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कहने को पीडब्ल्यूडी में तीन जिलों के मालिक हैं:डाक बंगले में किराए के कमरे में चलता है इनका कार्यालय, चपरासी के अलावा दूसरा कोई झांकने वाला नहीं

बांसवाड़ाएक महीने पहले
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डाक बंगले के एक कक्ष में फाइलों से जूझ रहे एसीई। - Dainik Bhaskar
डाक बंगले के एक कक्ष में फाइलों से जूझ रहे एसीई।

ऊपर तस्वीर में दिख रहे साहब! कोई और नहीं बल्कि लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के अतिरिक्त मुख्य अभियंता (एसीई) हैं। कहने को ये विभाग में तीन जिलों के मालिक हैं। इनकी देखरेख में बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और डूंगरपुर जिले में बड़ी संख्या में कई सरकारी भवन/ इमारतें निर्माणाधीन हैं लेकिन, सरकारी तंत्र की खामियों के बीच इन्हें एक साल के दौरान खुद का कार्यालय नहीं मिल सका है।

वर्तमान में ये किराए वाले डाक बंगले के एक कमरे में खुद का कार्यालय चला रहे हैं। यहां इस पद का दुर्भाग्य केवल इतने से में खत्म नहीं होता। एसीई के पास कर्मचारी के नाम पर एक चपरासी मात्र है। इसके अलावा कार्यालय में कोई लैंडलाइन नंबर नहीं है।

जिला कलेक्टर और मंत्री से फोन पर बात कराने वाला कोई निजी सहायक भी नहीं है। चूंकि पद सिविल इंजीनियरिंग के तकनीकी अनुभव का है। बावजूद इसके साहब के पास खुद का तकनीकी असिस्टेंट (टीए) नहीं है। अब साहब की सुनें तो उन्होंने बहुत बार जयपुर में मुख्य अभियंता कार्यालय में चक्कर काटे हैं। कई बार कामकाज की बाधाओं को लेकर उच्चाधिकारियों को व्यक्तिश: भी बताया है, लेकिन अब वह थक चुके हैं। रिटायरमेंट भी पास है तो केवल गिनती के दिनों को गिनते हुए समय काटने में लगे हैं। उनकी सोच है कि उनका समय बाधाओं में पूरा हुआ है। अब जो आगे आएगा वह उसकी समस्याएं दूर करता रहेगा।
नया पद बनवाया था
एक साल पहले तक बांसवाड़ा जिले में पहले पीडब्ल्यूडी के एसई (अधीक्षण अभियंता) का पद ही सबसे बड़ा था, लेकिन, उदयपुर अतिरिक्त मुख्य अभियंता कार्यालय की दूरी ओर बजट उपयोग क्षमता बढ़ाने के लिए बांसवाड़ा में एसीई का पद स्वीकृत कराया गया।

डूंगरपुर और प्रतापगढ़ से प्रदेश मंत्रिमंडल में कोई नेता नहीं होने के कारण टीएडी राज्यमंत्री अर्जुन बामनिया ने उनके प्रभाव का उपयोग किया। प्रयासों से एसीई पद को बांसवाड़ा ले आए। इसके बाद रोड के नाम पर यहां के अभियंताओं को उदयपुर के चक्कर नहीं काटने पड़े। इस सोच के साथ किए गए प्रयास अब यहां खामियों के बीच उद्देश्य से भटके हुए हैं। कहने को तो अधीक्षण अभियंता कार्यालय में ही बहुत से कक्ष खाली हैं। इसके अलावा कलेक्ट्रेट में भी बहुत से सरकारी कमरे खाली हैं, लेकिन इच्छाशक्ति के अभाव में किसी भी जिम्मेदार ने पद की गरिमा को ध्यान में रखकर सुविधाएं मुहैया कराने के प्रयास नहीं किए।

बांसवाड़ा में डाक बंगले के इस कक्ष में चलता है एसीई कार्यालय।
बांसवाड़ा में डाक बंगले के इस कक्ष में चलता है एसीई कार्यालय।

स्वीकृत पद भी नहीं मिले
एसीई पद के साथ ही कार्यालय संचालन को लेकर सरकार की ओर से पद स्वीकृत किए गए थे। इसके तहत कार्यालय संचालन के लिए छह वरिष्ठ और कनिष्ठ लिपिक पद सेंक्शन हुए थे। इसके अलावा एक निजी सहायक और एक टीए का पद स्वीकृत हुआ था, लेकिन टीए के नाम पर यहां अधीक्षण अभियंता स्तर के तीन अधिकारी लगाए गए, जो एक बार जोइनिंग देकर गए तो वापस अगले ट्रांसफर का पत्र ही साथ लेकर आए। अब भी यहां ऐसे पद के जिम्मेदार जोइनिंग के बाद से गायब हैं। कई बार उच्चाधिकारियों की एसीई से शिकायत रहती है कि उनका मोबाइल नहीं लगता। लेकिन, सच यह है कि किसी भी स्तर पर यहां लैंडलाइन सुविधा जुटाने की पहल नहीं हुई।
कोशिश कर हारे
इधर, एसीई रामहित मीणा की मानें तो उन्होंने कार्यालय के व्यवस्थित संचालन को लेकर बहुत प्रयास किए। अब वह थक चुके हैं। इस महीने की उनका रिटायरमेंट भी है। इसलिए अब ज्यादा जोर डालकर व्यवस्थाएं सुचारू करने के मूड में भी नहीं हैं।

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