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जन्माष्टमी विशेष:हाथियों को बांधने वाला रस्सा लाकर पीपली चौक में बांधी थी पहली दहीहांडी

बांसवाड़ाएक महीने पहले
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  • काेराेना की वजह से 60 साल में पहली बार नहीं हाेगा जिले का सबसे बड़ा मटकी फाेड़ कार्यक्रम

काेराेना संक्रमण के चलते शहर के सबसे पुराने पीपली चाैक में सार्वजनिक मटकी फाेड़ कार्यक्रम इस बार नहीं होगा। वैसे ताे सभी सार्वजनिक जगहाें पर कार्यक्रम स्थगित किए गए है, लेकिन पीपली चाैक की मटकी फाेड़ कार्यक्रम की प्रासंगिकता इसलिए भी है क्याेंकि, यह शहर की सबसे पुराने मटकी फाेड़ कार्यक्रमाें में से एक है।

इससे जुड़े आयाेजक दावा करते है कि शहर में सबसे पहले मटकी फाेड़ कार्यक्रम की शुरुात ही यहीं से हुई थी। हालांकि, पीपली चाैक में हाेने वाले इस आयाेजन की शुरुआत और आगे बढ़ने का सिलसिला भी बेहद राेचक रहा है। ऐसे में जन्माष्टमी के अवसर पर हमने हमाराें पाठकाें के लिए शहर के पहले सार्वजनिक मटकी फाेड़ कार्यक्रम की शुरुआत से जुड़े राेचक किस्से खंगालने की काेशिश की है।

पीपली चाैक में सार्वजनिक मटकी फाेड़ कार्यक्रम की शुरुआत काे लेकर काेई तय तिथि ताे नहीं है, लेकिन साल 1960-62 में पहलीबार यहां दही-हाड़ी बांधी गई थी। आपकाे जानकर हैरानी हाेगी कि उस वक्त मटकी काे बांधने के लिए राजमहल में हाथियाें काे बांधने वाला रस्सा लाया गया था। चंदा करके पूरा कार्यक्रम किया जा रहा था, लेकिन उत्साह इतना था कि उस वक्त भी गुजरात से नगाड़े वालाें काे बुलाया गया था।

इसके बाद मटकी फाेड़ कार्यक्रम काे लेकर उत्साह इतना बढ़ता गया कि शहर और फिर देहात में भी श्रीकृष्ण जन्माेत्सव पर भव्य मटकी सार्वजनिक फाेड़ कार्यक्रम हाेने लगे। मैं चूड़ी और खिलाैनाेें का व्यापार करता था। इसी सिलसिले में मुंबई गया था। जहां सार्वजनिक मटकी फाेड़ कार्यक्रम देखा। इससे बेहद प्रभावित हुआ। लाैटने पर साथियाें से चर्चा कर यहां पर भी ऐसा ही आयाेजन करने पर विचार किया। ठीक से याद नहीं, लेकिन यही काेई साल 1960-62 में पहलीबार पीपली चाैक में सार्वजनिक मटकी फाेड़ कार्यक्रम किया।

शुरुआत में स्थानीय व्यापारी और क्षेत्रवासियाें ने मिलकर चंदा किया। मजबूती के लिए उस वक्त राजमहल से हाथियाें काे बांधने वाला रास्सा लाकर बांधा था। शुरुआत में 4-5 मटकी बांधते थे। रातभर इसका पूर्वाभ्यास करते थे। दाे साल बाद मटकी फाेड़ के लिए अखाड़ाें काे भी आमंत्रित किया। इसके बाद से यह सिलसिला शुरू हुआ ताे अब तक शुरू है।

मटकी फाेड़ कार्यक्रम के प्रति श्रद्धालुओं का उत्साह बनता गया। स्थिति यह बनी पड़ी कि पीपली चाैक की तंग गलियाें में इस दिन इतनी भीड़ जुटने लगी कि प्रशासन काे दखल देकर मटकी फाेड़ कार्यक्रम गांधी मूर्ति चाैराहे पर करवाना पड़ा। जहां दाे-तीन साल तक आयाेजन किया गया। जन्माेत्सव पर श्रद्धालुओं के उत्साह का पता इसी से लगा सकते थे कि रात 12 बजे मटकी फाेड़ हाेने के बाद रघुनाथ मंदिर में जन्माेत्सव की आरती हाेती थी। रात 2 बजे तक भी बाजार में श्रद्धालुओं की रेलमपेल बनी रहती थी।

शुरुआती दाैर में इस कार्यक्रम काे सफल बनाने में रमणल टेलर, खिलाड़ी टेलर, रसीकलाल काेठारी, गाेपीलाल नेमा महाजन, नंदकिशाेर नेमा महाजन, लेखराज सराफ, प्रदीप सराफ, अशाेक सराफ, राजेंद्र काेठारी सरीखे कई समर्पित लाेग और क्षेत्रवासी जुड़े थे।

(जैसा कि 85 वर्षीय राेशनलाल नेमा ने बताया)

तब डर लगा था कि कहीं हाेटल के छत की जाली टूट न जाए: जोशी

श्री कन्हैयालाल शर्मा स्मृति कृष्ण जन्माष्टमी आयोजन समिति के संरक्षक और पूर्व राज्यमंत्री भवानी जोशी ने बताया कि जब गांधी मूर्ति सर्किल पर मटकी फोड़ कार्यक्रम रखा गया तो रस्सी का एक छोर पृथ्वी क्लब भवन के ऊपर और दूसरा छोर उसी के सामने मयूर होटल के भवन की छत पर स्थित जाली से बांधा। जब में मटकी फोड़ने के लिए पहलवानों द्वारा बनाए गए पिरामिड पर चढ़ा तो अचानक मुझे ध्यान आया कि कहीं मयूर होटल के ऊपर की जाली जिससे रस्सी बंधी हुई है कहीं टूट न जाए।

तब मैं फटाफट मटकी फोड़ कर रस्सी से नीचे कूद गया। जोशी ने बताया कि जब वर्ष 1978 में पहली बार पीपली चाैक के कार्यक्रम में संगी साथी काफी गिने चुने ही थे। जिनमें उनके मित्र कन्हैयालाल शर्मा, महेश गृहस्थी, वीरेंद्र सिंह, रघुनाथ, हरबंस सिंह लाला भाई, हरीश गुप्ता आदि ने उनका साथ दिया था। उसके बाद गिरजा महाराज, रमण भाई टेलर सहित बड़ी संख्या में लोग जुड़ गए जो हर साल उन्हें इस कार्यक्रम में बढ़चढ़ कर सहयोग देते रहे हैं।

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