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जन्माष्टमी:नंद घर आंनद भयो, जय कन्हैया लाल की के जयकारों के साथ गोविंदा ने उत्साह और जोश के साथ फोड़ी मटकी

बांसवाड़ाएक महीने पहले
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  • रघुनाथ मंदिर और राधा-कृष्ण मंदिर में भगवान कृष्ण की उतारी आरती, भजन-कीर्तन किए

शहर समेत जिलेभर में बुधवार को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया गया। हालांकि इस साल कोरोना संक्रमण के कारण सामूहिक मटकी फोड़ कार्यक्रम नहीं किए गए, लेकिन मंदिरों में भगवान की विशेष पूजा अर्चना की गई। साथ ही श्रीकृष्ण की झांकी सजाई गई। जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण को पालने में झुलाया गया।

भक्तों ने नंद घर आंनद भयो, जय कन्हैयालाल की के जयकारों से श्रीकृष्ण जन्म का उत्सव मनाया। शहर के लालीवाव मठ में इस वर्ष कोरोना महामारी को देखते हुए कृष्ण जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में बुधवार को भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव केवल महंत हरिओमशरणदास महाराज, पुजारी समेत कुछ भक्तों की मौजूदगी में ही मनाया।

रात 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्योत्सव मनाया गया। शहर की सबसे बड़ी पांच महाआरती की गई। इसके बाद स्तुति और जन्मोत्सव मनाया। सोशल मीडिया के जरिए भगवान के दर्शन करवाए गए। विहिप की दुर्गा वाहिनी और मातृशक्ति की ओर से जन्माष्टमी पर मटकी फोड़ कार्यक्रम रखा गया।

इसमें भजन कीर्तन किए, श्रीकृष्ण की झांकी सजाई और बच्चों को श्रीकृष्ण बनाकर मटकी फोड़ी गई। इस दौरान साक्षी दक, शीतल मोची, भूमिका पटेल, शिल्पा शाह, महेश्वरी गुप्ता, वीणा जैन, गीता तेली, रेखा सुथार, सीमा पटेल आदि कई लोग मौजूद रहे। प्रजापति बह्माकुमारी ईश्वरीय विद्यालय राजयोग केंद्र की संचालिका बीके सुधा पांडे और बीके मीना, बीके सराेज दीदी, बीके मिथिलेश काेहली ने विचार व्यक्त किए।

नागरवाड़ा में जन्माष्टमी से लेकर 6 दिन होती है बाल गोपाल की सेवा

200 साल से किया जा रहा विशेष परंपरा का निर्वहन

नागर समाज के एक घर में पिछले दो सौ वर्षों से जन्माष्टमी के बाद से लेकर लगातार छह दिनों तक बाल गोपाल कृष्ण की पालने में रखकर विशेष रूप से सेवा होती है। दीनू उर्फ दीनानाथ नागर ने बताया कि नागरवाड़ा स्थित गुरुशंकर नागर के निवास स्थान स्थित लाभकाली मंदिर में पिछले कई वर्षों से भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से लेकर कंसवध तक की सभी झांकियां सजाई जाती हैं।

गुरुशंकर नागर द्वारा अपने पिता, दादा और पूर्वजों की दो सौ वर्षों पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए जन्माष्टमी के बाद से लेकर छह दिनों तक बाल गोपाल श्रीकृष्ण की मूर्ति की सेवा इस तरह से की जाती है जैसे किसी बच्चे के जन्म के बाद उसकी विशेष रूप से देखभाल की जाती हो। सुबह उठते ही बाल गोपाल को दूध का भोग धराया जाता है और उसके बाद हाथों से बनाए गए मक्खन का भोग विशेष रूप से धरा कर उन्हें झूले में सुलाते हुए सुलाया जाता है।

इस दौरान जब-जब भी बाल भोग धराया जाता है, तब-तब बाल गोपाल को चांदी के खिलाैने से खेलाना, गाय के दूध का भोग लगाने का क्रम जारी रहता है। वहीं यशोदा मां के लिए गूंद से बने लड्‌डू, कलड़ू पानी आदि का भोग धराया जाता है,जिसे आम जीवन में प्रसूता को प्रसव के बाद खिलाया जाता है।

लगातार पांच दिनों तक बाल मुकुंद कृष्ण की मूर्ति की सेवा पूजा करने और उन्हें एक नवजात बच्चे की तरह खिलाने और खेलाने के बाद छठे दिन छठे दिन उन्हें बड़ा होना मान कर लड्‌डू, चूरमा, बाटी, दाल का विशेष भोजन बनाकर प्रसादी की जाती है। मिट्‌टी के गोकुल बनाकर कर उन्हें छह दिनों बाद पानी में विसर्जित करते हैं

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