यूजीसी का नियम:काॅलेज प्राचार्य काे हर माह देना है 1.50 लाख रुपए वेतन, निजी काॅलेज दे रहे 60,000

बांसवाड़ाएक महीने पहलेलेखक: चिराग द्विवेदी
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  • राज्यपाल ने पूछा-निजी काॅलेजाें में व्याख्याताओं काे क्या वेतन दे रहे?
  • निजी कॉलेज संचालकों का तर्क-सरकार की ओर से ग्रांट नहीं मिलती है, ज्यादातर व्याख्याता संविदा पर

उच्च शिक्षा में गिरते शिक्षा के ग्राफ काे देखकर राज्यपाल ने प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों से उनके अधीनस्थ निजी कॉलेजों में शैक्षणिक और गैर शैक्षणिक स्टाफ के वेतन की सूचना मांगी। आमताैर पर राज्यपाल द्वारा काॅलेजाें में मैनेजमेंट काे लेकर राज्यपाल का दखल कम ही देखने काे मिलता है।

लेकिन इस बार राजपाल के सचिव सुबीर कुमार ने सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों काे पत्र लिखकर यह जानकारी मांगी है कि निजी काॅलेजाें में कार्यरत शैक्षणिक और गैर शैक्षणिक अधिकारी और कर्मचारियों काे यूजीसी स्केल के अनुसार वेतनमान दिया जा रहा है या नहीं। आदेश में पूरी जानकारी सचिवालय काे जल्द ही भिजवाई जाए। सूचना भिजवाने की कोई तिथि निर्धारित नहीं की। गोविंद गुरु जनजातीय विश्वविद्यालय से संबद्ध कुल 151 काॅलेज हैं, जिसमें 16 सरकारी काॅलेज हैं, शेष 135 निजी हैं। प्रदेश में तकनीकी शिक्षा काे छाेड़कर 1852 डिग्री काॅलेजाें हैं। आदेश के बाद जब विश्वविद्यालय प्रबंधन से जानकारी जुटाई ताे चौकाने वाली बात सामने आई कि जिले में एक भी निजी काॅलेज अपने कर्मचारियों काे यूजीसी स्केल के मापदंड के अनुसार वेतन का भुगतान नहीं कर रहा है। यूजीसी स्केल के अनुसार एक कॉलेज प्राचार्य काे हर माह 1.25 से 1.50 लाख रुपए हर माह वेतन देना होता है। इसी तरह हर पद का एक स्केल निर्धारित किया है।

कुछ निजी कॉलेजों में गेस्ट फैकल्टी पर लगे हैं व्याख्याता
राजभवन के आदेश पर कई निजी कॉलेजों ने अपने जवाब भेजे हैं। जिसमें उनका तर्क है कि सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में कॉलेज की आय उतनी नहीं हो पाती है। वहीं यूजीसी की योग्यता के शिक्षक नहीं मिल पाते। दूसरा पहलू यह है कि इन निजी कॉलेज में सरकार की ओर से कोई ग्रांट भी जारी नहीं की जाती। कई सरकारी कॉलेज में भी गेस्ट फैकल्टी शिक्षा संबलन में लगी है, उन्हें भी सरकार द्वारा यूजीसी स्केल के अनुसार वेतन भुगतान नहीं किया जा रहा।

एक्सपर्ट व्यू; रिटायर्ड प्राे. संजय लाेढ़ा, मैंबर, बोर्ड अाॅफ मैनेजमेंट, जीजीटीयू बांसवाड़ा
विश्वविद्यालय व्याख्याताओं का रजिस्ट्रेशन करें, फिर उन्हें जरूरत के हिसाब से निजी काॅलेजाें में भेजे
निजी काॅलेजाें में कार्मिकों के पे स्केल की बात है ताे यह काॅलेज प्रबंधन पर निर्भर करता है। क्योंकि कुछ काॅलेजाें के पास उतने संसाधन और विद्यार्थियों की संख्या नहीं हाेती है। वहीं कुछ काॅलेज ज्यादा मुनाफे के चक्कर में कर्मचारियों को 60% से भी कम वेतन देते हैं। निजी काॅलेजाें में कागजों में वेतन कुछ और बाेलता है और कर्मचारियों के खाताें में वेतन कुछ र जाता है। डीए या एचआरए काे छाेड़ दिया जाए, लेकिन बेसिक वेतन ताे मिलना ही चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि काॅलेज व्याख्याताओं का रजिस्ट्रेशन करें, फिर उन्हें उन निजी काॅलेजाें में भेजे जहां उनकी जरूरत है। स्टाफ के अनुसार जाे वेतन उनका बनता है वाे निजी काॅलेज विश्वविद्यालय काे प्रदान करें ताे विश्वविद्यालय स्टाफ के खाताें में राशि ट्रांसफर करे। उदाहरण समझे ताे एक बीएड काॅलेज में फीस सरकार द्वारा 27 हजार रुपए निर्धारित है। दाे साल के इस पाठ्यक्रम में कम से कम 200 विद्यार्थी भी समझे ताे साल के 54 लाख रुपए सरकार द्वारा काॅलेज काे दिए जाते हैं।

प्रदेश में जितने भी निजी कॉलेज है, वो आयुक्तालय कॉलेज शिक्षा के नियमों के तहत चलाए जाते हैं। जाे भी आदेश होते हैं आयुक्तालय से ही कॉलेज को प्राप्त होते हैं। यूजीसी से आज तक वेतनमान को लेकर आदेश हमें दिया नहीं गया है। वेतनमान को लेकर आयुक्तालय ने पूर्व में एक आदेश जारी किया था कि निजी कॉलेजों में स्टाफ के वेतन को लेकर उनका कोई हस्तक्षेप नहीं रहेगा। जो वेतन की गाइड लाइन तय है उससे तो हम ज्यादा ही वेतन दे रहे हैं।
-जयदीप सिंह राठौड़, अध्यक्ष, ट्राइबर एरिया, प्रावेट कॉलेज वेलफेयर सोसायटी

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