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अभिनंदन:लक्ष्य को हासिल करने के लिए मनुष्य को पुरुषार्थ करना आवश्यक:प्रथमप्रज्ञा

बाड़मेर2 महीने पहले
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  • साध्वियों के अष्टापद जैन तीर्थ राणी स्टेशन से नाकोड़ा तीर्थ विहार के दौरान किया स्वागत

साध्वी दिव्य प्रज्ञा आदि ठाणा-12 श्री अष्टापद जैन तीर्थ राणी स्टेशन से श्री नाकोड़ा तीर्थ की तरफ विहार के दौरान कस्बे में गाजे-बाजे के साथ ग्रामीणों ने धूमधाम से साध्वियों व श्रावक श्राविकाओं का स्वागत करके अपने जीवन को धर्मज्ञान से गुंजायमान किया। भामाशाह मदनलाल आसूलाल कातरेला परिवार के निवास पर आयोजित संघ पूजा में गुरु महाराज ने गृह आंगण को पावन करते हुए महामांगलिक की धर्मसभा में उपस्थित भक्तवर्ग को प्रतिबोध के रूप में मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। साध्वी दिव्य प्रज्ञा ने कहा कि मनुष्य जन्म एक अनमोल जन्म है।

इसी जन्म में व्यक्ति धर्म और कर्म कर सकता हैं। परमात्मा ने चार गति बताई है उन चार गतियों के अंतर्गत नरक, तिर्यंच, देव और मनुष्य गति में से मनुष्य जन्म ही दुर्लभ हैं, क्योंकि व्यक्ति मनुष्य जन्म में धर्म ज्ञान कर सकता हैं। साध्वी अतुल प्रज्ञा ने परमात्मा महावीर के मूल संदेश जियो और जीने दो एवं अहिंसा परमोधर्म के बारे में बताते हुए कहा कि सृष्टि में सभी जीवों को जीना पसंद हैं, मरना पसंद नहीं हैं इसी कारण से जैनों की कुल देवी जयना को माना गया हैं, इसी कारण से जीव दया का विशेष पालन करना चाहिए।

साध्वी शाश्वतप्रज्ञा ने कहा कि मनुष्य के जीवन में तीन जनों का उपकार महान गिना गया है जो कि माता-पिता, गुरु एवं परमात्मा शास्त्रों में माता पिता को तीर्थ तुल्य माना गया हैं उनके उपकारों ऋण हम जीवनपर्यंत नहीं चुका पाते हैं। अतः देवतुल्य माता पिता की भक्ति हमें हमेशा करनी चाहिए। साध्वी प्रथम प्रज्ञा ने मनुष्य जन्म में पुरुषार्थ को केंद्र बिंदु मानते हुए कहा हैं कि प्रत्येक आत्मा में परमात्मा का वास होता हैं इसलिए स्वयं को निर्बल ना मानते हुए अपने अंतर्बोध को जगाने का प्रयास करना चाहिए।

लक्ष्य को हासिल करने के पुरुषार्थ करना अत्यंत आवश्यक हैं। इस दौरान धर्मसभा में साध्वी प्रथम प्रज्ञा एवं साध्वी उपशम प्रज्ञा ने अद्भुत व अनुकरणीय भक्ति भजन की प्रस्तुति में “जीव जरा सांभल, तू शु करी रयो छे” “छे क्या जवानु तारे, ने क्या जई रयो छे” के समूहगान से भटकते इंसान को सही दिशा की ओर अग्रसित होने के लिए प्रेरित करने का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया।
जसोल . अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मंडल के निर्देशन में तेरापंथ महिला मंडल जसोल की ओर से मंजूदेवी भंसाली की अध्यक्षता में मुनि धर्मेश कुमार के सानिध्य में कार्यशाला का आयोजन हुआ। मुनि धर्मेश कुमार ने अपने वक्तव्य में समाधि शब्द का अर्थ बताते हुए कहा कि जीवन में अच्छे -बुरे, प्रिय-अप्रिय, अनुकूल-प्रतिकूल का संयोग होता रहता है।

इन परिस्थिति में हमें हमेशा चित्त समाधि में रहना चाहिए। इसके लिए तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए। प्रथम हमें बाहरी निमित्त से कष्ट आए तो हताश नहीं होना चाहिए। खाली समय का नियोजन करे। बाजार से सब कुछ खरीद सकते लेकिन समय को ना ही खरीद सकते है और ना ही गुजरा समय वापस ला सकते हैं। इसलिए खाली समय में पुस्तकें पढ़े।

तत्वज्ञान, तत्वदर्शन में रूचि बढ़ाए। दूसरा हमें आनंद केंद्र पर महाप्राण ध्वनि के साथ ऊ भिक्षु, अर्हम, सिद्धा -सिद्धा जैसे छोटे - छोटे मंत्र का सवा करोड़ जप करना चाहिए। तीसरी बात बहुत महत्वपूर्ण है। हमें हर रोज अनुप्रेक्षा करनी चाहिए। 12 भावनाओं में एक-एक भावना प्रयोग करना चाहिए। इससे कर्म की स्थिति, प्रकृति, अनुभाग प्रदेश मंद होते हैं। अंत में आभार ज्ञापन महिला मंडल मंत्री ममता मेहता ने किया।

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