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कला पर संकट:कोरोना के कारण थमी चौदस पर पूर्वजों के सीरा स्थापना की परंपरा

सागवाड़ा2 महीने पहले
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  • दीपावली के बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष की चौदस और पूर्णिमा पर पूर्वजों की पूजा-अर्चना के साथ करते हैं सीरा स्थापना

दीपावली के बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष की चौदस और पूर्णिमा पर पूर्वजों की पूजा-अर्चना के साथ ही मृतकों की प्रतिमाओं (सीरा) की स्थापना की जाती है। लेकिन इस बार कोरोना महामारी ने बरसों पुरानी इस परंपरा को एक तरह से थमा दिया है। देवउठनी एकादशी के साथ नगर में मूर्तिकारों से मृतकों की सांकेतिक प्रतिमा जिसे जनजाति समाज मे सीरा बावसी कहा जाता है, बनवाने और खरीदने वालों की भीड़ लग जाती थी। लोग कुंडी और थाली बजाते नाचते हुए सोमपुरा मूर्तिकारों से सीरे खरीदकर ले जाते और घर के आसपास या खेत - खलिहानों में शुभ मुहूर्तों में इसकी स्थापना करते थे। लेकिन इस बार कोरोना के कारण लोगों ने इस परंपरा को अगले साल के लिए टाल दिया है। इसके चलते सोमपुरा मूर्तिकारों के यहां मूर्तियां पड़ी हुई हैं, वही इस पेशे पर निर्भर लोगों को परिवार का गुजारा चलाना मुश्किल हो रहा है।

यह है मान्यता: जनजाति समाज मे लोग मानते हैं कि मृतक की आत्मा को उसकी इच्छा के अनुसार पसंद के स्थान पर बैठाने से परिवार को उसका आशीर्वाद मिलता है। हिंदू केवल धर्म ही नहीं, जीवन शैली भी है। इसमें विभिन्न समाजों में अपने पूर्वजों का सम्मान करने के विशेष पारंपरिक तरीके हैं। इसी के तहत आदिवासी समाज के साथ ही यहां के कई अन्य समाज के लोग सीरे स्थापित कर अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता दर्शाते हैं। परिवार के बड़े-बुजुर्ग की वृद्धावस्था के बाद प्राकृतिक मौत होने पर दूसरे या तीसरे साल घर या खेतों के आसपास छोटा मंदिर, ओटला या चबूतरा बनवा कर उस पर सीरा (पत्थर पर प्रतिमा रूप आकार) स्थापित किया जाता है। अगर किसी व्यक्ति की बीमारी के चलते अस्पताल या दुर्घटना में सडक पर कहीं मौत हो जाती है तो परिवार के सदस्य गाजेबाजे के साथ उस स्थान पर पहुंच कर आत्मा को अपने साथ आने का भाव करते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से अकाल मौत का शिकार हुए परिजन की आत्मा उनके साथ निवास स्थान पर आती है और उसे इच्छित स्थान पर स्थापित किया जाता है।

मूर्तिकार के यहां से गाते बजाते ले जाते हैं सीरा: आदिवासी समाज में दिवाली व लाभ पंचमी के बाद का समय पूर्वजों के पूजन व उनकी स्थापना के लिए शुभ माना जाता है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चौदस के दिन सुबह से रात तक आदिवासी समाजजन अपने पूर्वजों के पूजन अर्चन एवं प्रतिमा स्थापना जैसे आयोजन करते हैं। इसके लिए मूर्तिकार से सीरे अर्थात् प्रतिमाएं बनवाई जाती हैं।

जिसमें पत्थर पर सर्प, घुड़ सवार, पुरुष अथवा स्त्री का आकार उकेरा जाता है। जिसे परिवार के सदस्य व ग्रामीण गाते बजाते अपने घर ले जाते हैं। इसकी परिजनों द्वारा स्थापना करने के बाद सामूहिक रूप से भोजन व महाप्रसाद के आयोजन करते हैं। बदलते परिवेश और आधुनिकता के बावजूद परपंराओं के निर्वहन से स्थानीय मूर्तिकारों और कलाकारों को रोजगार मिलता है। लेकिन इस बार कोरोना के कारण इस पेशे से जुड़े लोगों को बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है। सागवाड़ा, डूंगरपुर, तलवाड़ा, भीलूड़ा जैसे गांवों और शहरों में शिल्पी समाज के लोग मूर्तियां और मंदिर बनाने का पारंपरिक कार्य करते हैं, उनको पूर्वजों के पूजन के लिए सीरा प्रतिमाएं बनाने से रोजगार मिलता था।

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