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कोराेना इफैक्ट:लंगर नहीं हाेगा, मास्क पहनने पर ही प्रवेश मत्था टेकने के बाद रुकने की अनुमति नहीं

बांसवाड़ा2 महीने पहले
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  • प्रकाश पर्व पर बदली व्यवस्थाएं, गुरु नानक जन्मोत्सव आज

गुरु नानक देव के 551वें प्रकाश पर्व पर इस बार अटूट लंगर नहीं बरतेगा। गुरुद्वारे में हर साल होने वाला लंगर इस बार कोरोना के चलते नहीं होगा। वहीं शहर में स्थित गुरुद्वारे में शबद कीर्तन का ही आयोजन होगा। जिसके तैयारी गुरुद्वारे प्रशासन ने पूरी कर ली है।

श्री गुरुद्वारा सिंघ समिति के अध्यक्ष तोता सिंह, सचिव हरजीत सिंह ने बताया कि सोशल डिस्टेंसिंग और गाइडलाइन की पालना के तहत ही कार्यक्रम होगा। संक्रमण को देखते हुए गुरुद्वारे में सामूहिक लंगर नहीं करने का फैसला लिया गया। गुरुद्वारे में होने वाले कार्यक्रम के दौरान व्यवस्था नहीं बिगड़े, इसके लिए खास तौर पर इंतजाम किए गए है। पर्व के कार्यक्रम में आने वाले श्रद्धालुओं को मास्क लगाना, सेनेटाइज के बाद ही गुरुद्वारे में प्रवेश होगा। जिनको मत्था टेकने के बाद रुकने की अनुमति नहीं होगी। सुबह 6 बजे से नित्य-नियम पाठ और फिर पहला दीवान सजेगा। इस दौरान शबद कीर्तन भी होगा। इसको लेकर शहर में स्थित श्री गुरुद्वारे में खास तरह की रोशनी से सजाया गया है।

साथ ही सिंधी समाज की ओर से सिंधू सागर धर्मशाला पर सजावट की गई है। समाज के अध्यक्ष अनिल मेठानी, हरेश लखानी, दिलिप वाधवानी ने व्यवस्थाओं का जायजा लिया। प्रवक्ता गिरधारी वाधवानी ने बताया कि कोरोना के प्रकोप के कारण होने वाले समारोह को प्रशासन की गाइडलाइन को ध्यान में रखते हुए समारोह में सामाजिक डिस्टेंस की पालना की जाएगी।

लंगर छकने का उल्लास, शबद कीर्तन की रहती है धूम
हर साल गुरुनानक देव की जयंती पर गुरुद्वारों में गुरुवाणी गूंजने और मत्था टेकने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। विशेष तौर पर बाहर से रागी जत्था आने के साथ ही गुरुद्वारा शबद कीर्तन से सराबोर रहता है। कई धर्मा के लोगों के करीब 1000 से 1500 से ज्यादा श्रद्धालुओं की उपस्थिति रहती है। हर साल होने वाले पर्व में आम शहरवासी से लेकर जनप्रतिनिधियों की मौजूद रहते है। गुरुद्वारे में गुरु के अटूट लंगर की भी धूम रहती है। यह परंपरा इसलिए भी खास है, क्योंकि इसे गुरुनानक साहब ने ही शुरू किया था। ऊंच-नीच, गरीबी-अमीरी से दूर रहने की प्रेरणा और सबको बराबर देखने की सीख के साथ सच्चा सौदा के साथ लंगर प्रथा शुरु हुई थी। इसी के चलते आज तक अटूट लंगर होता आ रहा है।

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