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भास्कर रिकॉल:6 दिसंबर 1992 काे सवा 12 बजे शिव सैनिकाें ने गुंबद पर की थी चढ़ाई

बांसवाड़ा2 महीने पहले
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  • गढ़ी राव साहब के नेतृत्व में पहुंचे थे अयाेध्या पहुंचे थे कार सेवक

इतिहास के पन्नाें में 6 दिसंबर 1992 के दिन एक साथ लाखाें कार सेवकाें ने अयाेध्या के लिए कूच किया था। इस कार सेवा में बांसवाड़ा से भी कई स्वयं सेवक और भाजपा कार्यकर्ता पहुंचे थे। वर्तमान में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विभाग कार्यवाह नवनीत शुक्ला बताते हैं कि बांसवाड़ा जिले से गढ़ी राव साहब के नेतृत्व में कार सेवकाें का जत्था 4 दिसंबर काे रवाना हुआ था।

जिसमें भूवन मुकुंद पंड्या, किशाेर आचार्य, माेहन जाेशी, पुरुषाेत्तम उपाध्याय, कमल शुक्ला, कांतिलाल व्यास, निर्मल दोसी, जयवीर सिंह, परमेश्वरलाल भावसार, अश्वीन कुमार पंड्या सहित और भी कई स्वयंसेवक माैजूद थे। बांसवाड़ा से कार सेवक रतलाम से ट्रेन के माध्यम से लखनऊ पहुंचे थे। वहां से अयाेध्या के लिए रवाना हुए।

6 दिसंबर काे सुबह 6 बजे के करीब अयाेध्या पहुंचे ताे सीधे कार सेवकाें के ठहराव वाली जगह कारसेवकपुरम में ठहरने। सुबह 10 बजे के करीब सरयू नदी पर नहाने पहुंचे ताे वहीं बताया गया कि राजस्थान के कार सेवकाें का नंबर दाेपहर ढाई बजे के करीब आएगा, इसलिए सरयू नदी से जल और एक थैली में सरयू की रेत लेनी हैं जाे वहां बने गड्ढाें में डालनी थी।

इस दाैरान अयाेध्या में साध्वी ऋतंभरा, आडवाणीजी आदि बड़े लाेगाें का संबाेधन चल रहा था। कार सेवकाें के प्रवेश के लिए उस वक्त दरवाजा बंद था। लेकिन दाेपहर के करीब सवा 12 बजे हाेंगे कि वहां विश्वेशतीर्थ जी महाराज पहुंचे। जाे बड़े संत हाेने के कारण उनके लिए दरवाजा खाेला ताे सबसे पहले नंबर महाराष्ट्र के शिव सैनिकाें का था।

वाे सभी आगे ही थे, दरवाजा खाेलते ही उन्हाेंने विवादित ढांचे पर चढ़ाई चढ़ ली। इसके बाद ताे एक एक कर सभी कार सेवक ढांचे काे गिराने में जुट गए। 5 से 6 घंटाें में पूरा ढांचा गिरा दिया गया। ढांचा गिराने के बाद सभी अपने अपने कैंप में पहुंचे।

रात काे वापस घर की ओर निकलने वाले ही थे की माइक से एलान हुआ कि दिल्ली से फाैज पहुंचने वाली है इसलिए हमें उसी वक्त राम के लिए अस्थाई मंदिर निर्माण कर ही देना है। जिस पर सभी कार सेवकाें ने राताें रात चबुतरे का निर्माण कराया और टैंट लगाकर राम के लिए अस्थाई मंदिर का निर्माण कर दिया था।

अश्वीन कुमार पंड्या बताते है कि 6 दिसंबर के दिन हम सभी मुख्य मंदिर से महज 75 मीटर की दूरी पर थे, वहां पर देशभर से लोग पहुंचे थे, यह एक विशाल दृश्य था। जैसे ही कारसेवक गुंबद पर चढ़े तुरंत ही गुंबद गिराना शुरू कर दिया था।

मैं 1990 और 1992 में अयोध्या गया। 1990 में उत्तरप्रदेश पहुंचे तो उस समय की तत्कालीन मूलायमसिंह यादव की सरकार ने हमें जेल में बंद कर दिया। हम लोग 15 दिन तक जेल में रहे, वहां रोज सुबह शाखा लगाते, शाम को बाल मुरारी महाराज के प्रवचन होते थे। रात को सोने से पहले भुवन भारती की धम धम धूजी धरती... कविता और मेरे द्वारा लिखे गए गरबा चालो अयोध्या जइए रे गाते थे।

उस समय मेरे साथ मुरारीलाल झा भी थे। दूसरी बार हम लोग 1992 में अयोध्या पहुंचे और रामलला के दर्शन किए। दूसरे दिन दोपहर 12.30 बजे कार सेवा का मुहूर्त था। हम सब लोग वहां गए और मंदिर स्थल की साफ सफाई की। वहां के व्यवस्थापक ने हमें वापस अपने स्थान भेज दिया और कहा कि कारसेवा के लिए फिर बुलाया जाएगा। राजस्थान के कारसेवकों को रात 12.30 बजे बुलाया गया।

उस रात का दृश्य ऐसा लग रहा था जैसे अयोध्या में किसी मेले में गए हो। रातभर ढांचा गिराने का काम करते रहे। इसके बाद हमें अपने अपने घर जाने को कहा। दूसरी बार मेरे साथ मुरारीलाल झा, धनपतराय झा, मन्नलाल दवे, श्रीप्रसाद दवे, चंद्रमोहन नागर अयोध्या आए थे।

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