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तालिबानियों की दहशतगर्दी:बारूद से भरे ट्रक से दरवाजा उड़ाया, कार से उतारकर गोली मार दी; जिस ट्रक में तालिबानी बैठे थे उसी में बुर्का पहन छिपना पड़ा

बांसवाड़ाएक वर्ष पहलेलेखक: प्रियंक भट्‌ट
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अफगानिस्तान में काम करने के दौरान मिलन भट्ट (ब्राउन टी शर्ट में) विदेशी सहयोगियों के साथ। - Dainik Bhaskar
अफगानिस्तान में काम करने के दौरान मिलन भट्ट (ब्राउन टी शर्ट में) विदेशी सहयोगियों के साथ।
  • अफगानिस्तान में अमेरिकन आर्मी और नाटाे सेना के बैस कैंप में रहे वागड़ के युवाओं ने साझा किए उनके दाैरान हुए हमलाें के अनुभव
  • रोजगार के लिए गए वांगड़ के युवा भी रहे खौफजदा, बंकर में छिप-छिपकर गुजारे दिन

बंदूक से डरा कर तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जे ने फिलहाल दुनियाभर काे चिंताग्रस्त कर दिया है। अफगानिस्तान से आ रही दिल दहला देने वाली तस्वीरों से साफ पता चल रहा है कि वहां भय और खाैफ का कैसा मंजर बना हुआ है। वहां के लाेग अपने ही देश काे छाेड़ने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं, लेकिन अफगानिस्तान में ये दहशत और हमले नए नहीं हैं।

इससे पहले भी वहां तैनात नाटाे और अमेरिकन आर्मी पर भी हमले हाेते रहे हैं। इन कैंपों में डूंगरपुर-बांसवाड़ा से बड़ी संख्या में युवा कार्यरत रहे। इनमें से कई इन हमलाें काे देख और झेल चुके है। कई ऐसे भी हैं, जाे गोलीबारी में बाल-बाल बचे। कुछ युवा ताे वहां की सिक्युरिटी में भी काम कर चुके हैं। कुछ ऐसे ही युवाओं ने भास्कर संवाददाता से अफगानिस्तान में उनके दाैरान की सुरक्षा और हमलाें के अनुभव को साझा किए।

दोस्तों के साथ जा रहा था, अचानक चारों ओर धमाके शुरू हो गए, गोलियां ही गोलियां चल रही थीं, आर्मी के बंकर में छिपकर बचाई जान - मिलन भट्‌ट

11 सितंबर, 2011...रात करीब 9 बजे थे। इसी दिन अमेरिका में हुए 9/11 घटना के 10 साल पूरे हुए थे। मैं बगराम एयर फिल्ड में लाजिस्टिक मैनेजमेंट डिपार्टमेंट में कार्यरत था। वहां करीब 15 हजार सैनिक और कामगार थे। अपने किर्गिस्तान और फिलिपिन्स के कुछ सहयोगियों के साथ भाेजन कर पैदल बेस की ओर लाैट रहा था, तभी अचानक धमाके और गाेलियाें की आवाजें शुरू हाे गईं। राॅकेट लाॅन्चर दागे गए। अफगानिस्तान में आए मुझे केवल 8 महीने हुए थे।

इससे पहले भी हमले हुए थे, लेकिन यह हमला उन सबसे ज्यादा बड़ा और खौफनाक था। भारी गोलाबारी से बगराम बेस कैंप में अफरा-तफरी मच गई। हम कुछ समझ पाते, इससे पहले मिलिट्री पुलिस आई और हमें बंकर में ले गई। गाेलियाें की इतनी आवाजें आ रही थीं कि मैंने अपने कान बंद कर लिए थे। बंकर में हम 7 से 8 घंटे तक रहे। जवाबी कार्रवाई करते हुए अमेरिकन और नाटाे सैनिकों ने ब्लैक हाॅक और अपाचे हेलीकाॅप्टर से हमला किए।

इसमें कई हमलावर मारे गए, वहीं कई सैनिकों की भी मौत हुई। कुछ दिन पहले ही मेरा मित्र बना एक सैनिक काे मैंने खाे दिया था। मैंने पहली बार घायल सैनिक और शव देखे। खाैफ के वे घंटे ताउम्र नहीं भूल पाऊंंगा। इसके बाद मैंने जलालाबाद, कंधार और जाबुल में फारवर्ड आपरेटिंग बेस अपाचे (फाेब) कैंप में भी काम किया। अफगानिस्तान में मैंने 5 साल अमेरिकन बेस कैंप में काम किया और सैकड़ाें हमलेे देखे। वहां सबसे ज्यादा साउथ रीजन में हमले हाेते थे। अच्छी बात यह है कि वहां सुरक्षा के अच्छे बंदोबस्त थे।

(जैसा की अफगानिस्तान में 5 साल तक कार्यरत रहे डूंगरपुर के खड़गदा गांव निवासी मिलन भट्ट ने भास्कर काे बताया)

मेरे सिर पर थी गन, हेलीकाॅप्टर में दूसरी जगह ले गए थे

2012 में डूंगरपुर निवासी मनाेज दर्जी अफगानिस्तान के काबुल में अमेरिकी आर्मी के बैस कैंप में कार्यरत थे। मनाेज बताते है कि यह बैस कैंप करीब 2 किमी इलाके में फैला था। कई बार किसी संदिग्ध की कैंप में घुसपैठ की सूचना पर फाैजी हमारे रूम में सर्च करने आते। पूछताछ के दाैरान गन प्वॉइंट हमारे सिर पर रहता। हमारी आईडी पूछते। चिनूक और सिंगल पंखुड़ी वाले हेलीकॉप्टर में भी बैठने का माैका मिला। वहां कभी भी हमला हाे सकता था, लेकिन उच्च स्तरीय सुरक्षा बंदोबस्त भी थे। अफगानी भी भारतीयाें पर काफी भराेसा करते हैं।

मनोज दर्जी (काले जैकेट में) अमरीकन सैनिकों के साथ।
मनोज दर्जी (काले जैकेट में) अमरीकन सैनिकों के साथ।

कंधार में जिस होटल में ठहरे उसके पास ही हुआ धमाका

अफगानिस्तान में अमेरिकन आर्मी के पीएक्स लिए मैन पावर सप्लाई करने वाली कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट रह चुके कल्पेश दर्जी बताते हैं कि 25 फरवरी, 2010 काे 8 इंडियन काे काबुल से कंधार ले गए थे। कंधार में मुझे ठहरने की इजाजत नहीं दी। मेरे अफगानी मित्र ने मुझे बुर्का दिया, जिसे पहनकर मैं एक ट्रक में चढ़ गया, उसी में कुछ तालिबानी भी थे। हम कंधार पहुंचे। जिस हाेटल में ठहरे वहां से कुछ ही दूरी पर ब्लास्ट हुआ। उसी दोस्त ने मुझे एयरपोर्ट तक पहुंचाया। मैंने 350 लाेगाें काे सुरक्षित उनकी जगह पहुंचाया है।

काबुल में रोजगार के दौरान वहां के बच्चों के साथ कल्पेश दर्जी।
काबुल में रोजगार के दौरान वहां के बच्चों के साथ कल्पेश दर्जी।

एके-47 लेकर तैनात था, मैं देख रहा था कि गाेली मार दी, वहां जान की कोई कीमत नहीं

2012 में काबुल में फ्यूल स्टाॅक एरिया में सुरक्षाकर्मी के रूप में मार्मिक पुरोहित डेढ़ साल तक काम कर चुके हैं। मार्मिक वहां एके-47 और मशीनगन से लैस रहते थे। मार्मिक बताते हैं कि 2 जुलाई, 2013 का दिन था। तड़के 4 बजे मैं नहाने के लिए उठा ही था कि धमाका हुआ, जहां अधिकारियों का निवास स्थान था उस एरिये में नाटाे सप्लायर कंपाउंड के बाहर बारूद से भरा ट्रक मुख्य दरवाजे से जा टकराया। वहां तैनात कुछ सुरक्षाकर्मियों की माैत हाे गई।

गेट उखड़ते ही 5 बंदूकधारी भीतर घुस गए और फायरिंग शुरू कर दी। हम खुद काे बचाते हुए बंकर में चले गए। थाेड़ी ही देर में आर्मी ने उन्हें मार गिराया। मैंने घर पर काॅल कर बता दिया था कि दाेबारा काॅल आया ताे समझना कि जिंदा हूं। एक और वाकया है, रात काे 3 बजे टावर में ड्यूटी पर था। मैंने देखा कि एक कार आकर रुकी। इसमें से एक व्यक्ति बाहर निकला। थाेड़ी ही देर में कार में बैठे दूसरे शख्स ने बाहर निकले व्यक्ति काे गाेली मार दी। वहां जान की काेई कीमत नहीं थी।

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