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मजबूर हूं साहब:फुटपाथ पर नमक बेच रहा था, पुलिस आई तो गिड़गिड़ाया- मौत से मैं भी डरता हूं, लेकिन बच्चों को भूख से भी तो नहीं मार सकता

बांसवाड़ा9 दिन पहले
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बांसवाड़ा के उदयपुर मार्ग पर फुटपाथ पर पर्दे की आड़ में यूं बनाया बसेरा। - Dainik Bhaskar
बांसवाड़ा के उदयपुर मार्ग पर फुटपाथ पर पर्दे की आड़ में यूं बनाया बसेरा।

साहब ! कोरोना से मैं भी डरता हूं। लापरवाही की सजा मौत है। खुद को समझा लेता हूं। इन बच्चों को कैसे भूखा मार सकता हूं। सैकड़ों किलोमीटर घर से दूर यहां को सगा संबंधी भी नहीं है, जो मेरे दर्द काे समझ ले। मुझे भी परिवार की चिंता है, पर मजबूर हूं।

कुछ ऐसे ही वेदना भरे शब्दों ने मंगलवार को पुलिस जवानों की कार्रवाई को बीच में ही रोक दिया। लॉकडाउन में फुटपाथ पर काला और सेंधा नमक बेचकर परिवार के लिए रोटी का जुगाड़ करने वाले गौरीशंकर को देखकर पुलिस ने एकबारगी हवा में लट्‌ठ हिलाया। आंखें भी दिखाई, लेकिन गौरीशंकर और उसके परिवार को देखकर जवानों का दिल पसीज गया। वे कार्रवाई करने की बजाए उसे सलाह देकर चले गए। बोले- बस भीड़ मत जुटाना।

नमक बेचने शहर आया था, मुसाफिर हूं, न घर न ठिकाना

पीड़ित गौरीशंकर की वेदना कुछ इस तरह जाहिर हुई। मैं लॉकडाउन से पहले बांसवाड़ा आया था। ट्रैक्टर और ट्रोली में काला नमक और सेंधा नमक के खड़े पत्थर के साथ परिवार को लेकर यहां पहुंचा तो लॉकडाउन लग गया। अब जिले से बाहर जाने के रास्ते बंद हैं। वह सड़क किनारे ट्रैक्टर ट्रोली की आड़ में परिवार को खुले में रखने को मजबूर हूं। मैं तो मुसाफिर हूं। न घर है न ठिकाना।

मैं भी डरता हूं, पर भूख से भी नहीं मरना चाहता

गौरीशंकर ने कहा- मैं भी कोरोना से डरता हूं। और उससे होने वाली दर्द भरी मौत से भी, लेकिन मासूम बेटी और कम उम्र के बच्चे को भूखा तो नहीं मार सकता। न मैं भूखा मरना चाहता। भीख कभी मांगी नहीं तो वह उससे होता नहीं। घर से इतनी दूर कोई सगा संबंधी भी नहीं है, जो कि मुसीबत में उसकी मदद कर दे। हम तो बीमार भी हो गए तो हॉस्पिटल में उपचार भी नहीं करा सकते।

पुलिस के सामने यूं गिड़गिड़ाया गौरी

जब पुलिस मौके पर पहुंची तो गौरीशंकर गिड़गिड़ाया- साहब। दो जून की रोटी के लिए उसका सड़क किनारे बैठकर नमक बेचना मजबूरी है। आप डंडे भी मारेंगे तो भी बच्चों का पेट भरने के लिए यह नमक तो बेचना ही पड़ेगा। अब पीड़ा को देख लोग उससे नमक भी खरीद रहे हैं ताकि परिवार को लॉकडाउन तक चला सके।

पर्दे की आड़ में बसेरा

फुटपाथ पर जिंदगी बिताने वाला गौरीशंकर स्वाभिमानी भी है। वह कहता है कि साहब, मैं भीख नहीं मांग सकता। खाना तो मेहनत करके ही है। मौके के हालात देखें तो यहां एक ट्रैक्टर ट्रोली में काला और सेंधा नमक के ढेर भरे पड़े हैं। इसके पास एक पुराना छकड़ा है। एक खाट है और तराजू बांट। ट्रैक्टर ट्रोली की आड़ में उसकी पत्नी भोजन पका लेती है। समीप एक हैंडपंप में सुबह के समय सभी नहाना धोना कर लेते हैं। इसके बाद गौरीशंकर धंधे पर बैठ जाता है और पूरे दिन सूनी सड़कों पर मिलने वाले इक्का-दुक्का लोगों से नमक लेने की आस लगाए रहता है।

दो सौ की किश्त

बकौल गौरीशंकर वह अभी लॉकडाउन के दौरान प्रतिदिन दो से तीन सौ रुपए कमा लेता है। कभी कभार चार सौ रुपए तक हो जाते हैं। इनमें से दो सौ रुपए तो वह ट्रैक्टर की किश्त के चुकाता है। उसके मन में ऋण देने वाली कंपनियों की ओर से ट्रैक्टर उठा ले जाने का भी डर है। इसके बाद वह बताता है कि परिवार के लिए दाल-आटा और अन्य सामान में डेली का सौ-डेढ़ सौ रुपया खर्च हो जाता है। उसकी मानें तो दिनचर्या में कोई बीमार पड़ जाए तो उसके पास दवा लाने के भी पैसे नहीं हैं।

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