गोली लगने के छह साल बाद घाव में फैला इंफेक्शन:पुणे मिलिट्री अस्पताल में इलाज के दौरान रिद्धिनाथसिंह शहीद, वर्ष 2015 के स्पेशल ऑपरेशन में सीने पर गोली लगी थी

बालोतरा16 दिन पहले
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सेना के जवान पार्थिव देह को लपेटने के लिए पुत्र को तिरंगा देते हुए। - Dainik Bhaskar
सेना के जवान पार्थिव देह को लपेटने के लिए पुत्र को तिरंगा देते हुए।

ग्वालनाडा गांव में गुरुवार को सैन्य जवानों व ग्रामीणों ने नम आंखों से गांव के लाल शहीद रिद्धिनाथसिंह (32) को अंतिम विदाई दी। करीब दो माह से पुणे के मिलिट्री हॉस्पिटल में उपचार ले रहे जवान रिद्धिनाथ सिंह ने 4 जनवरी को अंतिम सांस ली। गुरुवार को शहीद का शव अपने पैतृक गांव ग्वालनाडा पहुंचा तो शोक की लहर दौड़ गई। सैन्य अधिकारियों की मौजूदगी में पार्थिव देह को तिरंगे में लिपटा कर अंतिम यात्रा निकाली गई। सेना के जवानों के साथ ग्रामीण वंदे मातरम व भारत माता के जयकारे लगाते हुए श्मशान घाट पहुंचे। जहां सेना के जवानों ने शहीद के सम्मान में गार्ड ऑफ ऑनर दिया।

इसके बाद सात वर्षीय मासूम इकलौते पुत्र रावलसिंह ने शहीद पिता को मुखाग्नि दी। गुरुवार को रिद्धिनाथसिंह के शहीद होने की जानकारी पर पूरे गांव में गमगीन माहौल रहा। शहीद वर्तमान में भारतीय सेना की आर्म्ड कोर की लॉन्चर बटालियन में सेवाएं दे रहे थे। शहीद के परिवार में कर्नल रैंक से लेकर सिपाही पद पर 11 सदस्य सेना में सेवाएं दे रहे हैं। रिद्धिनाथसिंह को टैंक चलाने में महारथ हासिल थी, इस पर सेना के स्पेशल ऑपरेशन के दौरान अधिकारी सिंह को आगे रखते थे। इस खूबी के चलते ही उन्हें जैसलमेर में होने वाले हर युद्धाभ्यास के समय सेना के अधिकारी स्पेशल निमंत्रण देकर युवा साथियों की ट्रेनिंग के लिए बुलाते थे।

2015 में गोली लगी, रिकवर होने के बाद फिर सेना में लौटे
शहीद के भांजे देरावरसिंह कंवरली ने बताया कि वर्ष 2015 में सेना की राष्ट्रीय राइफल में स्पेशल ऑपरेशन के दौरान शहीद रिद्धिनाथसिंह को सीने में गोली लगी थी। इस दौरान उन्होंने माैत को मात देकर वापस देश रक्षा में लौट आए। गोली लगने से गंभीर घायल रिद्धिनाथसिंह का सैन्य अस्पताल में ऑपरेशन किया गया। बाद में रिकवर होने पर राष्ट्रीय सेवा के प्रति पूर्ण समर्पित होने के नाते वापस ड्यूटी पर लौटे। छह साल से लगातार फौज में सेवाएं दे रहे थे। करीब दो महीने पहले बाड़मेर में ड्यूटी के दौरान गोली के घाव में फिर से इंफेक्शन होने लगा तो उपचार के लिए पुणे के मिलिट्री अस्पताल लाया गया। जहां उपचार के दौरान उन्होंने 4 जनवरी को अंतिम सांस ली।

बचपन में पिता को खोया, अब पति भी शहीद हो गए, वीरांगना ने जज्बा नहीं खोया
महज चार साल की उम्र में खेती कंवर ने भारतीय सेना में सेवाएं दे रहे अपने पिता भंवरसिंह को खो दिया। इकलौती पुत्री होने से परिवार में लाड़-प्यार से पली-बड़ी हुई और जब होश संभाला तो एक बार फिर से सेना के जवान का ही दामन थामा। पिता के आर्मी में हाेने तथा बाद में ससुराल में पति के साथ ही पूरा परिवार सेना में होने से उन्हें सैन्य माहौल में ही रहना पड़ा। इसकी बदौलत ही उनकी हिम्मत व जज्बा नहीं टूटा। पति के शहीद होने पर उन्होंने टूटने की बजाय अपने इकलौते पुत्र रावलसिंह को भी सेना की तैयारी करवाकर फौज में भेजने का निर्णय लिया।

7 वर्षीय इकलौते पुत्र रावल ने दी मुखाग्नि
शहीद के परिवार में उनकी पत्नी खेतीकंवर व इकलौता पुत्र रावलसिंह है। रावलसिंह की उम्र महज 7 साल है, जो वर्तमान में जोधपुर के चौपासनी स्कूल में कक्षा दूसरी में अध्ययनरत है। पुत्र की शिक्षा को लेकर शहीद की पत्नी खेती कंवर जोधपुर में ही रह रही है। 4 जनवरी को पिता के अस्पताल में उपचार के दौरान शहीद होने के समय रावलसिंह स्कूल में पढ़ाई कर रहा था। गुरुवार सुबह जब शव पैतृक गांव पहुंचा तो शहीद की पत्नी व पुत्र को गांव लाया गया। जहां गमगीन माहौल के बीच मासूम ने पिता के अंतिम दर्शन कर मुखाग्नि दी।

परिवार में 11 लोग सेना में दे रहे सेवाएं
शहीद रिद्धिनाथसिंह जुलाई 2002 में आर्म्ड काेर की लॉन्चर बटालियन में भर्ती हुए। उन्होंने जम्मू कश्मीर, दिल्ली, जैसलमेर समेत अन्य इलाकों में ड्यूटी दी। उनके गांव के शहीद के परिवार में 11 जने फौज में विभिन्न पदों पर सेवाएं दे रहे हैं। शहीद के दादा सरदारसिंह के परिवार में 11 सदस्य आर्मी में सिपाही से लेकर कर्नल रैंक तक सेवाएं दे रहे हैं। शहीद के बड़े भाई प्रेमसिंह 30 साल तक सेना में सेवा देकर सूबेदार पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। वहीं छोटे भाई हनुमानसिंह, भतीज महेंद्रसिंह समेत आठ सदस्य अभी भी सेना में ड्यूटी दे रहे हैं।

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