर जुलाई तक सीजन चलता था। इस सीजन में घर पर खाने की फुर्सत नहीं मिलती थी। फिर सरकार की ओऱ् से प्रधानमंत्री आवास याेजना, इंदिरा आवास योजना शुरू हुई।

जिसमें लगभग पक्के मकान का क्रमबद्ध निर्माण शुरू हाे गया। इसके कारण धीरे-धीरे डिमांड कम हाे गई। गांव में लाेग योजना में नाम आने के बाद अपने घर पक्के बनाने लग गए हैं। इन पक्के मकानों के कारण पुराने केलू पाेश मकानों पर अब ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा हैं। इसमें अधिकांश गरीब और असहाय लाेग रह रहे हैं। इसके अलावा अपने पशुओं काे बांधने के लिए कच्चे मकानों का प्रयोग किया जा रहा हैं। इसके बाद लगातार दाे साल से काेराेना का प्रकाेप चलने के कारण अब लाेग शहर में सामान खरीदने बहुत कम आते हैं।

सीजन में 5 से 10 लाख रुपए केलू का बिजनेस चलता था
शहर के केलू व्यापारी ताराचंद कलाल ने बताया कि केलू से जुड़े एक दर्जन व्यापारी कार्य करते थे। जाे गुजरात और मध्यप्रदेश से केलू की ट्रक मंगवाकर व्यापार करते थे। धीरे-धीरे गांवों में पक्के मकान का दाैर आ गया। जिसके कारण केलू की बिक्री घटती गई। अब सिर्फ दाे व्यापारी शहर में केलू बेचते हैं। इसमें भी लगातार दाे साल से काेराेना का संक्रमण आने के कारण गांवों में लाेगाें के पास पैसा ही नहीं हैं। इसके चलते काेई भी नया केलू खरीदने के लिए अाता ही नहीं हैं।

खबरें और भी हैं...