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धर्म-कर्म:साधक का जीवन सब के प्रति सम्मान वाला ही होना चाहिए : पुलक सागरजी

बांसवाड़ा5 दिन पहले
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  • बाहुबली कॉलोनी स्थित दिगंबर जैन मंदिर में प्रवचन शृंखला

बाहुबली कॉलोनी दिगंबर जैन मंदिर में विराजित आचार्य पुलक सागर महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि जिनागम की दो पद्धति है संवर और निर्जरा। संवर का अर्थ है कर्मों का रुक जाना, लेकिन भीतर जो कर्म बैठे हैं उनका क्या करें। आचार्य जी ने कहा कि जीवन जीने की शैली को समझो कि कैसे हम अपना जीवन जिए। वैराग्य को उत्पन्न करने के लिए चिंतन करो किसी अच्छी चीज का चिंतन करो। वह कलम किस काम की जो परीक्षा के समय काम ना आए।

कलम की कीमत तभी है जब वह कागज का सम्मान करें। इसी प्रकार व्यक्ति का क्या काम है जब वह दूसरे व्यक्ति का सम्मान करें और वृत्ति का क्या काम है जब संयम का आलिंगन करें। आचार्य जी ने कहा कि अपने भीतर जाओ और भीतर की काली मां को बाहर निकालो। भगवान महावीर ने भी तो 12 वर्ष तक यही किया था।

तस्वीरों के संबंध में व्यक्ति बहुत विचार करता है, लेकिन व्यक्ति जो दिन भर इतना पाप करता है उसे नहीं समझता है। उसे पाप नहीं कहता है। संत के चरणों में यदि कोई फूल चढ़ा दे तो लोग उसे पाप कहेंगे, लेकिन व्यक्ति स्वयं चाहे जितना भी पाप करें, लेकिन उसके बारे में नहीं सोचेगा।

आचार्य जी ने कहा कि साधक का जीवन तो सब के प्रति सम्मान होना चाहिए। तुम्हारे भीतर जो पाप बैठा है उसे निकालो और आते हुए कर्मों को रोको। कुछ कर्म ऐसे होते हैं जो भक्ति से कटते हैं, कुछ कर्म जाप से कटते हैं, तो कुछ कर्म तप और त्याग से कटते हैं। गृहस्थ अवस्था में रहकर भक्ति के द्वारा ध्यान के माध्यम से कर्म करो। पाप दृष्टि में होता है, सृष्टि में नहीं।

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