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सम्मान:1992 में किए संघर्ष की वो यादें आज भी लोगों के जहन में है, कार सेवकों ने बताए अनुभव

गनोड़ा6 महीने पहले
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गनोड़ा. अमृतलाल जोशी का स्वागत करते श्री गौड़ ब्राह्मण समाज। - Dainik Bhaskar
गनोड़ा. अमृतलाल जोशी का स्वागत करते श्री गौड़ ब्राह्मण समाज।
  • गनोड़ा, पालोदा और मेतवाला के कारसेवकों ने बताया आंदोलन का आंखों देखा हाल

1992 में अयोध्या में हुए बाबरी विध्वंस के घटनाक्रम को आज भी लोग याद करते हैं तो उनके सामने वह पूरा नजारा जीवंत हो उठता है। लोगों के सामने वहां पर गोलियां चली थी। 4 दिसम्बर 1992 को गनोड़ा, पालोदा और मेतवाला से कुल 40 कार सेवकों का दल जिनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता बांसवाड़ा भारतमाता मंदिर में पहुंचे। यहां से 5 दिसंबर को रात्रि में फैजाबाद और 6 दिसंबर को सुबह संगठन के आदेशानुसार सरयू नदी में स्न्नान करने के उपरांत प्रत्येक कारसेवक को एक मुट्ठी रेत लाने को कहा गया। विवादित स्थल पर रेत डाल ही रहे थे कि यकायक कारसेवकों का आक्रोश इतना बढ़ गया कि देखते ही देखते बिना किसी पूर्व योजना के ढांचा ढहा दिया गया।

1 अमृतलाल जोशी, गनोड़ा : गनोड़ा निवासी 70 वर्षीय अमृत लाल जोशी ने बताया कि वह और उनके साथ 40 लोगों का जत्था अयोध्या के लिए रवाना हुआ था। अयोध्या में जब वे लोग पहुंचे थे तथा अचानक वहां पर पुलिस के द्वारा गोलियां चला दी गई। ऐसी हालत में अपनी जान बचा कर इधर-उधर छुपना पड़ा था। खाने के लिए केवल तीन पुड़िया मिली थी उनमें से एक पुड़ी उन्होंने खाई और दो पुड़ी गढ़ी के रावजी को उन्होंने दी। वह दिन याद करके अमृतलाल जोशी बताते हैं।

2. नानूराम पटेल, मेतवाला : वर्तमान में नानूराम पटेल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सागवाड़ा जिला के संघचालक हैं। उस समय सक्रिय स्वयंसेवक के रूप में कारसेवा के लिए अयोध्या जाना था पर इकलौते पुत्र होने के नाते पहले रोका गया लेकिन फिर जाने की अनुमति मिल गयी। जब वापस आ रहे थे तो यहां घर पर सभी चिंता में थे कि वहां गोलियां भी लग सकती है। किन्तु फिर घर पर सुरक्षित पहुंचने पर खुशी हुई।

3. हेमन्त त्रिवेदी : कारसेवक के रूप में हेमंत त्रिवेदी ने कहा कि उस दौरान जब ढांचे को गिराते हुए नीचे खड़े हुए कार्यकर्ता पर ईंट गिरने से खून निकल रहे थे पर वो तोड़ने के काम में लगा हुआ था। पंजाब में तो लोगों ने रास्ते पर खड़े रहकर कारसेवकों को दूध पानी की व्यवस्था कर रखी थी। आपने 13 वर्ष तक बिना चप्पल के केवल इसलिए बिताए की यह शासन बदलना चाहिए और वाजपेयी की 13 दिन की सरकार बनने के बाद इस प्रण को पूरा किया।

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